मोती महल से राज किला तक, नरगौना पैलेस से लक्ष्मीश्वर विलास तक और तालपत्रों से दुर्लभ वृक्षों तक फैली उपेक्षा की कहानी! राज दरभंगा की ऐतिहासिक धरोहरों की बिगड़ती हालत देख इंटैक ने जताई गहरी चिंता, कहा....अब नहीं चेते तो इतिहास हो जाएगा खामोश; पढ़िए इंटैक की टीम कहाँ-कहाँ पहुंची, किन विरासतों का किया निरीक्षण और संरक्षण को लेकर क्या-क्या सुझाव दिए...
कभी मिथिला की सांस्कृतिक चेतना, वैभव, विद्वता और स्थापत्य वैभव का प्रतीक रहा राज दरभंगा आज अपने अस्तित्व की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक से गुजर रहा है। जिन महलों की चौखटों पर कभी देश-विदेश के विद्वानों, राजनेताओं और कला-साधकों के चरण पड़े थे, जहां से शिक्षा, संस्कृति, संगीत और साहित्य की अलख पूरे भारत में जगी थी, वही ऐतिहासिक धरोहरें आज उपेक्षा, प्रशासनिक उदासीनता और समय की मार से कराहती प्रतीत होती हैं. पढ़े पूरी खबर...
दरभंगा। कभी मिथिला की सांस्कृतिक चेतना, वैभव, विद्वता और स्थापत्य वैभव का प्रतीक रहा राज दरभंगा आज अपने अस्तित्व की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक से गुजर रहा है। जिन महलों की चौखटों पर कभी देश-विदेश के विद्वानों, राजनेताओं और कला-साधकों के चरण पड़े थे, जहां से शिक्षा, संस्कृति, संगीत और साहित्य की अलख पूरे भारत में जगी थी, वही ऐतिहासिक धरोहरें आज उपेक्षा, प्रशासनिक उदासीनता और समय की मार से कराहती प्रतीत होती हैं। ऐसे समय में जब राज दरभंगा की अनेक ऐतिहासिक संरचनाएं धीरे-धीरे जर्जरता की अंतिम सीमा की ओर बढ़ रही हैं, तब धरोहर संरक्षण के क्षेत्र में भारत की अग्रणी संस्था इंटैक (INTACH) का दरभंगा आगमन एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंह ठाकुर के नेतृत्व में आयोजित विरासत यात्रा ने न केवल इन धरोहरों की वर्तमान स्थिति का अवलोकन किया, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि अब भी संरक्षण की दिशा में ठोस पहल नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियां केवल तस्वीरों और पुस्तकों में ही इस गौरवशाली इतिहास को देख सकेंगी।

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वैभव से वीरानी तक का सफर: दरभंगा राज केवल एक राजघराना नहीं था, बल्कि यह मिथिला की आत्मा का प्रतिनिधित्व करता था। महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह, रमेश्वर सिंह और कामेश्वर सिंह जैसे दूरदर्शी शासकों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, साहित्य, संस्कृति और धर्म के क्षेत्र में जो योगदान दिया, वह आज भी इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में दर्ज है।किन्तु वर्तमान परिदृश्य अत्यंत चिंताजनक है। राज परिसर के कई हिस्से वर्षों से संरक्षण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कहीं दीवारों से प्लास्टर झड़ रहा है, कहीं ऐतिहासिक भवनों की छतें कमजोर हो चुकी हैं, तो कहीं अमूल्य दस्तावेज नमी और समय के प्रहार से प्रभावित हो रहे हैं। कई स्थानों पर अतिक्रमण, अव्यवस्था और रखरखाव की कमी स्पष्ट दिखाई देती है।

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मोती महल से इंद्र भवन तक : इतिहास की मौन चीख: इंटैक की टीम ने मोती महल परिसर का निरीक्षण किया। कभी राजसी गरिमा का प्रतीक रहा यह परिसर आज भी अपनी भव्यता के अवशेषों को संजोए हुए है, किंतु उसके संरक्षण की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। मनोकामना मंदिर, नरगौना रेलवे टर्मिनल, नरगौना पैलेस, राम मंदिर, लक्ष्मीश्वर विलास पैलेस और प्रशासनिक भवनों की स्थिति का अवलोकन करते हुए टीम ने महसूस किया कि कई संरचनाओं को तत्काल वैज्ञानिक संरक्षण की आवश्यकता है। विशेष चिंता का विषय राज किला और उससे जुड़ी ऐतिहासिक संरचनाएं रहीं। एक समय यह परिसर मिथिला की राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था, लेकिन आज इसके कई हिस्सों में समय के घाव स्पष्ट देखे जा सकते हैं। इंद्र भवन, यूरोपियन गेस्ट हाउस तथा कंकाली मंदिर जैसे भवन केवल ईंट-पत्थरों के ढांचे नहीं हैं, बल्कि वे उस कालखंड के जीवंत साक्ष्य हैं जब दरभंगा राज की पहचान पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में थी।

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सूखते वृक्ष, मिटती प्राकृतिक धरोहर: विरासत केवल भवनों तक सीमित नहीं होती। किसी सभ्यता की पहचान उसके प्राकृतिक परिवेश से भी होती है। इंटैक की टीम ने परिसर में मौजूद दुर्लभ शाखाइ तार, भद्राक्ष तथा अन्य ऐतिहासिक महत्व वाले वृक्षों की दयनीय स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की। कई वृक्ष सूख चुके हैं, जबकि अनेक अपने अस्तित्व के अंतिम चरण में पहुंच गए हैं। यह केवल वनस्पतियों का क्षरण नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक स्मृति का क्षरण है जो पीढ़ियों से इस भूमि से जुड़ी रही है। मिथिला सदियों से ज्ञान और विद्वता की भूमि रही है। यहां संरक्षित तालपत्र और भोजपत्र पर लिखी गई पांडुलिपियां भारतीय ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहर हैं। इन दस्तावेजों का महत्व केवल बिहार तक सीमित नहीं है। ये भारतीय दर्शन, साहित्य, धर्म, इतिहास और संस्कृति के ऐसे साक्ष्य हैं जिनका मूल्यांकन शब्दों में संभव नहीं। यदि इनका वैज्ञानिक संरक्षण नहीं हुआ तो अनमोल ऐतिहासिक सामग्री हमेशा के लिए नष्ट हो सकती है।

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रामबाग और राज परिसर की वर्तमान स्थिति: दरभंगा के लोग जानते हैं कि रामबाग मैदान और राज परिसर कभी सामाजिक, सांस्कृतिक और खेल गतिविधियों का प्रमुख केंद्र हुआ करते थे। पिछले वर्षों में यहां कुछ सकारात्मक प्रयास अवश्य हुए हैं, किंतु आज भी परिसर के अनेक हिस्से व्यापक संरक्षण और पुनरुद्धार की मांग कर रहे हैं। कई स्थानों पर जलजमाव, अव्यवस्थित रखरखाव और ऐतिहासिक संरचनाओं के आसपास उचित संरक्षण व्यवस्था का अभाव देखने को मिलता है। स्थानीय इतिहासकारों और जागरूक नागरिकों का मानना है कि यदि राज परिसर को समग्र दृष्टिकोण से विकसित किया जाए, तो यह न केवल बिहार बल्कि पूरे देश का प्रमुख हेरिटेज टूरिज्म केंद्र बन सकता है।राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंह ठाकुर ने स्पष्ट कहा कि राज दरभंगा परिसर की धरोहरों को तत्काल संरक्षण की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि राज परिवार पहल करता है, तो इंटैक तकनीकी विशेषज्ञता, संरक्षण योजना, प्रलेखन और पुनरुद्धार के क्षेत्र में हरसंभव सहयोग देने के लिए तैयार है। यह वक्तव्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि धरोहर संरक्षण केवल भावनात्मक विषय नहीं बल्कि अत्यंत तकनीकी प्रक्रिया है। किसी भी ऐतिहासिक संरचना को बचाने के लिए विशेषज्ञ वास्तुविदों, इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और संरक्षण विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है।

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पुस्तकालय और अभिलेखागार : ज्ञान का खजाना: महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन के पुस्तकालय और अभिलेखीय संग्रहों का अवलोकन करते हुए इंटैक की टीम ने इसकी विशेष सराहना की। दुर्लभ दस्तावेज, ऐतिहासिक पत्र, पांडुलिपियां और शोध सामग्री केवल दरभंगा की नहीं बल्कि संपूर्ण मिथिला और बिहार की बौद्धिक धरोहर हैं। इनका डिजिटलीकरण और वैज्ञानिक संरक्षण समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है। दरभंगा की जनता वर्षों से यह प्रश्न पूछ रही है कि आखिर इतनी महत्वपूर्ण धरोहरों के संरक्षण के लिए व्यापक और स्थायी योजना क्यों नहीं बन पाई। हर वर्ष विरासत दिवस मनाए जाते हैं, सेमिनार आयोजित होते हैं, तस्वीरें खींची जाती हैं और चिंताएं व्यक्त की जाती हैं। लेकिन धरातल पर परिणाम अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाते। यदि राज दरभंगा की विरासतों को वास्तव में बचाना है, तो केवल बैठकों और घोषणाओं से काम नहीं चलेगा। इसके लिए दीर्घकालिक मास्टर प्लान, वित्तीय संसाधन, कानूनी संरक्षण, जनभागीदारी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होगी। राज दरभंगा केवल भवनों का समूह नहीं है। यह मिथिला की अस्मिता, सांस्कृतिक गौरव, बौद्धिक परंपरा और ऐतिहासिक चेतना का प्रतीक है। जब कोई महल ढहता है तो केवल ईंटें नहीं टूटतीं, बल्कि इतिहास का एक अध्याय भी बिखर जाता है। जब कोई दुर्लभ वृक्ष सूखता है तो केवल एक पेड़ नहीं मरता, बल्कि पीढ़ियों की स्मृतियां भी समाप्त हो जाती हैं। इंटैक की यह विरासत यात्रा एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि समय तेजी से निकल रहा है। अवसर इसलिए कि अभी भी बहुत कुछ बचाया जा सकता है। दरभंगा की धरती आज अपने अतीत की ओर देखकर मानो यही प्रश्न कर रही है.... क्या आने वाली पीढ़ियां भी मोती महल, लक्ष्मीश्वर विलास पैलेस, राज किला, नरगौना पैलेस और उन अमूल्य पांडुलिपियों को उसी गौरव के साथ देख पाएंगी, जैसा कभी उनके पूर्वजों ने देखा था? या फिर यह सब इतिहास की धूल में विलीन हो जाएगा?इस प्रश्न का उत्तर अब केवल राज परिवार, प्रशासन या किसी संस्था को नहीं, बल्कि पूरे मिथिला समाज को मिलकर देना होगा। क्योंकि विरासत किसी एक व्यक्ति की नहीं होती, वह पूरी सभ्यता की सामूहिक स्मृति होती है।
