देखिए डीजीपी साहब… कहीं वर्दी के भीतर ही तो नहीं सुलग रही वह अदृश्य आग, जिसका धुआँ अब चाय की दुकानों से उठकर पूरे सिस्टम को निगलने लगा है....जहाँ कानून के रखवाले ही खामोशी से नियमों की चिता सजाकर, नशे की चिंगारियों में न्याय की आत्मा को झोंक रहे हैं, और ‘सेटलमेंट’ की फुसफुसाहटें उस सन्नाटे को और भी भयावह बना रही हैं!

बेगूसराय की ज़मीन से उठी यह तस्वीर सिर्फ एक वायरल वीडियो नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का नंगा सच है, जो खुद को कानून का रखवाला कहती है। बखरी थाना क्षेत्र की एक साधारण-सी चाय दुकान अचानक उस शर्मनाक मंच में बदल गई, जहाँ वर्दी की गरिमा को धुएँ के छल्लों में उड़ाया जा रहा था। जिस चौकीदार पर कानून की चौकसी की जिम्मेदारी थी, वही खुलेआम गांजे की चिलम सुलगाकर कानून का मज़ाक बना रहा था. पढ़े पूरी खबर.....

देखिए डीजीपी साहब… कहीं वर्दी के भीतर ही तो नहीं सुलग रही वह अदृश्य आग, जिसका धुआँ अब चाय की दुकानों से उठकर पूरे सिस्टम को निगलने लगा है....जहाँ कानून के रखवाले ही खामोशी से नियमों की चिता सजाकर, नशे की चिंगारियों में न्याय की आत्मा को झोंक रहे हैं, और ‘सेटलमेंट’ की फुसफुसाहटें उस सन्नाटे को और भी भयावह बना रही हैं!
देखिए डीजीपी साहब… कहीं वर्दी के भीतर ही तो नहीं सुलग रही वह अदृश्य आग, जिसका धुआँ अब चाय की दुकानों से उठकर पूरे सिस्टम को निगलने लगा है....जहाँ कानून के रखवाले ही खामोशी से नियमों की चिता सजाकर, नशे की चिंगारियों में न्याय की आत्मा को झोंक रहे हैं, और ‘सेटलमेंट’ की फुसफुसाहटें उस सन्नाटे को और भी भयावह बना रही हैं!

बेगूसराय की ज़मीन से उठी यह तस्वीर सिर्फ एक वायरल वीडियो नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का नंगा सच है, जो खुद को कानून का रखवाला कहती है। बखरी थाना क्षेत्र की एक साधारण-सी चाय दुकान अचानक उस शर्मनाक मंच में बदल गई, जहाँ वर्दी की गरिमा को धुएँ के छल्लों में उड़ाया जा रहा था। जिस चौकीदार पर कानून की चौकसी की जिम्मेदारी थी, वही खुलेआम गांजे की चिलम सुलगाकर कानून का मज़ाक बना रहा था।

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वीडियो में दिख रहा चौकीदार....नंदकिशोर पासवान। न सिर्फ नशे में डूबा है, बल्कि उसके चेहरे पर किसी भय, किसी शर्म, किसी जिम्मेदारी का नामोनिशान तक नहीं है। उसके आसपास बैठे लोग, हँसी-ठहाकों के बीच उस ‘नशे की महफिल’ को और गहरा बना रहे हैं। यह दृश्य किसी अपराध कथा का हिस्सा नहीं, बल्कि उस सच्चाई का आईना है, जिसमें कानून खुद अपराधी की गोद में बैठा दिखाई देता है।

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और यह मामला सिर्फ नशे तक सीमित नहीं है। वीडियो में ‘सेटलमेंट’ जैसे शब्दों की गूंज उस सड़े-गले सिस्टम की बू को और तेज कर देती है। यह सिर्फ एक चिलम नहीं, बल्कि पूरे तंत्र के सड़ांध का धुआँ है, जो समाज की सांसों को जहरीला बना रहा है। सवाल उठता है....क्या यही है बिहार की नशाबंदी? क्या यही है कानून का खौफ? बिहार सरकार वर्षों से नशाबंदी कानून को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताती रही है। सख्ती, छापेमारी, गिरफ्तारी.....इन सबके बीच आम आदमी डरता है, झुकता है, कानून का पालन करता है। लेकिन जब वही कानून लागू कराने वाले वर्दीधारी इस तरह खुलेआम नियमों को रौंदते नजर आएं, तो यह सिर्फ विडंबना नहीं, बल्कि एक भयावह मज़ाक बन जाता है।

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स्थानीय लोगों के बीच आक्रोश की लहर है। लोग पूछ रहे हैं.....जब चौकीदार ही नशे में डूबा है, तो आम आदमी किससे न्याय की उम्मीद करे? जब वर्दी ही अपराध का अड्डा बन जाए, तो कानून की किताबें सिर्फ कागज़ का पुलिंदा बनकर रह जाती हैं। वीडियो वायरल होते ही पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है। अधिकारी अब जांच, कार्रवाई और सख्ती की बात कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई उस धब्बे को मिटा पाएगी, जो इस घटना ने वर्दी पर लगा दिया है? या फिर यह भी कुछ दिनों की औपचारिकता बनकर रह जाएगी?

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यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की गलती नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी का काला अध्याय है। यह उस सच्चाई को उजागर करती है, जहाँ जिम्मेदारी दम तोड़ चुकी है, और जवाबदेही रसातल में जा चुकी है। वर्दी सिर्फ कपड़ा नहीं होती, वह विश्वास का प्रतीक होती है। लेकिन जब वही वर्दी धुएँ में लिपटी नजर आए, तो समाज के विश्वास की चिता भी उसी आग में जलने लगती है। बेगूसराय की यह घटना एक चेतावनी है....अगर अब भी व्यवस्था नहीं जागी, तो कानून का यह मज़ाक एक दिन पूरे समाज को अपनी गिरफ्त में ले लेगा। तब न कोई वर्दी बचेगी, न कोई व्यवस्था....सिर्फ अराजकता का धुआँ होगा, जो हर सच को अपने भीतर निगल जाएगा।