मिथिला के अमर शहीद रामफल मंडल की स्मृति में उठी चेयर की पुकार, इतिहास के पन्नों से विश्वविद्यालय के भविष्य तक पहुँची आवाज
मिथिला की धरती ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में ऐसे अनेक सपूतों को जन्म दिया, जिनके संघर्ष, साहस और बलिदान की गूंज समय की लंबी सुरंगों को पार करते हुए आज भी सुनाई देती है। इन्हीं अमर सेनानियों में एक नाम है...स्व. रामफल मंडल। सीतामढ़ी जिले के बाजपट्टी प्रखंड अंतर्गत मधुरापुर ग्राम के इस वीर सपूत ने देश की आजादी के संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाते हुए अपना सर्वस्व राष्ट्र के चरणों में अर्पित कर दिया. पढ़े पूरी खबर.....
दरभंगा। मिथिला की धरती ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में ऐसे अनेक सपूतों को जन्म दिया, जिनके संघर्ष, साहस और बलिदान की गूंज समय की लंबी सुरंगों को पार करते हुए आज भी सुनाई देती है। इन्हीं अमर सेनानियों में एक नाम है...स्व. रामफल मंडल। सीतामढ़ी जिले के बाजपट्टी प्रखंड अंतर्गत मधुरापुर ग्राम के इस वीर सपूत ने देश की आजादी के संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाते हुए अपना सर्वस्व राष्ट्र के चरणों में अर्पित कर दिया।

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आज, दशकों बाद, उसी अमर शहादत की स्मृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। मांग उठी है कि ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा में स्व. रामफल मंडल की पावन स्मृति में उच्चस्तरीय अकादमिक चेयर की स्थापना की जाए। यह मांग केवल किसी स्मारक या नामपट्टिका तक सीमित नहीं है। इसके पीछे इतिहास को जीवित रखने, युवा पीढ़ी को स्वतंत्रता आंदोलन की अनकही गाथाओं से जोड़ने और शहीदों के विचारों को अकादमिक विमर्श का हिस्सा बनाने की एक गंभीर सोच दिखाई देती है।इसी मांग को लेकर डॉ. अरुण कुमार मंडल ने ग्रामीण विधानसभा के विधायक ईश्वर मंडल को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन के माध्यम से उन्होंने कहा कि देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीदों की पुण्यस्मृति में शिक्षण संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में अकादमिक चेयर की स्थापना की परंपरा रही है। ऐसे में मिथिला की धरती के अमर सपूत रामफल मंडल की स्मृति को भी विश्वविद्यालय के अकादमिक संसार में स्थायी स्थान मिलना चाहिए।

डॉ. मंडल का कहना था कि इस प्रकार की अकादमिक चेयर का उद्देश्य केवल किसी महान व्यक्तित्व के नाम को जीवित रखना नहीं होता, बल्कि उसके जीवन, संघर्ष, विचार, सामाजिक सरोकार और शहादत को शोध एवं अध्ययन का विषय बनाना भी होता है। यदि ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में रामफल मंडल के नाम से अकादमिक चेयर स्थापित होती है तो आने वाली पीढ़ियों के युवाओं को उनके जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान को विस्तार से जानने-समझने का अवसर प्राप्त होगा। दरअसल, इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यही रही है कि समय बीतने के साथ अनेक महान संघर्षों की स्मृतियां धीरे-धीरे धुंधली होती चली जाती हैं। जिन लोगों ने आजादी की सुबह देखने के लिए अपने जीवन की संध्या राष्ट्र के नाम कर दी, उनके संघर्षों की कहानियां कई बार स्थानीय स्मृतियों, बुजुर्गों की जुबान और पुराने दस्तावेजों तक सिमटकर रह जाती हैं। अकादमिक चेयर की स्थापना इस विस्मृति के अंधेरे के विरुद्ध एक संस्थागत दीपक साबित हो सकती है।

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इसके माध्यम से शोधार्थी रामफल मंडल के जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका पर शोध कर सकेंगे। उनके समय के सामाजिक और राजनीतिक परिवेश का अध्ययन किया जा सकेगा। स्थानीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन अध्यायों को भी सामने लाने का अवसर मिलेगा, जो इतिहास की मुख्यधारा में अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं। इस अवसर पर उज्ज्वल कुमार ने कहा कि ऐसे अकादमिक चेयर के माध्यम से समय-समय पर प्रख्यात विद्वानों के अकादमिक उद्बोधन आयोजित किए जा सकते हैं। इससे युवाओं में राष्ट्रप्रेम, सामाजिक चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों के प्रति समझ विकसित करने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि स्व. रामफल मंडल की पुण्यस्मृति में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में अकादमिक चेयर की स्थापना की मांग केवल एक व्यक्ति की स्मृति को सम्मान देने की मांग नहीं है, बल्कि यह उस पूरी पीढ़ी को सम्मान देने की पहल है, जिसने स्वतंत्र भारत के निर्माण की नींव अपने संघर्ष और बलिदान से रखी।

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मांग के साथ यह भाव भी जुड़ा है कि शहादत केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं होती, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रश्न भी छोड़ जाती है....क्या हम उन बलिदानों को याद रख पाए? रामफल मंडल की स्मृति में अकादमिक चेयर इसी प्रश्न का एक संस्थागत उत्तर बन सकती है। ज्ञापन प्राप्त करने के बाद विधायक ईश्वर मंडल ने आश्वासन दिया कि वे शीघ्र ही इस विषय को लेकर ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति से मुलाकात करेंगे और मांग को आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे। अब निगाहें विश्वविद्यालय की ओर हैं। क्या यह मांग केवल एक ज्ञापन की फाइल बनकर रह जाएगी, या फिर आने वाले दिनों में विश्वविद्यालय परिसर में ऐसा अकादमिक केंद्र आकार लेगा, जहां रामफल मंडल की जीवनगाथा पर शोध होगा, स्वतंत्रता आंदोलन के अनछुए पन्ने पलटे जाएंगे और युवा पीढ़ी अपने ही इतिहास के उन नायकों से परिचित होगी, जिनके बलिदान की रोशनी में आज का भारत खड़ा है?

यह आने वाला समय तय करेगा। लेकिन इतना तय है कि मधुरापुर के उस अमर सपूत की स्मृति को विश्वविद्यालय की अकादमिक चेतना से जोड़ने की आवाज अब उठ चुकी है। यह आवाज केवल अतीत को याद करने की आवाज नहीं, बल्कि इतिहास को भविष्य की पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने की पुकार है। मिथिला की मिट्टी में दफन शहादतों की कहानियां यदि शोध, शिक्षा और विमर्श का हिस्सा बनती हैं, तो शायद इतिहास के वे बंद दरवाजे भी खुलेंगे, जिनके पीछे स्वतंत्रता संघर्ष की ऐसी अनेक गाथाएं आज भी खामोश खड़ी हैं।रामफल मंडल की स्मृति में अकादमिक चेयर की मांग उसी बंद दरवाजे पर दस्तक है....एक ऐसी दस्तक, जिसके पीछे मिथिला के इतिहास, शौर्य और बलिदान की अनगिनत प्रतिध्वनियां सुनाई देती हैं।
