दरभंगा अग्निकांड: लापरवाह अफसरों पर कब टूटेगी सख्ती की तलवार? जनता का गुस्सा फूटा!

दरभंगा के मनोरथा और बेंता गांवों में लगी आग ने ऐसा तांडव मचाया कि 110 से ज्यादा घर राख के ढेर में बदल गए। लाखों की संपत्ति स्वाहा, करीब 1000 लोग सड़क पर, और प्रशासन के बड़े-बड़े अफसरों की नींद नहीं टूटी! यह कोई फिल्मी ड्रामा नहीं, बल्कि हकीकत है, जहां ग्रामीणों के आंसुओं और चीखों के बीच हायाघाट CO शशि भास्कर कुर्सी पर बैठकर हंसते नजर आए। सवाल यह है—इन लापरवाह अफसरों पर सख्ती की तलवार कब टूटेगी, या ये सिर्फ गरीबों की तकलीफ का तमाशा देखने आए थे??.... पढ़े पुरी खबर

दरभंगा अग्निकांड: लापरवाह अफसरों पर कब टूटेगी सख्ती की तलवार? जनता का गुस्सा फूटा!
दरभंगा अग्निकांड: लापरवाह अफसरों पर कब टूटेगी सख्ती की तलवार? जनता का गुस्सा फूटा!; फोटो: मिथिला जन जन की आवाज

दरभंगा: दरभंगा के मनोरथा और बेंता गांवों में लगी आग ने ऐसा तांडव मचाया कि 110 से ज्यादा घर राख के ढेर में बदल गए। लाखों की संपत्ति स्वाहा, करीब 1000 लोग सड़क पर, और प्रशासन के बड़े-बड़े अफसरों की नींद नहीं टूटी! यह कोई फिल्मी ड्रामा नहीं, बल्कि हकीकत है, जहां ग्रामीणों के आंसुओं और चीखों के बीच हायाघाट CO शशि भास्कर कुर्सी पर बैठकर हंसते नजर आए। सवाल यह है—इन लापरवाह अफसरों पर सख्ती की तलवार कब टूटेगी, या ये सिर्फ गरीबों की तकलीफ का तमाशा देखने आए थे?

आग का राक्षसी रूप, सिलेंडर ब्लास्ट ने बिगाड़ा खेल: मनोरथा में सिलेंडर ब्लास्ट के साथ आग ने ऐसा कहर बरपाया कि संजीता जैसे लोगों के घर, जेवर, और सपने पल में जल गए। बेंता में दोपहर 3 बजे शुरू हुआ आग का खेल 100 से ज्यादा घरों को निगल गया। एक पीड़ित की चीख थी, "बेटे की शादी का सामान जल गया, अब क्या मुंह दिखाऊंगा?" ग्रामीणों ने जान हथेली पर रखकर चापाकल और तालाब से पानी डाला, लेकिन फायर ब्रिगेड डेढ़ घंटे बाद तीन छोटी गाड़ियों के साथ पहुंची—जैसे जलते घरों का मजाक उड़ाने! बाद में चार बड़े टैंकर आए, तब जाकर आग थमी, लेकिन तब तक सब कुछ खत्म।

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हंसते CO, चुप्पी साधे अफसर: जनता का खून खौला हायाघाट CO शशि भास्कर का कुर्सी पर बैठकर हंसना और बहेड़ी CO धनश्री बाला की चुप्पी ने लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। ग्रामीण चिल्ला रहे थे, "साहब, मदद करो!" और ये साहब सवालों से मुंह फेरते रहे। क्या इनके लिए गरीबों की जिंदगी सिर्फ एक नाटक है? जनता पूछ रही है—ऐसे अफसरों को सजा कब? क्या इनके खिलाफ फाइलें धूल खाती रहेंगी, या कोई बड़ा एक्शन होगा?

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राहत का ढोंग, जवाबदेही का खेल: जिला प्रशासन ने राहत सामग्री बांटने और खाने का इंतजाम करने की ढोल पीट दी, लेकिन मौके पर अफसरों की चुप्पी ने सारा खेल खोल दिया। पीड़ितों के घर, कागजात, 2 लाख नकद, 10 तोला सोना-चांदी सब जल गया, और ये साहब "सूची तैयार हो रही है" का राग अलाप रहे हैं। यह राहत है या जनता को बेवकूफ बनाने का नया ड्रामा? ग्रामीण चीख रहे हैं—हमें मुआवजा दो, जिंदगी दोबारा शुरू करने का हक दो!

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जनता का हुंकार: अब नहीं सहेंगे! यह अग्निकांड सिर्फ आग की कहानी नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी का चिट्ठा है। फायर ब्रिगेड की देरी, अफसरों की बेशर्मी, और राहत का ढीला रवैया—सब मिलकर चीख रहा है कि अब बहुत हुआ! जनता मांग कर रही है—लापरवाह अफसरों को सस्पेंड करो, सख्त कार्रवाई करो, वरना यह गुस्सा सड़कों पर फूटेगा। सरकार सुन ले—अब आश्वासन नहीं, एक्शन चाहिए। सवाल वही—इन बड़े साहबों पर गाज कब गिरेगी?