माँ श्यामा मंदिर न्यास में छह महीने का सन्नाटा, नियुक्ति से बैंक खाते तक उठे सवाल; सामूहिक निर्णय के बीच प्रशासनिक फैसलों की आहट, पांच न्यासियों के पत्र ने खोली व्यवस्था की परतें....अब तय करेगा अगला कदम, न्यास चलेगा समिति से या आदेश से?

दरभंगा की आस्था, इतिहास और धार्मिक पहचान से गहराई से जुड़ा माँ श्यामा मंदिर न्यास समिति इन दिनों पूजा-अर्चना से इतर एक ऐसे विवाद के केंद्र में है, जिसने न्यास के कामकाज की पारदर्शिता, निर्णय लेने की प्रक्रिया और प्रशासनिक हस्तक्षेप को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। न्यास समिति के भीतर असंतोष अब बंद कमरों की चर्चा तक सीमित नहीं रहा। न्यास के दो उपाध्यक्षों समेत पांच न्यासियों ने संयुक्त रूप से अध्यक्ष को पत्र भेजकर न्यास की बैठक तत्काल बुलाने, पूर्व में लिए गए निर्णयों के अनुरूप कार्रवाई करने तथा ऐसे कार्यों पर रोक लगाने की मांग की है. पढ़े पूरी खबर.....

माँ श्यामा मंदिर न्यास में छह महीने का सन्नाटा, नियुक्ति से बैंक खाते तक उठे सवाल; सामूहिक निर्णय के बीच प्रशासनिक फैसलों की आहट, पांच न्यासियों के पत्र ने खोली व्यवस्था की परतें....अब तय करेगा अगला कदम, न्यास चलेगा समिति से या आदेश से?
माँ श्यामा मंदिर न्यास में छह महीने का सन्नाटा, नियुक्ति से बैंक खाते तक उठे सवाल; सामूहिक निर्णय के बीच प्रशासनिक फैसलों की आहट, पांच न्यासियों के पत्र ने खोली व्यवस्था की परतें....अब तय करेगा अगला कदम, न्यास चलेगा समिति से या आदेश से?

दरभंगा। दरभंगा की आस्था, इतिहास और धार्मिक पहचान से गहराई से जुड़ा माँ श्यामा मंदिर न्यास समिति इन दिनों पूजा-अर्चना से इतर एक ऐसे विवाद के केंद्र में है, जिसने न्यास के कामकाज की पारदर्शिता, निर्णय लेने की प्रक्रिया और प्रशासनिक हस्तक्षेप को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। न्यास समिति के भीतर असंतोष अब बंद कमरों की चर्चा तक सीमित नहीं रहा। न्यास के दो उपाध्यक्षों समेत पांच न्यासियों ने संयुक्त रूप से अध्यक्ष को पत्र भेजकर न्यास की बैठक तत्काल बुलाने, पूर्व में लिए गए निर्णयों के अनुरूप कार्रवाई करने तथा ऐसे कार्यों पर रोक लगाने की मांग की है, जिन पर न्यास समिति की सामूहिक स्वीकृति नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यासियों ने अपने पत्र में बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद अधिनियम, 1950 की कंडिका 15(2) तथा न्यास समिति के गठन से संबंधित अधिसूचना ज्ञापांक 2929, दिनांक 26 नवंबर 2022 की कंडिका 13 का हवाला दिया है। उनका दावा है कि प्रावधानों के अनुसार न्यास समिति की बैठक प्रत्येक तीन माह में होनी चाहिए और न्यास से जुड़े निर्णय समिति द्वारा बहुमत के आधार पर लिए जाने हैं। लेकिन न्यासियों के पत्र में दावा किया गया है कि पिछली बैठक को लगभग छह माह बीत चुके हैं। यहीं से विवाद की असली कहानी शुरू होती है।

तीन महीने में बैठक का प्रावधान, छह महीने से इंतजार क्यों: न्यासियों द्वारा अध्यक्ष को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि संबंधित अधिनियम और न्यास समिति की अधिसूचना में बैठक को लेकर स्पष्ट व्यवस्था है। पत्र के मुताबिक, न्यास समिति की बैठक प्रत्येक तीन माह में बुलायी जानी है। इतना ही नहीं, न्यास से जुड़े निर्णय सामूहिक रूप से समिति द्वारा लिए जाने हैं। न्यासियों का सवाल है कि यदि न्यास समिति की बैठक नियमित अंतराल पर होना आवश्यक है तो छह महीने से बैठक क्यों नहीं हुई? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि न्यास से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक एवं वित्तीय विषयों के साथ-साथ नियुक्ति प्रक्रिया और आगामी धार्मिक आयोजन जैसे विषय सामने हैं। उपाध्यक्ष पंडित कमलाकांत झा ने भी बैठक की आवश्यकता बताते हुए कहा है कि आगामी नवाह यज्ञ को देखते हुए न्यास समिति की बैठक जरूरी है, ताकि महत्वपूर्ण विषयों पर सामूहिक रूप से निर्णय लिया जा सके।

2025 में निकला विज्ञापन, चयन हुआ… फिर पूरी प्रक्रिया पर सवाल क्यों: विवाद का दूसरा और सबसे संवेदनशील हिस्सा नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ा है। न्यासियों के पत्र में कहा गया है कि नियुक्ति के लिए वर्ष 2025 में न्यास समिति के निर्णय के आधार पर विज्ञापन जारी किया गया था। पत्र के अनुसार, सचिव-सह-जिलाधिकारी की देखरेख में चयन प्रक्रिया भी आगे बढ़ी और चयन की अनुशंसा तक की गयी। लेकिन न्यासियों का आरोप है कि इसके बाद न्यास समिति की बैठक में कोई सामूहिक निर्णय लिए बिना ही पूरी नियुक्ति प्रक्रिया को निरस्त कर दिया गया। यही नहीं, पत्र में यह भी कहा गया है कि बाद में पुनः विज्ञापन जारी किया गया और उसमें नए पद को भी शामिल कर दिया गया। न्यासियों ने इसी बिंदु पर मूल सवाल उठाया है.... जिस नियुक्ति प्रक्रिया की शुरुआत न्यास समिति के निर्णय से हुई थी, उसे समाप्त करने का निर्णय भी क्या न्यास समिति की बैठक में नहीं होना चाहिए था? यही वह सवाल है जिसने न्यास समिति के भीतर असंतोष को और गहरा कर दिया है।

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निर्णय न्यास का, कार्रवाई प्रशासनिक स्तर पर न्यासियों की सबसे बड़ी आपत्ति: संयुक्त पत्र में न्यासियों ने सीधे तौर पर यह चिंता व्यक्त की है कि न्यास समिति के निर्णय एवं अधिसूचना के विपरीत कई कार्य न्यास के सामूहिक निर्णय के बिना प्रशासनिक स्तर पर किए जा रहे हैं। पत्र में उदाहरण के तौर पर नियुक्ति प्रक्रिया और न्यास के खाते के संचालन का उल्लेख किया गया है। न्यासियों का कहना है कि न्यास के निर्णयों की अनदेखी कर यदि प्रशासनिक स्तर पर निर्णय लिए जाते हैं, तो फिर न्यास समिति की सामूहिक भूमिका और उसके निर्णयों का महत्व क्या रह जाता है? यही प्रश्न अब पूरे विवाद के केंद्र में दिखाई दे रहा है। मामला सिर्फ नियुक्ति तक सीमित नहीं है।न्यासियों ने न्यास के बैंक खाते के संचालन को लेकर भी गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। पत्र में कहा गया है कि न्यास के खाते के संचालन के लिए तीन सदस्यों के हस्ताक्षर की व्यवस्था में कोषाध्यक्ष के हस्ताक्षर को अनिवार्य बताया गया था। न्यासियों का दावा है कि इस व्यवस्था के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर इसमें बदलाव किया गया और अन्य नामों का समावेश कर दिया गया। और इससे भी अधिक गंभीर आरोप यह है कि इस पूरी कार्रवाई की सूचना तक न्यास समिति को नहीं दी गयी। यदि न्यासियों द्वारा लगाए गए ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का मामला नहीं रहेगा, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करेगा कि न्यास की वित्तीय व्यवस्था और उसके संचालन से संबंधित निर्णय आखिर किस स्तर पर और किस प्रक्रिया के तहत लिए जा रहे हैं?

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चार न्यासियों के पत्र पर भी कार्रवाई नहीं होने का दावा: पत्र में एक और महत्वपूर्ण बात कही गयी है। न्यासियों का कहना है कि उपाध्यक्ष द्वय समेत चार न्यासी सदस्यों द्वारा पहले भी पत्र प्रेषित किया गया था, लेकिन उस पत्र का अपेक्षित संज्ञान नहीं लिया गया। अब पांच न्यासियों के संयुक्त हस्ताक्षर वाला पत्र सामने आया है। इसमें उपाध्यक्ष पंडित कमलाकांत झा, प्रो. जयशंकर झा तथा न्यासी सदस्य प्रो. श्रीपति त्रिपाठी, डॉ. संतोष कुमार पासवान, डॉ. अरुण कुमार गिरी के हस्ताक्षर हैं। पत्र की प्रति न्यास समिति के सचिव-सह-जिलाधिकारी को भी उपलब्ध करायी गयी है। इससे यह स्पष्ट है कि मामला अब केवल न्यास समिति के आंतरिक स्तर तक सीमित नहीं रहा है। संयुक्त पत्र में न्यासियों ने स्पष्ट मांग रखी है कि जब तक न्यासियों की विधिवत बैठक नहीं हो जाती, तब तक नियुक्ति सहित ऐसे सभी कार्यों पर रोक लगायी जाए, जिन पर न्यास समिति का समेकित अनुमोदन प्राप्त नहीं है। यानी न्यासियों का कहना है कि पहले बैठक हो, सभी दस्तावेज सामने रखे जाएं, विषयों पर चर्चा हो और फिर समिति के निर्णय के आधार पर आगे की कार्रवाई हो। यह मांग सीधे तौर पर न्यास के निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर उठाए जा रहे सवालों के बीच आई है।

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दस दिन पहले बैठक की सूचना, सात दिन पहले कागजात देने की मांग: न्यासियों ने केवल बैठक बुलाने की मांग नहीं की है, बल्कि बैठक की प्रक्रिया को लेकर भी प्रावधानों का हवाला दिया है। पत्र में बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद अधिनियम की कंडिका 15(2) के अनुसार बैठक की सूचना दस दिन पूर्व देने तथा सभी आवश्यक कागजात सात दिन पूर्व न्यास समिति के सदस्यों को उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया है। इसका मकसद साफ है...बैठक महज औपचारिकता न हो, बल्कि सभी न्यासी संबंधित दस्तावेजों का अध्ययन करके निर्णय प्रक्रिया में भाग ले सकें। यह पूरा घटनाक्रम कई सवालों को जन्म देता है। क्या न्यास समिति की बैठक नियमित रूप से नहीं होने से निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हो रही है? क्या वर्ष 2025 की नियुक्ति प्रक्रिया को समाप्त करने का निर्णय वास्तव में न्यास समिति की सामूहिक बैठक में लिया गया था? यदि नहीं, तो उस प्रक्रिया को निरस्त करने का अधिकार किस स्तर पर प्रयोग किया गया? नए विज्ञापन में नए पद को शामिल करने का निर्णय किस आधार पर लिया गया? न्यास के बैंक खाते के संचालन में पूर्व निर्धारित हस्ताक्षर व्यवस्था में बदलाव किस निर्णय के आधार पर हुआ? और सबसे बड़ा सवाल....जब न्यास समिति मौजूद है और उसके निर्णय लेने की एक निर्धारित प्रक्रिया है, तो क्या उन निर्णयों के बाहर प्रशासनिक स्तर पर होने वाली कार्रवाई की जानकारी न्यासियों को मिलनी चाहिए या नहीं? इन सवालों का जवाब संबंधित पक्षों के दस्तावेज और आधिकारिक स्पष्टीकरण ही दे सकते हैं।

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अब गेंद अध्यक्ष और प्रशासन के पाले में: पांच न्यासियों के हस्ताक्षर वाला यह पत्र अब एक तरह से पूरे मामले को सार्वजनिक बहस के सामने ले आया है। न्यासियों ने अपनी आपत्तियां लिखित रूप में रख दी हैं। उन्होंने अधिनियम और न्यास की अधिसूचना का हवाला देते हुए बैठक बुलाने की मांग कर दी है। नियुक्ति प्रक्रिया, बैंक खाते और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर भी उन्होंने अपने सवाल दर्ज करा दिए हैं।अब देखना यह होगा कि माँ श्यामा मंदिर न्यास समिति के अध्यक्ष और सचिव-सह-जिलाधिकारी इस पत्र पर क्या कार्रवाई करते हैं। क्या तत्काल न्यास समिति की बैठक बुलायी जाती है? क्या वर्ष 2025 की नियुक्ति प्रक्रिया और उसके बाद की कार्रवाई का पूरा रिकॉर्ड न्यासियों के सामने रखा जाता है? क्या बैंक खाते के संचालन में हुए बदलाव का आधार सार्वजनिक किया जाता है? और क्या उन सभी प्रशासनिक कार्रवाइयों पर समिति की सामूहिक स्वीकृति ली जाएगी, जिन पर न्यासियों ने आपत्ति जतायी है? माँ श्यामा मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि दरभंगा की आस्था और सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र है। ऐसे में न्यास के भीतर उठने वाले प्रशासनिक सवालों को केवल आंतरिक मतभेद कहकर टाल देना शायद पर्याप्त नहीं होगा। पांच न्यासियों ने लिखित रूप से सवाल उठाए हैं। अधिनियम की धाराओं का हवाला दिया है। बैठक की मांग की है। नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक की मांग की है। बैंक खाते के संचालन को लेकर सवाल उठाए हैं। अब जरूरी है कि इन सवालों का जवाब भी उसी स्पष्टता के साथ सामने आए। क्योंकि मामला किसी एक व्यक्ति, पद या नियुक्ति का नहीं है। सवाल है माँ श्यामा मंदिर न्यास आखिर किस व्यवस्था के तहत चलेगा: सामूहिक निर्णय से या प्रशासनिक आदेशों के आधार पर? फिलहाल न्यासियों की नजर अगली बैठक पर है। और शहर की नजर इस बात पर कि छह महीने के इंतजार के बाद जब न्यास की बैठक होगी, तो बंद फाइलों से कौन-कौन से सवाल बाहर निकलेंगे।