चौगमा की मिट्टी में दबा था कौन-सा सपना, जिसने दरभंगा की इस गुमनाम राह को अंतरराष्ट्रीय पर्दे तक पहुंचा दिया? रंगमंच से निकला वह चेहरा अब ‘अनकंडीशनल’ के रहस्यमय संसार में किस किरदार के साथ दिखाई देगा, जहां कहानी अपराध, रिश्तों और अनकहे राज के बीच करवट लेती है....जानिए उस कलाकार की पूरी दास्तान, जिसने गांव से निकलकर दुनिया के बड़े मंच पर दस्तक दी।
कहावत है....जहाँ चाह, वहाँ राह।कभी-कभी यह महज कहने भर की बात लगती है, लेकिन जब किसी छोटे से गांव की मिट्टी से निकला कोई कलाकार अपनी आंखों में बड़े पर्दे का सपना लेकर लगातार आगे बढ़ता है और एक दिन उसका नाम अंतरराष्ट्रीय परियोजना के कलाकारों की सूची में दिखाई देता है, तब यही कहावत एक पूरी कहानी बन जाती है. पढ़े पूरी रिपोर्ट.....
बेनीपुर (दरभंगा)। कहावत है....जहाँ चाह, वहाँ राह। कभी-कभी यह महज कहने भर की बात लगती है, लेकिन जब किसी छोटे से गांव की मिट्टी से निकला कोई कलाकार अपनी आंखों में बड़े पर्दे का सपना लेकर लगातार आगे बढ़ता है और एक दिन उसका नाम अंतरराष्ट्रीय परियोजना के कलाकारों की सूची में दिखाई देता है, तब यही कहावत एक पूरी कहानी बन जाती है। दरभंगा के बेनीपुर प्रखंड का चौगमा गांव। एक सामान्य-सा गांव, अपनी मिट्टी, अपने लोग और अपनी सहज जिंदगी। इसी मिट्टी से निकलकर अभिनय की दुनिया में अपनी पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़े मोहन आनंद झा की कहानी अब स्थानीय रंगमंच से निकलकर अंतरराष्ट्रीय डिजिटल दुनिया तक पहुंच चुकी है। यह कहानी किसी एक रात में मिली सफलता की कहानी नहीं है। इसके पीछे रंगमंच के मंच पर बिताए गए दिन हैं, किरदारों को समझने की कोशिश है, संवादों के पीछे छिपे भावों को पकड़ने की साधना है और लगातार खुद को बेहतर बनाने की कोशिश है। और अब इसी सफर का एक नया दृश्य सामने आया है। मोहन आनंद झा अंतरराष्ट्रीय वेब सीरीज ‘अनकंडीशनल’ का हिस्सा बने हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तैयार की गई इस वेब सीरीज में उन्होंने ‘लहली के बेटे’ की भूमिका निभाई है। सीरीज के आधिकारिक कलाकार विवरण में उनका नाम शामिल होना उनके अभिनय सफर के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यानी जिस कहानी की पहली पंक्तियां चौगमा के गांव से लिखी गई थीं, उसकी पटकथा अब अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच चुकी है।

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चौगमा से शुरू हुआ सफर, मंजिलों ने बदला रास्ता: हर कलाकार के जीवन में एक ऐसा मोड़ आता है, जब वह तय करता है कि उसे केवल अभिनय करना नहीं है, बल्कि अभिनय को अपनी पहचान बनाना है। मोहन आनंद झा के लिए यह रास्ता रंगमंच से होकर निकला। थिएटर ने उन्हें केवल मंच पर खड़ा होना नहीं सिखाया, बल्कि किरदार को जीने की कोशिश करना सिखाया। संवाद कैसे बोले जाते हैं, चेहरे की भाव-भंगिमा किस तरह किसी किरदार की कहानी कहती है, मंच पर मौजूदगी कैसे बनाए रखी जाती है और किसी चरित्र की मानसिकता को अपने अभिनय में कैसे उतारा जाता है....इन सबकी शुरुआती सीख उन्हें रंगमंच से मिली। यही वह आधार था, जिस पर आगे उनके अभिनय सफर की इमारत खड़ी होती चली गई। रंगमंच से मिले अनुभव के बाद उन्होंने फिल्मों और टेलीविजन की दुनिया की ओर कदम बढ़ाया। कैमरे के सामने अभिनय मंच से बिल्कुल अलग होता है। यहां हर भाव को अलग तरीके से साधना पड़ता है। दृश्य की बारीकी, कैमरे की स्थिति, संवाद की लय और निर्देशक की अपेक्षा...सब कुछ कलाकार के सामने एक नई चुनौती लेकर आता है। मोहन आनंद झा ने इसी बदलती दुनिया के साथ खुद को ढालने की कोशिश जारी रखी। धीरे-धीरे उनका सफर टेलीविजन और फिल्म परियोजनाओं तक पहुंचा और डिजिटल माध्यम ने उनके लिए एक और दरवाजा खोल दिया।

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फिल्म से टेलीविजन और अब डिजिटल दुनिया: अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए मोहन आनंद झा ने अलग-अलग माध्यमों में काम किया। उन्होंने ‘सीक्रेट पाकेटमार’ जैसे फिल्म प्रोजेक्ट में भी अभिनय किया। फिल्म और टेलीविजन के अनुभवों के बाद डिजिटल माध्यम में उनकी सक्रियता बढ़ी। यही वह दौर था, जब अभिनय की दुनिया तेजी से बदल रही थी और वेब सीरीज ने कलाकारों के लिए नए अवसरों के दरवाजे खोल दिए। अब इसी बदलते माध्यम के बीच उनका नाम अंतरराष्ट्रीय वेब सीरीज ‘अनकंडीशनल’ से जुड़ा है। यह उनके सफर का केवल एक और प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक ऐसा पड़ाव है जहां चौगमा से निकले कलाकार का अभिनय अलग-अलग देशों और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से आए कलाकारों के साथ एक ही परियोजना में दिखाई देता है।

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‘अनकंडीशनल’ में निभाया ‘लहली के बेटे’ का किरदार: अनकंडीशनल ड्रामा और अपराध-रोमांच की पृष्ठभूमि पर आधारित वेब सीरीज है। इस परियोजना का निर्देशन जोनाथन गुरफिंकेल ने किया है, जबकि इसके सह-निर्माता एवं रचनाकार एडम बिजांस्की और दाना इडिसिस हैं। सीरीज का निर्माण स्पाइरो फिल्म्स के लिए किया गया है। इस अंतरराष्ट्रीय परियोजना में लिराज चामामी, तालिया लिन रान, अमीर हदाद, योसी मार्शेक, एवगेनिया डोडिना और व्लादिमीर फ्राइडमैन सहित कई कलाकार जुड़े हैं। इसी कलाकार समूह के बीच बिहार के दरभंगा जिले के बेनीपुर के चौगमा गांव से निकले मोहन आनंद झा का नाम भी मौजूद है। उन्होंने इस परियोजना में ‘लहली के बेटे’ की भूमिका निभाई है। एक अभिनेता के लिए किरदार चाहे कितना भी छोटा या बड़ा क्यों न हो, वह उसके लिए अपनी कला को नए दर्शकों तक पहुंचाने का अवसर होता है। मोहन आनंद झा के लिए यह भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से उनके अभिनय का दायरा स्थानीय और राष्ट्रीय परियोजनाओं से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट तक पहुंचा है।

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कैमरे के पीछे नहीं, कैमरे के सामने कहानी लिखने का सफर: किसी गांव से निकलकर मुंबई या किसी बड़े फिल्मी शहर तक पहुंच जाना अपने आप में कहानी नहीं होती। असल कहानी तब शुरू होती है, जब कलाकार वहां जाकर भी अपने लिए जगह बनाता है। मोहन आनंद झा का सफर इसी कोशिश की कहानी है। रंगमंच से शुरू हुई यात्रा ने उन्हें धीरे-धीरे फिल्मों तक पहुंचाया। फिल्मों के बाद टेलीविजन और फिर डिजिटल माध्यम। हर माध्यम ने उन्हें कुछ नया सिखाया और हर किरदार ने उनके अभिनय के अनुभव में एक नई परत जोड़ी। थिएटर ने उन्हें मंच दिया। फिल्म ने कैमरा दिया। टेलीविजन ने दर्शकों का विस्तार किया। और अब अंतरराष्ट्रीय वेब सीरीज ने उनके अभिनय को एक ऐसे प्रोजेक्ट से जोड़ दिया है, जिसकी पृष्ठभूमि और कलाकारों की दुनिया कहीं अधिक व्यापक है।यही किसी कलाकार की यात्रा का असली विस्तार होता है।

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रंगमंच की रोशनी से अंतरराष्ट्रीय सेट तक: किसी फिल्मी कहानी में अगर यह दृश्य हो कि एक कलाकार छोटे से गांव से निकलता है, मंच पर अभिनय सीखता है, अलग-अलग किरदार निभाता है, फिर कैमरे के सामने आता है और वर्षों बाद अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ एक वेब सीरीज में दिखाई देता है, तो शायद दर्शक इसे फिल्म की पटकथा समझें। लेकिन मोहन आनंद झा के मामले में यह कहानी वास्तविक अभिनय सफर का हिस्सा है। उनकी यात्रा इस बात की भी याद दिलाती है कि प्रतिभा के लिए शुरुआत का स्थान हमेशा निर्णायक नहीं होता। बड़े शहर अवसर दे सकते हैं, लेकिन अवसर मिलने के बाद उसे अपनी प्रतिभा में बदलना कलाकार के हाथ में होता है। चौगमा से निकलने वाले मोहन आनंद झा ने रंगमंच को अपना शुरुआती आधार बनाया और धीरे-धीरे अपने लिए अलग-अलग माध्यमों में रास्ता बनाया। अनकंडीशनल में काम करना उनके लिए इसलिए भी अलग अनुभव रहा कि परियोजना से जुड़े कलाकार और तकनीकी टीम विभिन्न सांस्कृतिक और पेशेवर पृष्ठभूमियों से आती है। अलग-अलग देशों से जुड़े कलाकारों के साथ काम करने पर अभिनय की शैली और काम करने की प्रक्रिया को देखने-समझने का अवसर मिलता है। एक अभिनेता के लिए यह अनुभव केवल कैमरे के सामने निभाए गए किरदार तक सीमित नहीं रहता। सेट पर काम करने की प्रक्रिया, निर्देशक के साथ संवाद, दूसरे कलाकारों के साथ तालमेल और किसी दृश्य को अलग सांस्कृतिक दृष्टिकोण से समझना....ये सभी चीजें उसके अनुभव को व्यापक बनाती हैं। मोहन आनंद झा के लिए भी ‘अनकंडीशनल’ इसी अर्थ में उनके अभिनय सफर का नया अध्याय है।

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‘जहाँ चाह, वहाँ राह’ कहावत से कहानी तक: कभी किसी गांव की पगडंडी पर चलते हुए शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि इसी मिट्टी से निकला कोई कलाकार एक दिन अंतरराष्ट्रीय वेब सीरीज का हिस्सा बनेगा। लेकिन जिंदगी की सबसे खूबसूरत कहानियां अक्सर वहीं से निकलती हैं, जहां शुरुआत में कोई बड़ी कहानी दिखाई नहीं देती। जहाँ चाह, वहाँ राह। मोहन आनंद झा की यात्रा में यह कहावत इसलिए फिट बैठती है क्योंकि उनके सफर में रास्ता पहले से तैयार नहीं था। रास्ता बनता गया। रंगमंच मिला तो उसे आधार बनाया। फिल्म मिली तो कैमरे के सामने अपनी कला को आजमाया। टेलीविजन मिला तो नए दर्शकों तक पहुंचे। डिजिटल माध्यम आया तो उसके साथ कदम मिलाया। और अब अंतरराष्ट्रीय वेब सीरीज का अवसर मिला तो उस मंच पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। मोहन आनंद झा की उपलब्धि को केवल एक अभिनेता की व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में देखना इस कहानी का एक हिस्सा भर होगा। इसमें बेनीपुर और दरभंगा की सांस्कृतिक जमीन की भी एक तस्वीर दिखाई देती है। मिथिलांचल की धरती लंबे समय से साहित्य, संगीत, रंगमंच और कला की परंपरा से जुड़ी रही है। यहां प्रतिभाओं की कमी नहीं रही, लेकिन बड़े मंच तक पहुंचने का रास्ता हमेशा आसान नहीं रहा। ऐसे में चौगमा जैसे गांव से निकले कलाकार का राष्ट्रीय माध्यमों से होते हुए अंतरराष्ट्रीय वेब सीरीज तक पहुंचना स्थानीय युवाओं के लिए यह संदेश जरूर देता है कि शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन सपने छोटे होना जरूरी नहीं।

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हर भूमिका से सीखने की कोशिश: मोहन आनंद झा का मानना है कि अभिनय में लगातार सीखते रहना सबसे जरूरी है। एक कलाकार के लिए प्रत्येक भूमिका अपने आप में सीखने का अवसर होती है। रंगमंच से मिली शिक्षा ने उन्हें किरदार को समझने की दृष्टि दी। संवाद अदायगी, भाव-भंगिमा और चरित्र के अनुरूप खुद को ढालने का अभ्यास वहीं से आया। बाद में कैमरे के सामने काम करते हुए इन्हीं अनुभवों को उन्होंने नए तरीके से इस्तेमाल किया। यही कारण है कि उनके लिए अभिनय केवल संवाद बोल देना नहीं, बल्कि किरदार को समझने और उसके अनुरूप खुद को प्रस्तुत करने की प्रक्रिया है। अब कहानी का अगला दृश्य बाकी है चौगमा से शुरू हुई यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। ‘अनकंडीशनल’ उनके अभिनय सफर का नया पड़ाव है, अंतिम मंजिल नहीं। फिल्म, टेलीविजन और डिजिटल माध्यमों में सक्रिय मोहन आनंद झा आने वाले दिनों में भी नए प्रोजेक्ट्स के साथ आगे बढ़ने की दिशा में काम कर रहे हैं। एक गांव से निकलकर रंगमंच की रोशनी तक पहुंचना, वहां से कैमरे की दुनिया में प्रवेश करना और फिर अंतरराष्ट्रीय वेब सीरीज के कलाकारों के बीच अपना नाम दर्ज कराना....यह सफर बताता है कि अभिनय की दुनिया में रास्ते हमेशा सीधे नहीं होते। कभी मंच रास्ता बनता है। कभी कैमरा। कभी एक छोटा-सा किरदार किसी बड़े अवसर का दरवाजा खोल देता है। और कभी किसी गांव की मिट्टी से उठी कहानी अचानक अंतरराष्ट्रीय पर्दे तक पहुंच जाती है। चौगमा की मिट्टी में शुरू हुई मोहन आनंद झा की कहानी अब ‘अनकंडीशनल’ के जरिए एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां आगे का पर्दा अभी खुलना बाकी है। कहानी का पहला दृश्य गांव में था। अगला दृश्य रंगमंच पर आया। फिर कैमरा चला। फिल्म और टेलीविजन के फ्रेम बदले। डिजिटल दुनिया ने नया मंच दिया। और अब अंतरराष्ट्रीय वेब सीरीज के पर्दे पर एक नाम उभरा...मोहन आनंद झा। कहावत सच साबित करने के लिए शायद इससे खूबसूरत कहानी और क्या होगी....जहाँ चाह, वहाँ राह।
