राज्यपाल के आगमन से ठीक पहले दरभंगा के कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय में उफना कर्मचारियों और पेंशनधारियों का आक्रोश, वेतन-पेंशन भुगतान को लेकर मुख्य द्वार पर उग्र प्रदर्शन, आत्मदाह की कोशिश से दहला पूरा परिसर, जनप्रतिनिधि भी धरने में उतरे..... जानिए आखिर ऐसा क्या हुआ कि सुलग उठा विश्वविद्यालय, पढ़िए पूरी रिपोर्ट

दरभंगा की ऐतिहासिक शैक्षणिक धरती पर उस दिन का दृश्य किसी सामान्य विश्वविद्यालयी हलचल का नहीं, बल्कि एक ऐसे उग्र और भयावह उफान का प्रतीक बन गया, जिसने पूरे प्रदेश के अकादमिक जगत को झकझोर कर रख दिया। बिहार के एकमात्र संस्कृत विश्वविद्यालय.... कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय.... का मुख्य द्वार अचानक आक्रोश, पीड़ा और विस्फोटक नारों से गूंज उठा. पढ़े पूरी रिपोर्ट......

राज्यपाल के आगमन से ठीक पहले दरभंगा के कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय में उफना कर्मचारियों और पेंशनधारियों का आक्रोश, वेतन-पेंशन भुगतान को लेकर मुख्य द्वार पर उग्र प्रदर्शन, आत्मदाह की कोशिश से दहला पूरा परिसर, जनप्रतिनिधि भी धरने में उतरे..... जानिए आखिर ऐसा क्या हुआ कि सुलग उठा विश्वविद्यालय, पढ़िए पूरी रिपोर्ट
राज्यपाल के आगमन से ठीक पहले दरभंगा के कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय में उफना कर्मचारियों और पेंशनधारियों का आक्रोश, वेतन-पेंशन भुगतान को लेकर मुख्य द्वार पर उग्र प्रदर्शन, आत्मदाह की कोशिश से दहला पूरा परिसर, जनप्रतिनिधि भी धरने में उतरे..... जानिए आखिर ऐसा क्या हुआ कि सुलग उठा विश्वविद्यालय, पढ़िए पूरी रिपोर्ट

दरभंगा की ऐतिहासिक शैक्षणिक धरती पर उस दिन का दृश्य किसी सामान्य विश्वविद्यालयी हलचल का नहीं, बल्कि एक ऐसे उग्र और भयावह उफान का प्रतीक बन गया, जिसने पूरे प्रदेश के अकादमिक जगत को झकझोर कर रख दिया। बिहार के एकमात्र संस्कृत विश्वविद्यालय.... कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय.... का मुख्य द्वार अचानक आक्रोश, पीड़ा और विस्फोटक नारों से गूंज उठा।

यह सब उस समय हुआ जब विश्वविद्यालय प्रशासन और राज्य सरकार की प्रतिष्ठा से जुड़ा एक बड़ा क्षण सामने था। अगले ही दिन बिहार के राज्यपाल सह कुलाधिपति लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैय्यद अता हसनैन का विश्वविद्यालय आगमन प्रस्तावित था। लेकिन उससे ठीक पहले परिसर के बाहर जो दृश्य बना, वह किसी प्रशासनिक असफलता की भयावह कहानी सुनाता दिखाई पड़ा। मुख्य द्वार पर एकत्र हुए कर्मचारियों और पेंशनधारियों का आक्रोश किसी ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ा। महीनों से लंबित वेतन और पेंशन के भुगतान की मांग को लेकर वे सड़क पर उतर आए थे। हाथों में तख्तियां, आंखों में पीड़ा और आवाज़ों में उबाल....यह प्रदर्शन धीरे-धीरे एक ऐसे उग्र आंदोलन का रूप लेने लगा, जिसकी प्रतिध्वनि पूरे शहर में सुनाई देने लगी।

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वेतन और पेंशन की पीड़ा से फूटा आक्रोश: प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों और पेंशनधारियों का कहना था कि वे लंबे समय से आर्थिक संकट में जीने को मजबूर हैं। कई कर्मचारी ऐसे हैं जिनके घरों में महीनों से नियमित आय का कोई स्रोत नहीं बचा है। पेंशनधारी बुजुर्गों के सामने तो स्थिति और भी भयावह हो गई है। उनका आरोप है कि सरकार द्वारा वेतन और पेंशन भुगतान के लिए लगभग 178 करोड़ रुपये का आवंटन पहले ही किया जा चुका है। इसके बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन भुगतान को लगातार टालता रहा है। कर्मचारियों का कहना था कि इस विषय पर कई बार बैठकें हुईं। निर्णय भी लिए गए। आश्वासन भी दिए गए। लेकिन जब भुगतान का समय आया, तो फाइलें फिर किसी अंधेरे गलियारे में गुम हो गईं। इस कथित उदासीनता ने कर्मचारियों के भीतर जमा आक्रोश को विस्फोटक रूप दे दिया।

जब प्रदर्शन ने लिया भयावह मोड़: प्रदर्शन के दौरान अचानक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति को स्तब्ध कर दिया। एक पेंशनधारी, जो लंबे समय से भुगतान नहीं मिलने से परेशान बताया जा रहा था, अचानक भीड़ से अलग हुआ और उसने आत्मदाह करने का प्रयास किया। यह क्षण किसी भयावह त्रासदी की शुरुआत जैसा प्रतीत हो रहा था। कुछ ही सेकंड में वहां अफरा-तफरी मच गई। लोग चीख पड़े। कुछ कर्मचारी दौड़कर उस व्यक्ति की ओर बढ़े। सौभाग्य से आसपास मौजूद लोगों ने तत्काल हस्तक्षेप किया और उसे रोक लिया। यदि एक पल की भी देरी होती, तो विश्वविद्यालय के इतिहास में शायद एक ऐसी त्रासदी दर्ज हो जाती, जिसकी गूंज वर्षों तक सुनाई देती। उस भयावह कोशिश ने पूरे आंदोलन को और अधिक गंभीर बना दिया। लोगों की आंखों में गुस्सा और चिंता दोनों साफ दिखाई दे रहे थे।

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जब जनप्रतिनिधि भी उतर आए सड़क पर: स्थिति उस समय और अधिक संवेदनशील हो गई जब आंदोलन को राजनीतिक समर्थन भी मिलने लगा। सीनेट की बैठक में भाग लेने के लिए पहुंचे बेनीपुर के जदयू विधायक विनय कुमार चौधरी और पूर्व विधान पार्षद डॉ. दिलीप कुमार चौधरी विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार तक पहुंचे। लेकिन कर्मचारियों के उग्र विरोध के कारण उन्हें भीतर प्रवेश नहीं करने दिया गया। कुछ देर तक स्थिति असमंजस में रही। फिर अचानक घटनाक्रम ने नया मोड़ लिया।दोनों जनप्रतिनिधि कर्मचारियों के समर्थन में वहीं धरने पर बैठ गए। उनके साथ अन्य सदस्य भी शामिल हो गए। यह दृश्य प्रशासन के लिए किसी चेतावनी से कम नहीं था....क्योंकि अब आंदोलन केवल कर्मचारियों का नहीं रहा, बल्कि उसमें राजनीतिक स्वर भी जुड़ चुका था।

कुलपति पर लगे गंभीर आरोप: धरना स्थल पर नारे और भाषणों का सिलसिला शुरू हो गया। प्रदर्शनकारियों और जनप्रतिनिधियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन, विशेषकर कुलपति लक्ष्मी निवास पांडेय के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए। आरोपों में भ्रष्टाचार और जातिवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे भी शामिल थे। धरना स्थल पर कई बार तीखी बहस हुई। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा। वातावरण इतना तनावपूर्ण हो गया कि कई बार ऐसा लगा मानो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है।

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सिंडिकेट बैठक भी हो गई बाधित: इसी बीच विश्वविद्यालय के भीतर चल रही सिंडिकेट की बैठक भी इस उथल-पुथल की भेंट चढ़ गई। बाहर के विरोध और बढ़ते तनाव के कारण बैठक की कार्यवाही प्रभावित होने लगी। आखिरकार परिस्थितियां ऐसी बन गईं कि बैठक को स्थगित करना पड़ा। यह विश्वविद्यालय के प्रशासनिक इतिहास में एक असामान्य घटना मानी जा रही है.... जब कर्मचारियों के विरोध ने शीर्ष स्तर की बैठक को भी रोक दिया। पूरा दिन विश्वविद्यालय परिसर में तनाव और अनिश्चितता का माहौल बना रहा। मुख्य द्वार के बाहर नारेबाजी जारी थी। कर्मचारी और पेंशनधारी अपनी मांगों पर अड़े थे। अंदर प्रशासनिक हलकों में भी बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी। कई अधिकारी स्थिति पर नजर रखे हुए थे। सुरक्षा व्यवस्था को भी सतर्क कर दिया गया। क्योंकि अगले ही दिन राज्यपाल का आगमन प्रस्तावित था।

राज्यपाल के दौरे से पहले बढ़ी प्रशासन की चिंता: दरअसल यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ जब विश्वविद्यालय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्यक्रम होने वाला था। बिहार के राज्यपाल और विश्वविद्यालय के कुलाधिपति सैय्यद अता हसनैन अगले दिन सीनेट की बैठक में भाग लेने के लिए दरभंगा आने वाले थे। ऐसे में विश्वविद्यालय में बना यह तनावपूर्ण माहौल प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया। अब सबसे बड़ा सवाल यही था कि राज्यपाल के आगमन से पहले स्थिति को कैसे नियंत्रित किया जाएगा।

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विधायक विनय कुमार चौधरी का तीखा आरोप: धरना स्थल पर बोलते हुए जदयू विधायक विनय कुमार चौधरी ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा वेतन और पेंशन भुगतान के लिए 178 करोड़ रुपये का आवंटन किया जा चुका है। इसके बावजूद कर्मचारियों और पेंशनधारियों को भुगतान नहीं किया जा रहा।उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब तक कर्मचारियों और पेंशनधारियों को उनका अधिकार नहीं मिल जाता, तब तक वे किसी भी बैठक में भाग नहीं लेंगे।

विश्वविद्यालय व्यवस्था पर भी उठाए सवाल: विधायक विनय कुमार चौधरी ने विश्वविद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न उठाए। उन्होंने कहा कि शायद यह देश का पहला ऐसा विश्वविद्यालय है जहां छात्रों को परिणाम आने के बाद भी अंकपत्र नहीं दिया जाता। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यूजीसी से नियुक्त शिक्षकों को पिछले 20 महीनों से वेतन नहीं मिला है। इन आरोपों ने पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया।

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संकट की घड़ी में खड़ा विश्वविद्यालय: कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय बिहार का एकमात्र संस्कृत विश्वविद्यालय है। यह संस्थान लंबे समय से प्रदेश में संस्कृत शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। लेकिन मौजूदा घटनाक्रम ने इसकी प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर कर्मचारी और पेंशनधारी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो दूसरी ओर प्रशासन पर आरोपों की बौछार हो रही है। अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आने वाले समय में स्थिति किस दिशा में जाएगी। राज्यपाल के दौरे से पहले यह संकट प्रशासन के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं है। क्या कर्मचारियों की मांगें पूरी होंगी? क्या प्रशासन कोई ठोस समाधान निकाल पाएगा? क्या विश्वविद्यालय का वातावरण फिर सामान्य हो सकेगा? इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में छिपे हैं। लेकिन इतना निश्चित है कि दरभंगा के इस विश्वविद्यालय में उठी यह उथल-पुथल अब केवल एक संस्थान का मामला नहीं रह गई है। यह एक ऐसे संकट की कहानी बन चुकी है, जिसने शिक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक पारदर्शिता और कर्मचारियों के अधिकारों पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। और अब पूरे प्रदेश की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस उफनते विवाद का अंत किस मोड़ पर जाकर होगा।