27 लाख का 'राज़' या सत्ता का सबसे बड़ा दाग? सुप्रीम कोर्ट तक गूंजी दरभंगा नगर निगम के चर्चित शौचालय घोटाले की कहानी, 2027 चुनाव से पहले फिर क्यों मचा सियासी तूफान? कौन लड़ पाएगा चुनाव और किसके लिए हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं लोकतंत्र के दरवाज़े?
कभी जनता के विकास, स्वच्छता और शहर की बेहतरी का प्रतीक माने जाने वाले सार्वजनिक शौचालयों की बंदोबस्ती का मामला आज दरभंगा नगर निगम के इतिहास के सबसे चर्चित विवादों में गिना जाता है। यह सिर्फ 27.19 लाख रुपये की कथित राजस्व क्षति का मामला नहीं रहा, बल्कि ऐसा प्रकरण बन गया जिसने तत्कालीन महापौर, उपमहापौर और सशक्त स्थायी समिति के सदस्यों की राजनीतिक यात्रा पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया... पढ़े पुरे रिपोर्ट.....
दरभंगा। कभी जनता के विकास, स्वच्छता और शहर की बेहतरी का प्रतीक माने जाने वाले सार्वजनिक शौचालयों की बंदोबस्ती का मामला आज दरभंगा नगर निगम के इतिहास के सबसे चर्चित विवादों में गिना जाता है। यह सिर्फ 27.19 लाख रुपये की कथित राजस्व क्षति का मामला नहीं रहा, बल्कि ऐसा प्रकरण बन गया जिसने तत्कालीन महापौर, उपमहापौर और सशक्त स्थायी समिति के सदस्यों की राजनीतिक यात्रा पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया। वर्ष 2027 के नगर निकाय चुनाव की आहट के बीच यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। कारण यह है कि जिन जनप्रतिनिधियों को वित्तीय अनियमितता के आरोप में पद से हटाया गया था, उनके चुनाव लड़ने की पात्रता को लेकर चर्चा फिर तेज हो गई है। वर्षों पहले शुरू हुई यह कानूनी लड़ाई पटना हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची, लेकिन अंततः सरकार की कार्रवाई बरकरार रही।

Advertisement
एक शिकायत जिसने बदल दी पूरी तस्वीर: कहानी की शुरुआत 25 जुलाई 2018 से होती है। वार्ड पार्षद मधुबाला सिन्हा, पूर्व पार्षद प्रदीप गुप्ता तथा अन्य शिकायतकर्ताओं ने तत्कालीन प्रमंडलीय आयुक्त के समक्ष गंभीर आरोप लगाए। शिकायत में कहा गया कि नगर निगम के सार्वजनिक शौचालयों की बंदोबस्ती 66 लाख रुपये में होनी थी, लेकिन नियमों के विपरीत लगभग 27 लाख रुपये की छूट देकर एक निजी ठेकेदार को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। आरोप यह भी था कि इस निर्णय से नगर निगम को सीधा आर्थिक नुकसान हुआ और सरकारी राजस्व प्रभावित हुआ। शिकायत के बाद प्रशासनिक स्तर पर पूरे मामले की जांच प्रारंभ हुई।

Advertisement
जांच में क्या मिला: प्रमंडलीय आयुक्त द्वारा कराई गई जांच में वित्तीय अनियमितताओं की पुष्टि होने की बात सामने आई। जांच रिपोर्ट नगर विकास एवं आवास विभाग को भेजी गई। रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया कि सार्वजनिक संपत्ति के आवंटन में निर्धारित नियमों और वित्तीय अनुशासन का पालन नहीं किया गया। यहीं से मामला केवल प्रशासनिक जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नगर निकाय प्रशासन में जवाबदेही और पारदर्शिता का बड़ा उदाहरण बन गया।

Advertisement
दिसंबर 2021: जब हुई ऐतिहासिक कार्रवाई: जांच रिपोर्ट के आधार पर दिसंबर 2021 में बिहार सरकार के नगर विकास एवं आवास विभाग ने बड़ा फैसला लेते हुए तत्कालीन महापौर वैजयंती देवी खेड़िया, उपमहापौर बदरुज्ज्मा खान और सशक्त स्थायी समिति के सात अन्य सदस्यों को उनके पद से हटा दिया। यह कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि नगर निकायों में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को पदमुक्त किए जाने की घटनाएं सामान्य नहीं होतीं। विभाग ने स्पष्ट किया कि वित्तीय अनियमितता और निगम को हुए नुकसान की जिम्मेदारी तय होने के बाद यह कदम उठाया गया।

Advertisement
हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक... लेकिन नहीं मिली राहत: पदमुक्त किए गए जनप्रतिनिधियों ने सरकार के आदेश को चुनौती दी। पहले मामला पटना हाईकोर्ट पहुंचा। वहां राहत नहीं मिलने पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद भी सरकार के निर्णय में कोई बदलाव नहीं हुआ। अदालतों से राहत नहीं मिलने के बाद विभागीय कार्रवाई प्रभावी बनी रही। यही कारण है कि यह मामला केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि न्यायिक परीक्षण से भी गुजर चुका प्रकरण माना जाता है। यहीं से सबसे बड़ा सवाल सामने आता है। बिहार सरकार के नियमों के अनुसार, वित्तीय अनियमितता और भ्रष्टाचार जैसे मामलों में पद से हटाए गए जनप्रतिनिधियों पर चुनाव लड़ने को लेकर वैधानिक प्रभाव पड़ता है। इसी आधार पर इन जनप्रतिनिधियों के भविष्य को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। हालांकि, पूर्व महापौर वैजयंती देवी खेड़िया का कहना है कि वर्ष 2022 के नगर निगम चुनाव में आरोपित सदस्यों ने स्वयं चुनाव नहीं लड़ा था, बल्कि उनके परिजनों ने चुनाव लड़ा। उनका यह भी दावा है कि वर्ष 2027 के चुनाव से पहले यदि विभाग द्वारा निर्धारित जुर्माने की राशि जमा कर दी जाती है, तो चुनाव लड़ने की संभावना बन सकती है। यह उनका पक्ष है। दूसरी ओर, अंतिम निर्णय संबंधित कानून, सक्षम प्राधिकारी और उस समय की वैधानिक स्थिति पर निर्भर करेगा।

Advertisement
27.19 लाख रुपये की वसूली का आदेश: सरकार ने केवल पद से हटाने तक कार्रवाई सीमित नहीं रखी। नगर निगम को हुए लगभग 27.19 लाख रुपये के नुकसान की वसूली का निर्देश भी संबंधित लोगों के विरुद्ध जारी किया गया। इससे स्पष्ट संदेश गया कि यदि सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाने की जिम्मेदारी तय होती है, तो केवल प्रशासनिक कार्रवाई ही नहीं, आर्थिक दायित्व भी तय किया जा सकता है। नगर निकाय चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे पुराने विवाद फिर राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनने लगे हैं। दरभंगा नगर निगम का यह मामला भी उन्हीं में से एक है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या पुराने चेहरे फिर मैदान में उतर पाएंगे? क्या कानूनी बाधाएं समाप्त होंगी? क्या विभागीय आदेशों में कोई बदलाव होगा? या फिर यह मामला आने वाले चुनाव में भी निर्णायक भूमिका निभाएगा? इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं।

Advertisement
दरभंगा की राजनीति के लिए एक सीख: यह मामला केवल एक व्यक्ति, एक पद या एक निर्णय का नहीं है। यह नगर निकाय प्रशासन में वित्तीय पारदर्शिता, जवाबदेही और विधिक प्रक्रिया के महत्व को भी रेखांकित करता है। सार्वजनिक धन और सार्वजनिक संपत्तियों के उपयोग से जुड़े निर्णयों में यदि नियमों की अनदेखी होती है, तो उसके परिणाम केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और कानूनी भी हो सकते हैं। दरभंगा नगर निगम का चर्चित शौचालय आवंटन विवाद वर्षों बाद भी राजनीतिक और कानूनी चर्चा का केंद्र बना हुआ है। जांच, विभागीय कार्रवाई, न्यायालयों की प्रक्रिया और चुनावी पात्रता को लेकर उठते सवाल इसे एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक प्रकरण बनाते हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इस मामले में जिन तथ्यों का उल्लेख किया गया है, वे उपलब्ध शिकायतों, जांच रिपोर्ट, विभागीय कार्रवाई, न्यायालयों के निर्णयों तथा संबंधित पक्षों के सार्वजनिक बयानों पर आधारित हैं। पूर्व महापौर वैजयंती देवी खेड़िया ने भी अपना पक्ष रखा है कि जुर्माना जमा करने के बाद चुनाव लड़ने की संभावना हो सकती है। चुनाव लड़ने की वास्तविक पात्रता का अंतिम निर्णय संबंधित कानून और सक्षम प्राधिकारी द्वारा उस समय लागू नियमों के अनुसार ही किया जाएगा।
