कोलकाता के डलहौजी की ऐतिहासिक खामोशी में फिर सुनाई दी दरभंगा राज की वह कहानी, संगमरमर में ठहरी महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की स्मृति के सामने जुटे मिथिला के लोग, बीते दौर के उन अध्यायों को किया याद जिनमें शिक्षा, समाजसेवा और जनकल्याण की कई अनकही परतें आज भी दर्ज हैं.....आखिर इस ऐतिहासिक प्रतिमा के पीछे छिपी पूरी कहानी क्या है और क्यों फिर चर्चा में आए महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह? पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
डलहौजी की ऐतिहासिक इमारतों, औपनिवेशिक दौर की स्मृतियों और बदलते महानगर के बीच रविवार, 27 सितंबर 2026 को एक ऐसी शख्सियत को याद किया गया, जिसकी पहचान केवल दरभंगा राज के महाराजा तक सीमित नहीं थी। मिथिला विकास परिषद की ओर से कोलकाता के ऐतिहासिक डलहौजी क्षेत्र में स्थापित महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की प्रतिमा के समक्ष श्रद्धांजलि सभा आयोजित कर उनके व्यक्तित्व, कृतित्व, समाजसेवा, शिक्षा-प्रेम और सार्वजनिक जीवन में योगदान को स्मरण किया गया. पढ़े पूरी रिपोर्ट....
कोलकाता। डलहौजी की ऐतिहासिक इमारतों, औपनिवेशिक दौर की स्मृतियों और बदलते महानगर के बीच रविवार, 27 सितंबर 2026 को एक ऐसी शख्सियत को याद किया गया, जिसकी पहचान केवल दरभंगा राज के महाराजा तक सीमित नहीं थी। मिथिला विकास परिषद की ओर से कोलकाता के ऐतिहासिक डलहौजी क्षेत्र में स्थापित महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की प्रतिमा के समक्ष श्रद्धांजलि सभा आयोजित कर उनके व्यक्तित्व, कृतित्व, समाजसेवा, शिक्षा-प्रेम और सार्वजनिक जीवन में योगदान को स्मरण किया गया।

कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि समय बीतने के साथ किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व की स्मृति धुंधली पड़ सकती है, लेकिन उसकी विरासत को बचाए रखने का दायित्व अगली पीढ़ी का होता है। डलहौजी में खड़ी महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की प्रतिमा इसी विरासत का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है।कार्यक्रम की अध्यक्षता मिथिला विकास परिषद के उपाध्यक्ष रघुनाथ चौधरी ने की, जबकि संचालन शक्ति सिन्हा ने किया। पंडित विकास झा, युवा कवि विजय इस्सर, विनोद झा, शक्ति सिन्हा, मदन चौधरी, अरुण झा, पोषणजित सिंह, रमेश झा सहित अनेक गणमान्य लोग एवं मिथिलावासी कार्यक्रम में मौजूद रहे।

डलहौजी की भीड़ में खड़ी वह प्रतिमा, जो दरभंगा की कहानी कहती है: कोलकाता का डलहौजी क्षेत्र आज का बी.बी.डी. बाग...ब्रिटिश भारत के प्रशासनिक और वाणिज्यिक इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इसी ऐतिहासिक परिसर के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की संगमरमर की प्रतिमा स्थित है। कोलकाता नगर निगम की विरासत सूची में भी महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की प्रतिमा को Grade-I heritage के रूप में दर्ज किया गया है। यही वह बात है जो इस प्रतिमा को सामान्य स्मारक से अलग करती है। यह प्रतिमा उस दौर की है जब कोलकाता ब्रिटिश भारत की सत्ता, व्यापार और सार्वजनिक जीवन का एक प्रमुख केंद्र था और ऐसे सार्वजनिक स्थलों पर भारतीय राजाओं एवं सार्वजनिक व्यक्तित्वों की प्रतिमाएं आज की तुलना में बहुत कम दिखाई देती थीं। भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत से जुड़े अभिलेख में भी डलहौजी स्क्वायर के दक्षिण-पश्चिमी कोने में महाराजा दरभंगा की आदमकद बैठी हुई सफेद संगमरमर की प्रतिमा का उल्लेख मिलता है।

एक जरूरी ऐतिहासिक तथ्य: 1901 या 1904: महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की प्रतिमा के संबंध में वर्षों से 1901 का उल्लेख मिलता रहा है। मिथिला विकास परिषद की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में भी इसे 1901 में स्थापित बताया गया है। हालांकि उपलब्ध कला-इतिहास संबंधी अभिलेख एक महत्वपूर्ण अंतर बताते हैं। ब्रिटिश मूर्तिकार एडवर्ड ओन्स्लो फोर्ड द्वारा निर्मित प्रतिमा पर 1901 की तारीख अंकित है। वहीं कोलकाता के इतिहास पर शोध करने वाले स्रोतों के अनुसार प्रतिमा का सार्वजनिक अनावरण 25 मार्च 1904 को तत्कालीन बंगाल के गवर्नर सर एंड्रयू फ्रेजर की उपस्थिति में हुआ था। इसलिए इतिहास को अधिक सटीक ढंग से देखें तो 1901 प्रतिमा के निर्माण/तारीख से और 1904 उसके सार्वजनिक अनावरण से जुड़ा वर्ष माना जा सकता है। यह अंतर छोटा जरूर है, लेकिन किसी ऐतिहासिक धरोहर पर लिखते समय ऐसे तथ्य महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

कौन थे महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह: महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह का जन्म 25 सितंबर 1858 को हुआ था। वे महाराजा महेश्वर सिंह के ज्येष्ठ पुत्र थे। पिता के निधन के बाद वे अल्पायु में ही राजगद्दी के उत्तराधिकारी बने और दरभंगा राज का प्रबंधन कुछ समय तक Court of Wards की व्यवस्था के अंतर्गत रहा। उनकी शिक्षा का स्वरूप भी अपने समय से अलग था। उन्हें पश्चिमी शिक्षा के साथ भारतीय पारंपरिक शिक्षा से भी जोड़ा गया। उनके शिक्षकों में चेस्टर मैकनॉटन का नाम मिलता है, जो बाद में राजकुमार कॉलेज, राजकोट के संस्थापक प्राचार्य बने। इस मिश्रित शिक्षा ने संभवतः उनके सार्वजनिक दृष्टिकोण को व्यापक बनाने में भूमिका निभाई। बहुमत प्राप्त करने के बाद उन्होंने राज के प्रशासन की जिम्मेदारी संभाली और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुए। 25 सितंबर 1879 को उनके वयस्क होने के बाद राज का प्रत्यक्ष संचालन उनके हाथों में आया...यहीं से उनके सार्वजनिक कार्यों का वह दौर शुरू होता है जिसकी चर्चा आज भी इतिहास के पन्नों में होती है। महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की सार्वजनिक छवि को समझने के लिए 1873-74 के बिहार अकाल का संदर्भ अत्यंत महत्वपूर्ण है। उस समय अकाल और खाद्य संकट ने बिहार के बड़े हिस्से को प्रभावित किया था। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों में उल्लेख मिलता है कि दरभंगा राज की ओर से राहत कार्यों पर लगभग तीन लाख पाउंड तक खर्च किया गया। राहत को केवल तत्काल भोजन या दान तक सीमित न रखकर सार्वजनिक निर्माण के माध्यम से रोजगार उपलब्ध कराने की कोशिश भी की गई। सड़क निर्माण, जलस्रोत, सिंचाई और पुलों जैसे कार्यों को अकाल-राहत से जोड़ना उस समय की प्रशासनिक सोच में महत्वपूर्ण प्रयोग था। ऐतिहासिक विवरणों में यह भी उल्लेख है कि राज के विभिन्न हिस्सों में बड़ी संख्या में सड़कें बनवाई गईं और यात्रियों की सुविधा के लिए सड़क किनारे पेड़ लगाए गए। इस दृष्टि से महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह का मॉडल केवल दान देने वाला मॉडल नहीं था; सार्वजनिक निर्माण को आर्थिक राहत और दीर्घकालीन उपयोगिता से जोड़ने का प्रयास भी उसमें दिखाई देता है।

सड़क, पुल, सिंचाई और रेलवे विरासत केवल महलों की नहीं थी: दरभंगा राज की विरासत की चर्चा अक्सर राजमहलों और स्थापत्य तक सीमित कर दी जाती है, लेकिन लक्ष्मीश्वर सिंह के समय के सार्वजनिक कार्यों का दायरा उससे कहीं बड़ा था। ऐतिहासिक स्रोतों में राज के भीतर लोहे के पुलों के निर्माण, सिंचाई व्यवस्था, तालाबों और जलस्रोतों के विकास तथा सार्वजनिक सड़कों के निर्माण का उल्लेख मिलता है। इनका उद्देश्य केवल आवागमन नहीं था; कृषि, व्यापार और अकाल से निपटने की क्षमता बढ़ाना भी इससे जुड़ा था। रेलवे के इतिहास में भी उनका नाम आता है। 1874 में दरभंगा से बाजितपुर तक रेल संपर्क विकसित होने के संदर्भ में महाराजा की भूमिका का उल्लेख मिलता है। Business Standard में प्रकाशित ऐतिहासिक विश्लेषण भी इस रेल संपर्क और अकाल के बाद हुए सार्वजनिक कार्यों के संबंध को रेखांकित करता है। यानी जिस दौर में उत्तर बिहार में आधुनिक परिवहन व्यवस्था अपनी प्रारंभिक अवस्था में थी, उस दौर में दरभंगा राज के स्तर पर रेल, सड़क, पुल और जल प्रबंधन को विकास के साधन के रूप में देखा जा रहा था।

महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह के सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षा था। उपलब्ध अध्ययनों के अनुसार उन्होंने राज के मौजूदा एंग्लो-वर्नाक्युलर विद्यालय को आगे बढ़ाया और उसे मैट्रिक स्तर तक विकसित करने तथा शिक्षा को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में कार्य किया। विभिन्न स्थानों पर राज के विद्यालयों की स्थापना और शिक्षा संस्थानों को आर्थिक सहायता देने का भी उल्लेख मिलता है। अन्य ऐतिहासिक विवरणों में एक एंग्लो-वर्नाक्युलर स्कूल पर £1,490 खर्च करने, करीब 30 अलग-अलग स्तर के वर्नाक्युलर विद्यालयों को चलाने तथा अन्य शिक्षण संस्थानों को आर्थिक सहायता देने का उल्लेख है। यह उस समय की दृष्टि से महत्वपूर्ण था जब शिक्षा का प्रसार आज की तरह व्यापक नहीं था। एक ओर मिथिला की पारंपरिक संस्कृत-आधारित विद्या परंपरा थी, दूसरी ओर अंग्रेजी और आधुनिक शिक्षा का बढ़ता प्रभाव। लक्ष्मीश्वर सिंह का शैक्षणिक दृष्टिकोण इन दोनों धाराओं के बीच से रास्ता निकालता दिखाई देता है। उनकी परोपकारी गतिविधियों का एक बड़ा हिस्सा चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ा था। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार दरभंगा में एक बड़े डिस्पेंसरी के निर्माण और संचालन पर उन्होंने पर्याप्त धन खर्च किया। खड़गपुर में भी चिकित्सा सुविधा के लिए सहायता दी गई तथा अन्य चिकित्सा संस्थानों को आर्थिक सहयोग दिया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि उनकी परोपकार की अवधारणा केवल धार्मिक दान तक सीमित नहीं थी। शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक निर्माण और अकाल-राहत इन सभी क्षेत्रों को उन्होंने सार्वजनिक उपयोगिता से जोड़ा।

महाराजा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: राजसी पहचान से आगे का राजनीतिक अध्याय...महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह का एक कम चर्चित लेकिन महत्वपूर्ण पक्ष उनका राजनीतिक सार्वजनिक जीवन भी है। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शुरुआती समर्थकों और प्रमुख आर्थिक सहयोगियों में गिने जाते हैं। 1885 में कांग्रेस की स्थापना के बाद उसके शुरुआती दौर में उनका आर्थिक सहयोग महत्वपूर्ण माना गया है। 1888 का इलाहाबाद कांग्रेस अधिवेशन उनकी राजनीतिक भूमिका का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। उस समय अधिवेशन के लिए सार्वजनिक स्थल उपलब्ध कराने में कठिनाई की स्थिति बनी तो महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह द्वारा Lowther Castle की संपत्ति उपलब्ध कराने का उल्लेख ऐतिहासिक अभिलेखों में मिलता है। IGNCA के एक प्रकाशित दस्तावेज में भी 1888 के इलाहाबाद कांग्रेस अधिवेशन के संदर्भ में Lowther Castle और महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह का उल्लेख है। यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे उनके सार्वजनिक जीवन का एक दूसरा आयाम सामने आता है...वे केवल अपनी रियासत के प्रशासक नहीं थे, बल्कि उस समय उभर रही भारतीय सार्वजनिक राजनीति की गतिविधियों में भी संसाधन और स्थान उपलब्ध कराने वाले प्रभावशाली भारतीय व्यक्तित्व थे। लक्ष्मीश्वर सिंह का सार्वजनिक जीवन एक दिलचस्प ऐतिहासिक विरोधाभास को सामने रखता है। वे ब्रिटिश शासनकाल के एक बड़े जमींदार और राजघराने के प्रमुख थे, ब्रिटिश प्रशासनिक संस्थाओं में भी उनकी भूमिका रही, लेकिन साथ ही वे भारतीय सार्वजनिक हित के मुद्दों में सक्रिय रहे। वे सुप्रीम लेजिस्लेटिव काउंसिल से जुड़े और 1895 की Royal Commission on Opium के सदस्य भी बने। 1895 में प्रकाशित आयोग की मूल रिपोर्ट में उनका नाम सदस्य के रूप में दर्ज है। यह अपने आप में महत्वपूर्ण दस्तावेजी तथ्य है। आयोग में कुल नौ सदस्यों में वे भारतीय पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाले दो सदस्यों में शामिल थे। ब्रिटिश संसद में हुई चर्चा के रिकॉर्ड में भी Maharaja of Durbhanga (Sir Lakshmeshwar Singh) का उल्लेख मिलता है। इस तरह उनका सार्वजनिक जीवन केवल दरभंगा या मिथिला तक सीमित नहीं था; वे ब्रिटिश भारत के व्यापक प्रशासनिक विमर्श में भी उपस्थित थे।

सम्मान मिला, लेकिन विरासत केवल सम्मान से बड़ी थी: महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह को ब्रिटिश शासन द्वारा उच्च सम्मान भी प्रदान किए गए। लेकिन उनकी ऐतिहासिक पहचान केवल राजकीय उपाधियों या ब्रिटिश सम्मान से तय नहीं होती। उनका वास्तविक सार्वजनिक प्रभाव उन संस्थाओं और कार्यों में दिखाई देता है जिनमें शिक्षा, चिकित्सा, अकाल-राहत, सड़क, पुल, सिंचाई और सार्वजनिक उपयोगिता के कार्य शामिल थे। यही कारण है कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी स्मृति में कोलकाता जैसे तत्कालीन औपनिवेशिक सत्ता-केंद्र में प्रतिमा स्थापित होना अपने आप में एक उल्लेखनीय घटना थी।महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की कोलकाता स्थित प्रतिमा ब्रिटिश मूर्तिकार Edward Onslow Ford ने बनाई थी। प्रतिमा सफेद संगमरमर की है और इसमें महाराजा को राजसी वेशभूषा में बैठे हुए दिखाया गया है। कोलकाता के ऐतिहासिक डलहौजी क्षेत्र में किसी भारतीय महाराजा की ऐसी प्रतिमा का स्थापित होना अपने समय में असाधारण बात थी। Telegraph India के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार 25 मार्च 1904 को तत्कालीन बंगाल के गवर्नर सर एंड्रयू फ्रेजर और अन्य अधिकारियों की उपस्थिति में प्रतिमा का अनावरण हुआ था। आज इस प्रतिमा को देखकर शायद कोई सहज रूप से यह अनुमान न लगाए कि इसके पीछे उत्तर बिहार के दरभंगा राज की कहानी, अकाल-राहत की स्मृतियां, शिक्षा संस्थानों की परंपरा और उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय सार्वजनिक जीवन का एक पूरा अध्याय मौजूद है। समय बीतने के साथ कोलकाता की यह ऐतिहासिक प्रतिमा भी उपेक्षा के दौर से गुजरी। प्रतिमा के आसपास का क्षेत्र कभी-कभी पेड़ों और अन्य अव्यवस्थाओं से घिरा दिखाई देता था और इसकी ओर सामान्य नागरिकों का ध्यान कम जाता था। Telegraph India ने भी इसे लंबे समय तक अपेक्षाकृत अनदेखी रही ऐतिहासिक धरोहर के रूप में दर्ज किया है। यहीं मिथिला विकास परिषद की गतिविधि का वर्तमान संदर्भ महत्वपूर्ण हो जाता है। मिथिला विकास परिषद की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार परिषद की पहल पर प्रतिमा की सफाई तथा उसके संरक्षण के लिए छज्जे के निर्माण की दिशा में पहल की गई। 2025 की प्रकाशित रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल सरकार के लोक निर्माण विभाग द्वारा छतरी/छज्जा निर्माण और प्रतिमा के सौंदर्यीकरण की पहल का उल्लेख है। 27 सितंबर 2026 की श्रद्धांजलि सभा में परिषद के उपाध्यक्ष एवं कार्यक्रम के संयोजक रघुनाथ चौधरी ने प्रतिमा के वर्तमान स्वरूप के लिए परिषद की पहल तथा अध्यक्ष अशोक झा की सक्रियता की सराहना की।

अमेरिका से वीडियो कॉल के जरिए जुड़े अशोक झा: कार्यक्रम में मिथिला विकास परिषद के अध्यक्ष अशोक झा अमेरिका प्रवास के दौरान वीडियो कॉल के माध्यम से जुड़े। उन्होंने उपस्थित मैथिली अनुरागियों को संबोधित करते हुए कहा कि डलहौजी में महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की प्रतिमा के सामने आयोजित स्मृति सभा केवल श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं, बल्कि मिथिला के इतिहास और उसकी विरासत को याद करने का अवसर है। उनके अनुसार महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह को केवल दरभंगा राज के महाराजा के रूप में देखना उनके व्यापक योगदान को सीमित कर देना होगा। शिक्षा, समाजसेवा, संस्कृति और जनकल्याण के क्षेत्र में उनकी भूमिका को व्यापक भारतीय संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। अशोक झा ने यह भी कहा कि कोलकाता में स्थापित यह प्रतिमा मिथिला और बंगाल के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों की जीवंत निशानी है तथा ऐसी धरोहरों को सुरक्षित रखना और नई पीढ़ी को उनके महत्व से परिचित कराना सामूहिक दायित्व है। महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की कहानी को केवल एक राजपरिवार की कहानी मानना शायद अधूरा होगा। दरभंगा की धरती पर शिक्षा और जनकल्याण के कार्यों से लेकर कोलकाता के प्रशासनिक हृदयस्थल में संगमरमर की प्रतिमा तक की यह यात्रा उस समय के सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्कों को भी सामने लाती है। मिथिला के लोगों का कोलकाता से संपर्क केवल रोजगार या प्रवास की कहानी नहीं है। शिक्षा, व्यापार, साहित्य, संस्कृति और सार्वजनिक जीवन के माध्यम से भी दोनों क्षेत्रों के बीच लंबे समय से संबंध रहे हैं। डलहौजी में खड़ी महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की प्रतिमा इस व्यापक संबंध का एक भौतिक प्रमाण है।

आज जब प्रतिमा के सामने लोग जुटे, तो सवाल केवल श्रद्धांजलि का नहीं था: 27 सितंबर की सभा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि आज की पीढ़ी के लिए इतिहास अक्सर केवल पाठ्यपुस्तक की कुछ तारीखों तक सीमित होकर रह जाता है। महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की प्रतिमा के सामने खड़े होकर जब उनके जीवन को देखा जाता है, तो एक साथ कई तस्वीरें सामने आती हैं। अकाल से जूझता बिहार, राहत कार्य में लगा दरभंगा राज, विद्यालयों की स्थापना, चिकित्सा संस्थानों को सहयोग, सड़क और पुल निर्माण, आधुनिक परिवहन की ओर बढ़ता उत्तर बिहार, भारतीय राजनीतिक चेतना का विस्तार और फिर कोलकाता के डलहौजी में संगमरमर की एक प्रतिमा। यही इस स्मृति सभा की सबसे बड़ी सार्थकता भी है। यह केवल किसी दिवंगत महाराजा को पुष्पांजलि देने का कार्यक्रम नहीं था। यह उस इतिहास को फिर से पढ़ने का अवसर था, जिसे समय की धूल ने धीरे-धीरे ढक दिया है। किसी भी ऐतिहासिक प्रतिमा का संरक्षण केवल पत्थर या संगमरमर की सफाई भर नहीं है। उसके साथ जुड़ी स्मृति, दस्तावेज, प्रसंग और उस व्यक्तित्व के योगदान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी संरक्षण का हिस्सा है। महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की डलहौजी स्थित प्रतिमा इसी अर्थ में विशेष महत्व रखती है। यह प्रतिमा दरभंगा के इतिहास को कोलकाता के सार्वजनिक इतिहास से जोड़ती है।कोलकाता नगर निगम की विरासत सूची में इसका Grade-I heritage के रूप में दर्ज होना भी इसकी ऐतिहासिक महत्ता को रेखांकित करता है। मिथिला विकास परिषद की श्रद्धांजलि सभा ने इसी स्मृति को फिर सार्वजनिक विमर्श में लाने का प्रयास किया। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित लोगों ने महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित की और उनकी विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संकल्प व्यक्त किया। शायद किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को याद करने का सबसे सार्थक तरीका यही है...उसकी प्रतिमा पर फूल चढ़ाने के साथ उसके जीवन के उन पन्नों को भी फिर से खोलना, जिनमें समाज, शिक्षा, जनसेवा और सार्वजनिक जीवन की ऐसी कहानियां दर्ज हैं, जो आज भी वर्तमान को अतीत से जोड़ती हैं। महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की डलहौजी स्थित प्रतिमा इसलिए केवल संगमरमर की प्रतिमा नहीं है; वह दरभंगा से कोलकाता तक फैली एक ऐसी ऐतिहासिक स्मृति है, जिसमें मिथिला की सामाजिक चेतना, सार्वजनिक सेवा और उन्नीसवीं शताब्दी के भारत के बदलते राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य की कई परतें एक साथ दिखाई देती हैं।
