नन्हे कदम जब संकट में थाने पहुंचेंगे, तो सवालों से पहले मिलेगा सहारा; दरभंगा के 40 थानों में बना ‘पुलिस अंकल’ का अपना कोना
अब जिले के छोटे बच्चों के लिए थाना केवल कानून-व्यवस्था से जुड़ा स्थान नहीं रहेगा, बल्कि जरूरत की घड़ी में उन्हें सहारा देने वाला एक सुरक्षित ठिकाना भी बनेगा। बच्चों के चेहरे पर थाने का भय कम करने और उन्हें सुरक्षित, सहज एवं बालमैत्री वातावरण उपलब्ध कराने की दिशा में दरभंगा पुलिस ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। जिले के सभी 40 थानों में बाल सहायता कक्ष एवं बाल कोना की शुरुआत कर दी गई है. पढ़े पूरी खबर.....
दरभंगा। अब जिले के छोटे बच्चों के लिए थाना केवल कानून-व्यवस्था से जुड़ा स्थान नहीं रहेगा, बल्कि जरूरत की घड़ी में उन्हें सहारा देने वाला एक सुरक्षित ठिकाना भी बनेगा। बच्चों के चेहरे पर थाने का भय कम करने और उन्हें सुरक्षित, सहज एवं बालमैत्री वातावरण उपलब्ध कराने की दिशा में दरभंगा पुलिस ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। जिले के सभी 40 थानों में बाल सहायता कक्ष एवं बाल कोना की शुरुआत कर दी गई है।

शुक्रवार को जिले के सभी थानों में यह व्यवस्था प्रभावी हुई। लहेरियासराय थाना में वरीय पुलिस अधीक्षक जगुनाथ रेड्डी जला रेड्डी तथा महिला थाना में ग्रामीण पुलिस अधीक्षक साक्षी ने बाल सहायता कक्ष एवं बाल कोना का विधिवत उद्घाटन किया। इस पहल के साथ पुलिस ने बच्चों से जुड़े मामलों को केवल कानूनी प्रक्रिया के दायरे में देखने के बजाय उन्हें संवेदनशीलता, सुरक्षा और संरक्षण के दृष्टिकोण से संभालने की दिशा में कदम बढ़ाया है।

थाने में अब बच्चों के लिए अलग जगह, अलग माहौल: अक्सर किसी घटना, विवाद, शोषण, बाल श्रम, बाल विवाह अथवा किसी अन्य संकट की स्थिति में बच्चा थाना पहुंचता है तो पुलिस की वर्दी, पूछताछ और थाने का वातावरण उसके मन में भय पैदा कर सकता है। इसी स्थिति को बदलने के उद्देश्य से बाल सहायता कक्ष एवं बाल कोना तैयार किया गया है। यहां बच्चों से बातचीत करते समय उनकी उम्र, मानसिक स्थिति और परिस्थिति का विशेष ध्यान रखा जाएगा। कोशिश होगी कि बच्चा बिना भय और संकोच के अपनी बात कह सके तथा उसकी समस्या को गंभीरता से सुना जाए। यानी अब किसी बच्चे के लिए पुलिस अंकल अथवा पुलिस दीदी केवल वर्दी में खड़े कानून के प्रहरी नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उसकी बात सुनने और उसे सुरक्षित रास्ता दिखाने वाले मददगार भी होंगे।

हर थाने में बाल कल्याण पुलिस पदाधिकारी की जिम्मेदारी: अपर पुलिस महानिदेशक, कमजोर वर्ग प्रभाग, अपराध अनुसंधान विभाग, बिहार, पटना के निर्देश के आलोक में जिले के सभी थानों में बाल कल्याण पुलिस पदाधिकारी एवं महिला पुलिसकर्मी की प्रतिनियुक्ति की गई है। इनकी जिम्मेदारी बच्चों से संबंधित समस्याओं को संवेदनशीलता के साथ सुनना, परिस्थितियों को समझना और आवश्यकता के अनुसार तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित करना होगी। बाल सहायता कक्ष के माध्यम से संकट में फंसे बच्चों को तत्काल मदद उपलब्ध कराने के साथ उन्हें संबंधित सेवाओं एवं संस्थानों से जोड़ने की पहल की जाएगी। जरूरतमंद बच्चों को उनके अधिकारों की जानकारी देने के साथ उन्हें आवश्यक सहायता दिलाने की दिशा में भी पुलिस काम करेगी। किसी परेशानी या संकट के कारण थाना पहुंचने वाली बालिकाओं के साथ महिला पुलिसकर्मी संवाद स्थापित करेंगी। उनका प्रयास होगा कि बालिकाएं बिना झिझक अपनी बात रख सकें और उनकी समस्या को समझकर आवश्यक कार्रवाई की जा सके। पुलिस का यह प्रयास खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कई बार बच्चे अथवा बालिकाएं अपनी परेशानी खुलकर सामने नहीं रख पाते। ऐसे में संवेदनशील संवाद, विश्वास का वातावरण और धैर्यपूर्वक उनकी बात सुनना समस्या के समाधान की पहली सीढ़ी बन सकता है।

बाल शोषण से लेकर बाल विवाह तक पुलिस की नजर: वरीय पुलिस अधीक्षक ने स्पष्ट किया है कि बाल शोषण, बाल श्रम और बाल विवाह जैसी गंभीर सामाजिक समस्याओं से बच्चों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। बाल सहायता कक्ष में मिलने वाली शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने की बात कही गई है। किसी बच्चे के साथ अन्याय, शोषण अथवा उसके अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति सामने आने पर संबंधित विभागों एवं संस्थानों के साथ समन्वय स्थापित कर आवश्यक कदम उठाया जाएगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल शिकायत दर्ज करना नहीं, बल्कि बच्चे को संकट की स्थिति से निकालकर उसे आवश्यक संरक्षण एवं सहायता तक पहुंचाना भी है। यदि किसी बच्चे के अभिभावक अथवा परिजन उसकी समस्या को लेकर थाना पहुंचते हैं, तो उनकी शिकायत एवं परेशानी के समाधान के लिए भी तत्काल आवश्यक कदम उठाने की व्यवस्था की गई है। पुलिस की कोशिश होगी कि बच्चे से जुड़े मामले में परिवार को भी उचित मार्गदर्शन मिले और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित सेवा अथवा संस्था से संपर्क स्थापित कराया जाए।

थाने की तस्वीर बदलने की कोशिश: दरभंगा पुलिस की यह पहल मूल रूप से थानों को बच्चों के लिए अधिक सुरक्षित और सहज बनाने की कोशिश है। बाल सहायता कक्ष एवं बाल कोना का उद्देश्य ऐसा वातावरण तैयार करना है, जहां कोई बच्चा अपनी परेशानी लेकर पहुंचे तो उसे सबसे पहले भय नहीं, बल्कि भरोसा महसूस हो। बच्चों के लिए कानून और अधिकारों की जानकारी जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि संकट के समय उन्हें यह भरोसा हो कि उनकी बात सुनी जाएगी। बिहार पुलिस अधिनियम, 2007 की धारा 8(5) तथा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के दिशा-निर्देशों के आलोक में शुरू की गई यह व्यवस्था बच्चों से जुड़े मामलों में पुलिस की भूमिका को और अधिक संवेदनशील बनाने की दिशा में एक कदम है। दरभंगा के सभी 40 थानों में बाल सहायता कक्ष और बाल कोना शुरू होने के बाद संदेश साफ है...बच्चों की सुरक्षा केवल परिवार या समाज की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था से जुड़े तंत्र की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। अब यदि कोई बच्चा संकट में है, किसी अधिकार से वंचित है, शोषण का शिकार है, बाल श्रम या बाल विवाह जैसी परिस्थिति में फंसा है अथवा किसी अन्य सहायता की जरूरत है, तो उसके लिए थाना सहायता का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है। छोटे कदमों से बड़े भरोसे की नींव रखी जा रही है...थाने की वर्दी के पीछे अब बच्चों के लिए ‘पुलिस अंकल’ और ‘पुलिस दीदी’ की एक ऐसी तस्वीर गढ़ने की कोशिश है, जहां डर से पहले सुरक्षा, संकोच से पहले संवाद और शिकायत से पहले संवेदना दिखाई दे।
