नई सरकार का पहला बड़ा वार: बिहार में भूमाफिया–बालू माफिया पर शिकंजा, ED को भेजी गई टॉप–10 सूची में दरभंगा का मोहम्मद रिजवान उर्फ राजा शीर्ष पर, 32 मामलों का आरोपी ‘राजा’ बना संपत्ति जब्ती अभियान की निर्णायक परीक्षा....

बिहार में सत्ता बदली है, लेकिन यह बदलाव केवल कुर्सियों तक सीमित नहीं रहा। नई सरकार के गठन के साथ ही वह अंधेरा, जो वर्षों से जमीन, बालू, शराब और गरीबों की मजबूरी के सहारे फलता-फूलता रहा, अब कानून की तेज रोशनी में बेनकाब होने लगा है। भूमाफिया और बालू माफिया के खिलाफ शुरू हुई सख्त कार्रवाई ने पूरे राज्य के अंडरवर्ल्ड में खलबली मचा दी है. पढ़े पूरी खबर.....

नई सरकार का पहला बड़ा वार: बिहार में भूमाफिया–बालू माफिया पर शिकंजा, ED को भेजी गई टॉप–10 सूची में दरभंगा का मोहम्मद रिजवान उर्फ राजा शीर्ष पर, 32 मामलों का आरोपी ‘राजा’ बना संपत्ति जब्ती अभियान की निर्णायक परीक्षा....
फ़ाइल फ़ोटो: मोहम्मद रिजवान उर्फ राजा (दरभंगा), जिनके खिलाफ जमीन कारोबार से जुड़े कई मामलों की जांच चल रही है।

दरभंगा। बिहार में सत्ता बदली है, लेकिन यह बदलाव केवल कुर्सियों तक सीमित नहीं रहा। नई सरकार के गठन के साथ ही वह अंधेरा, जो वर्षों से जमीन, बालू, शराब और गरीबों की मजबूरी के सहारे फलता-फूलता रहा, अब कानून की तेज रोशनी में बेनकाब होने लगा है। भूमाफिया और बालू माफिया के खिलाफ शुरू हुई सख्त कार्रवाई ने पूरे राज्य के अंडरवर्ल्ड में खलबली मचा दी है।

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इसी कड़ी में सरकार द्वारा टॉप–10 भू माफियाओं की जिन संपत्तियों को जब्त करने की सूची प्रवर्तन निदेशालय (ED) को भेजी गई है, उसमें दरभंगा जिले के मोहम्मद रिजवान उर्फ राजा का नाम सबसे ऊपर बताया जा रहा है। यह नाम अब सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस डरावनी व्यवस्था का प्रतीक बन चुका है, जिसने जमीन को कारोबार और इंसान को मोहरा बना दिया।

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मोदामपुर एकमीघाट से माफिया साम्राज्य तक: सरकारी सूत्रों के अनुसार, दरभंगा जिले के बहादुरपुर प्रखंड अंतर्गत मोदामपुर एकमीघाट निवासी मोहम्मद रिजवान उर्फ राजा को प्रदेश का बड़ा भूमाफिया माना जा रहा है। बताया जाता है कि वह बीते दो वर्षों से जेल में बंद है, लेकिन उसकी परछाईं अब भी जमीन सौदों, विवादों और पीड़ितों की यादों में घूमती है। रिजवान उर्फ राजा पर जमीन के अवैध कारोबार, फर्जी दस्तावेज तैयार करने, धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश से जुड़े करीब 32 गंभीर आपराधिक मामले दर्ज होने की बात सामने आ रही है। इन मामलों में कई ऐसे हैं, जिनमें पीड़ितों की जिंदगी भर की पूंजी एक झटके में निगल ली गई।

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आलीशान मकान, राजनीतिक पहचान और खामोश सवाल: आरोप है कि रिजवान ने अपराध के जरिए अर्जित धन से आलीशान मकान बनवाया, जहां अपने नाम के साथ राजनीतिक दल जदयू के तीर निशान वाली बड़ी तस्वीर लगवाई गई। यह तस्वीर इलाके में केवल सजावट नहीं मानी गई, बल्कि सत्ता और अपराध के कथित गठजोड़ की डरावनी निशानी के रूप में देखी गई।हालांकि राजनीतिक दल की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन यह सवाल इलाके की गलियों से लेकर सत्ता के गलियारों तक गूंज रहा है कि आखिर माफियाओं को इतनी हिम्मत कहां से मिलती है?

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पीड़ित की चीख: करोड़ों की जमीन, लाखों की ठगी: इस पूरे मामले में दरभंगा के प्रतिष्ठित व्यवसायी दिनेश दारुका सामने आए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि एक जमीन सौदे में उनसे 60 लाख रुपये लिए गए, जबकि जमीन का कुल सौदा 5 करोड़ 60 लाख रुपये में तय हुआ था। पीड़ित का दावा है कि उसी जमीन को लेकर किसी अन्य व्यक्ति से भी 1 करोड़ 40 लाख रुपये वसूल लिए गए। यह मामला अब अदालत में विचाराधीन है, लेकिन सरकार द्वारा संपत्ति जब्ती की प्रक्रिया तेज होने के बाद पीड़ितों के मन में यह उम्मीद जगी है कि शायद अब न्याय की लौ अंधेरे को चीर सकेगी और वर्षों से दबा पैसा वापस मिल सकेगा।

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भाई की सफाई, साजिश का दावा: वहीं आरोपी के भाई शम्स तबरेज ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने दावा किया कि रिजवान के नाम पर कोई संपत्ति नहीं है और जिन संपत्तियों की चर्चा हो रही है, वे पूर्वजों की हैं। हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि रिजवान जमीन के कारोबार में सक्रिय था, लेकिन उनका कहना है कि साफ-सुथरे कारोबार में भी झूठे आरोप लगाए जा सकते हैं। शम्स तबरेज ने कई मामलों को साजिश करार देते हुए कहा कि उनके भाई को जानबूझकर फंसाया गया है। लेकिन सवाल यह भी है कि अगर सब कुछ साफ है, तो फिर 32 आपराधिक मामलों की छाया क्यों?

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सरकार की सख्ती और कांपता माफिया तंत्र: राज्य सरकार की सख्ती और ED को भेजी गई सूची के बाद दरभंगा ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार में भूमाफियाओं और बालू माफियाओं के बीच दहशत का माहौल है। जिन जमीनों पर वर्षों से डर और दबदबे की फसल उगाई जाती रही, वहां अब कानून की दस्तक सुनाई दे रही है।यह कार्रवाई केवल एक व्यक्ति या एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि अब बिहार में माफियाराज के लिए जमीन सिकुड़ती जा रही है। हालांकि यह लड़ाई लंबी है और आसान नहीं, लेकिन पहली बार ऐसा लग रहा है कि डर पैदा करने वाले खुद डर के साए में आ खड़े हुए हैं। अब देखना यह है कि यह सख्ती केवल शुरुआत साबित होती है या सचमुच उस अंधेरे का अंत, जिसने वर्षों से बिहार की जमीन, न्याय और इंसानियत को बंधक बना रखा था।