दरभंगा राजकुल की अंतिम जीवित धरोहर एवं महाराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की धर्मपत्नी महारानी कामसुंदरी देवी का आज तड़के सुबह 3 बजे अपने आवास पर निधन, कुछ दिन पहले गिरकर हुई थीं चोटिल....
मिथिला की धरती आज शोक में डूबी है। दरभंगा राजकुल की अंतिम जीवित धरोहर, महाराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की धर्मपत्नी और मिथिला की मातृशक्ति के रूप में पूजित महारानी कामसुंदरी देवी का आज तड़के सुबह करीब तीन बजे अपने आवास पर निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही न केवल एक राजसी जीवन-यात्रा समाप्त हुई, बल्कि मिथिला के इतिहास की एक जीवित कड़ी भी मौन हो गई। 93 वर्षों तक सादगी, गरिमा और परंपरा का निर्वाह करने वाली महारानी का यूँ चले जाना पूरे समाज के लिए गहरा आघात है। दरभंगा राजमहल से लेकर आम जनमानस तक शोक की लहर दौड़ गई है. पढ़े पूरी खबर.....
दरभंगा। मिथिला की धरती आज शोक में डूबी है। दरभंगा राजकुल की अंतिम जीवित धरोहर, महाराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की धर्मपत्नी और मिथिला की मातृशक्ति के रूप में पूजित महारानी कामसुंदरी देवी का आज तड़के सुबह करीब तीन बजे अपने आवास पर निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही न केवल एक राजसी जीवन-यात्रा समाप्त हुई, बल्कि मिथिला के इतिहास की एक जीवित कड़ी भी मौन हो गई। 93 वर्षों तक सादगी, गरिमा और परंपरा का निर्वाह करने वाली महारानी का यूँ चले जाना पूरे समाज के लिए गहरा आघात है। दरभंगा राजमहल से लेकर आम जनमानस तक शोक की लहर दौड़ गई है।

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कुछ दिन पहले हुई थीं चोटिल, फिर लौट आई थीं घर: इस दुखद अंत से कुछ दिन पहले महारानी कामसुंदरी देवी अपने आवास पर ही फिसलकर गिर गई थीं, जिससे वे चोटिल हो गईं। उस समय उन्हें उपचार के लिए निजी चिकित्सकों की निगरानी में रखा गया था। जांच के बाद डॉक्टरों ने गंभीर खतरे से बाहर की बताई और आवश्यक उपचार के बाद उन्हें घर भेज दिया गया था। परिवार और सेवकों को उम्मीद थी कि मातृवत महारानी धीरे-धीरे स्वास्थ्य लाभ करेंगी। राजमहल में वही शांति और वही दिनचर्या लौटने लगी थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था।

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सुबह तीन बजे थम गईं साँसें: आज तड़के, जब दरभंगा की रात गहरी नींद में थी और राजमहल की दीवारें भी मौन थीं, उसी समय महारानी कामसुंदरी देवी की साँसें अचानक थम गईं। यह खबर जैसे ही बाहर आई, पूरे राजपरिवार और मिथिला समाज में शोक की लहर दौड़ गई। राजमहल का आँगन, जो दशकों से इतिहास का साक्षी रहा है, आज मौन है। वहाँ शब्द नहीं, केवल आँसू हैं।

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राजसी सादगी की मिसाल थीं महारानी: महारानी कामसुंदरी देवी केवल एक राजपरिवार की सदस्य नहीं थीं। वे उस युग की प्रतिनिधि थीं, जब राजसी वैभव के साथ-साथ सादगी, सेवा और संस्कृति को जीवन का आधार माना जाता था। महाराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह के साथ उन्होंने जिस गरिमा और संयम के साथ जीवन बिताया, वह आज की पीढ़ी के लिए भी एक उदाहरण है। राजनीति, प्रचार और दिखावे से दूर रहकर उन्होंने मिथिला की परंपराओं को अपने आचरण से जीवित रखा।

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मिथिला समाज के लिए व्यक्तिगत क्षति: महारानी का निधन केवल राजपरिवार की क्षति नहीं है। यह मिथिला के हर उस व्यक्ति की क्षति है, जो दरभंगा राजकुल को अपनी सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखता है। बुजुर्ग कहते हैं अब राजकुल की वह आख़िरी जीवित छाया भी चली गई, जो इतिहास को आँखों से देख चुकी थी। दरभंगा राजकुल का नाम शिक्षा, समाजसेवा और संस्कृति के क्षेत्र में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। महारानी कामसुंदरी देवी उस इतिहास की चलती-फिरती स्मृति थीं। उनके साथ बिताया हर वर्ष मिथिला के अतीत का एक अध्याय था। आज जब वे नहीं रहीं, तो यह महसूस किया जा रहा है कि इतिहास की एक जीवित किताब हमेशा के लिए बंद हो गई।

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शोक में डूबी मिथिला: मंदिरों में प्रार्थनाएँ, घरों में मौन, और मन में एक ही सवाल क्या अब वैसी शांति, वैसी गरिमा, वैसा राजसी संयम फिर देखने को मिलेगा? मिथिला आज अपने तरीके से अपनी महारानी को विदा कर रही है आँसुओं, स्मृतियों और श्रद्धा के साथ। महारानी कामसुंदरी देवी का निधन केवल एक समाचार नहीं है। यह एक युग का अंत है। राजसी वैभव नहीं, बल्कि राजसी मर्यादा का अंत। मिथिला की यह मातृशक्ति अब स्मृतियों में जीवित रहेगी इतिहास में, संस्कृति में और उन शब्दों में, जो आने वाली पीढ़ियाँ पढ़ेंगी।
