जनसुराज में मचा भूचाल सोहन कुमार ने खोला अंदरूनी खेल का काला अध्याय, बोले: विचारधारा मरी, ईमानदारी बिकी, और आदर्श बिकाऊ हो गए! पूरा सच पढ़िए आशिष कुमार की यह रिपोर्ट, ‘मिथिला जन जन की आवाज’ पर जहाँ हर शब्द एक सवाल बनकर चुभता है सत्ता और संगठन के सीने में!
दरभंगा की भूमि ने राजनीति के अनेक प्रयोग देखे हैं कोई विचार लेकर आया, कोई आंदोलन बनकर; पर अंत में सब वहीं जा टिके जहाँ सत्तालोलुपता और स्वार्थ का बाज़ार सजता है। धनतेरस की रात जब लोग लक्ष्मी की पूजा में रमे थे, उसी वक्त घनश्यामपुर के युवा सामाजिक कार्यकर्ता सोहन कुमार राय ने राजनीति की उस परत को उघाड़ दिया जिसे देखने की हिम्मत सबमें नहीं होती। एक साधारण पन्ने पर लिखे उनके शब्द आज की राजनीति पर भारी पड़ गए “मैं जनसुराज से अपनी सदस्यता वापस लेता हूँ… और अब जीवन में किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं बनूँगा।” यह पंक्ति सिर्फ़ त्यागपत्र नहीं है, यह उस प्रणाली के खिलाफ़ एक जनघोषणा है जो ‘सुधार’ का दावा तो करती है, पर ‘स्वार्थ’ में डूबी रहती है..... पढ़े पूरी खबर......
दरभंगा की भूमि ने राजनीति के अनेक प्रयोग देखे हैं कोई विचार लेकर आया, कोई आंदोलन बनकर; पर अंत में सब वहीं जा टिके जहाँ सत्तालोलुपता और स्वार्थ का बाज़ार सजता है। धनतेरस की रात जब लोग लक्ष्मी की पूजा में रमे थे, उसी वक्त घनश्यामपुर के युवा सामाजिक कार्यकर्ता सोहन कुमार राय ने राजनीति की उस परत को उघाड़ दिया जिसे देखने की हिम्मत सबमें नहीं होती। एक साधारण पन्ने पर लिखे उनके शब्द आज की राजनीति पर भारी पड़ गए “मैं जनसुराज से अपनी सदस्यता वापस लेता हूँ… और अब जीवन में किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं बनूँगा।” यह पंक्ति सिर्फ़ त्यागपत्र नहीं है, यह उस प्रणाली के खिलाफ़ एक जनघोषणा है जो ‘सुधार’ का दावा तो करती है, पर ‘स्वार्थ’ में डूबी रहती है।

Advertisement
तीन वर्षों तक जिसने संगठन को दिया सब कुछ, उसी की आवाज़ दबा दी गई!
सोहन कुमार ने जनसुराज आंदोलन से जुड़कर तीन वर्षों तक पूरी निष्ठा से कार्य किया। वे दरभंगा जिला प्रभारी और चुनाव प्रभारी रहे। उन्होंने बताया कि न तो उन्होंने कभी संगठन से पैसे की मांग की, न गाड़ी का उपयोग किया। उन्होंने अपने गाँव घनश्यामपुर में कार्यालय के लिए नया घर बनवाया, अपनी ओर से होली मिलन से लेकर कार्यकर्ता मीटिंग तक सब कुछ किया। वे कहते हैं “मैं सोचता था कि प्रशांत किशोर इतना त्याग कर सकते हैं, तो थोड़ा मुझे भी करना चाहिए। पर अब समझ आया कि यहाँ त्याग नहीं, तालमेल बिकता है।” उनकी पीड़ा सिर्फ़ व्यक्तिगत नहीं है यह उस हर कार्यकर्ता की वेदना है जो किसी विचार में आस्था रखता है, पर अंत में खुद को “सिस्टम की बेमानी व्यवस्था” के नीचे कुचला हुआ पाता है।

Advertisement
जिसे जनता नकारे, कार्यकर्ता नकारे टिकट उसी को मिला!
अलीनगर विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण देते हुए सोहन कुमार ने जो खुलासा किया, उसने जनसुराज की कथित पारदर्शिता की पोल खोल दी। उनका कहना है कि पाँच भावी प्रत्याशियों और 151 सक्रिय कार्यकर्ताओं ने एक संयुक्त पत्र बनाकर स्पष्ट कहा कि एक विशेष व्यक्ति को टिकट न दिया जाए। उस पत्र की कॉपी प्रदेश अध्यक्ष, मुख्य प्रवक्ता, और राज्य स्तर के तमाम वरिष्ठ नेताओं को दी गई। यहाँ तक कि रसीद की कॉपी तक मिथिला जन जन की आवाज समाचार के पास मौजूद है। फिर भी परिणाम उसी व्यक्ति को टिकट मिल गया। सोहन कुमार कहते हैं “यह पारदर्शिता नहीं, पूर्व-नियोजित छल था। जनसुराज अब विचारों का आंदोलन नहीं, चतुर लोगों का आयोजन बन गया है।” उनका आरोप यह भी है कि जिस व्यक्ति को टिकट मिला, उसने कभी संगठन की एक भी सभा आयोजित नहीं की, न कार्ड बनवाया, न जनता से जुड़ा, और जिसने सब कुछ किया उन सब को किनारे कर दिया गया। यह वही बीमारी है जो पहले से सत्ता वाले दलों को खाती रही और अब ‘विकल्प’ का दावा करने वाले जनसुराज में भी घर कर गई।

Advertisement
प्रसांत किशोर अब भीड़ नहीं जुटा पाएंगे अलीनगर में हज़ार लोग भी नहीं आएंगे: सोहन कुमार ने जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर पर सीधा निशाना साधते हुए कहा “अलीनगर में अगर प्रशांत किशोर सभा करेंगे तो एक हज़ार से ज़्यादा लोग नहीं आएंगे। और अगर आए, तो मैं कैमरे के सामने सौ बार उठक-बैठक करूंगा।” उनका तर्क है कि जब विचार मर जाता है, तब भीड़ भी बिखर जाती है। जिस जनता ने किसी को उम्मीद से देखा था, अब वही जनता भ्रम और निराशा के बीच भटक रही है। वे कहते हैं “जनसुराज ने जिन आदर्शों की बात की थी, वह अब टिकट के दलदल में डूब चुका है। जहाँ विचार नहीं, वहाँ भीड़ सिर्फ तमाशबीन होती है।” यह कथन बिहार की राजनीति पर भी चोट है जहाँ हर दल “जन” के नाम पर बना, लेकिन “सुराज” कभी नहीं दे पाया।

Advertisement
राजनीति अब विचारधारा नहीं, अवसरवाद का महोत्सव बन गई है: सोहन कुमार राय का यह त्यागपत्र सिर्फ़ जनसुराज से मोहभंग नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र से निराशा का प्रतीक है। वे कहते हैं “अब हर दल वही गलती दोहराता है। न पारदर्शिता है, न संवाद। जो झुकता है, वही टिकता है जो सच बोलता है, उसे निकाल दिया जाता है।” उनकी यह पंक्तियाँ बिहार की मौजूदा राजनीति का आईना हैं। हर दल में विचारधारा की जगह अब चेहरों ने ले ली है। हर आंदोलन, जब सत्ता की गंध पाता है, तो आदर्श को भुला देता है। सोहन का कहना है “मैं किसी दल में नहीं रहूँगा, लेकिन जिसे वोट दूँगा, उसके कारण को देश के सामने रखूँगा।” यह वाक्य एक सामान्य आदमी के राजनीतिक परिपक्वता की मिसाल है।

Advertisement
यह त्याग नहीं, यह एक जनचेतावनी है: धनतेरस की रात जब लोग सोने-चाँदी के दीये खरीद रहे थे, सोहन कुमार ने अपने भीतर का सोना त्याग दिया सादगी, सत्य और आत्मसम्मान का दीप जलाकर। उन्होंने जो कहा, वो आने वाले राजनीतिक समय की भविष्यवाणी है “जनसुराज अब भीड़ खो चुका है। और जब जनता का भरोसा टूटता है, तो फिर कोई चमत्कार उसे नहीं बचा सकता।” उनका बयान दरभंगा ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार के उस वर्ग की आवाज़ है जो बदलाव चाहता था, पर अब “बदलाव” भी एक “ब्रांड” बन चुका है।

Advertisement
धनतेरस की रात बुझा एक दीया, पर जल उठी सच्चाई की लौ: सोहन कुमार राय का त्यागपत्र एक दस्तावेज़ है जो बताता है कि आदर्श की आग चाहे कितनी छोटी क्यों न हो, वह झूठ की इमारत को हिला सकती है। उन्होंने जो किया, वह राजनीति नहीं आत्मसम्मान का पुनर्जन्म है। आज जब हर कोई पद, टिकट और अवसर की दौड़ में है, वहीं सोहन कुमार ने कहा “जहाँ विचार बिके, वहाँ रहना पाप है।” यह वाक्य सिर्फ़ उनके लिए नहीं, बल्कि हर उस कार्यकर्ता के लिए है जो विचार के लिए जिया, और विश्वासघात का शिकार हुआ।
