महारानी कामसुंदरी देवी के मौन त्याग से दशकों तक जीवित रही दरभंगा राज की स्मृति, उनके न रहने के बाद जिस अनकहे सन्नाटे और भविष्य की आशंकाओं से युवराज कपिलेश्वर सिंह जूझते दिख रहे हैं, उसकी पूरी परतें समझने के लिए यह रिपोर्ट पढ़ना अब केवल विकल्प नहीं, ज़रूरत बनती जा रही है......

मिथिला की धरती केवल विद्या, वैराग्य और वैभव की जन्मभूमि नहीं रही है, यह धरती गवाह रही है उन चीख़ों की भी, जो इतिहास के मोटे ग्रंथों में दर्ज नहीं हो पाईं। उन सिसकियों की भी, जिन्हें सत्ता की चमक ने जानबूझकर अनसुना कर दिया। ऐसी ही एक सिसकी का नाम है महाधिरानी कामसुंदरी देवी। दरभंगा राज की भव्यता पर जब-जब चर्चा होती है, तो स्वर्णजटित महलों, अनगिनत ज़मींदारियों और अपार दान की गाथाएँ दोहराई जाती हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उसी वैभव की छाया में एक स्त्री थी, जो धीरे-धीरे सब कुछ खोती चली गई अधिकार, संपत्ति, सुरक्षा और अंततः स्वयं को भी इतिहास के हवाले कर दिया. पढ़े पूरी खबर.......

महारानी कामसुंदरी देवी के मौन त्याग से दशकों तक जीवित रही दरभंगा राज की स्मृति, उनके न रहने के बाद जिस अनकहे सन्नाटे और भविष्य की आशंकाओं से युवराज कपिलेश्वर सिंह जूझते दिख रहे हैं, उसकी पूरी परतें समझने के लिए यह रिपोर्ट पढ़ना अब केवल विकल्प नहीं, ज़रूरत बनती जा रही है......
महारानी कामसुंदरी देवी के मौन त्याग से दशकों तक जीवित रही दरभंगा राज की स्मृति, उनके न रहने के बाद जिस अनकहे सन्नाटे और भविष्य की आशंकाओं से युवराज कपिलेश्वर सिंह जूझते दिख रहे हैं, उसकी पूरी परतें समझने के लिए यह रिपोर्ट पढ़ना अब केवल विकल्प नहीं, ज़रूरत बनती जा रही है......

दरभंगा। मिथिला की धरती केवल विद्या, वैराग्य और वैभव की जन्मभूमि नहीं रही है, यह धरती गवाह रही है उन चीख़ों की भी, जो इतिहास के मोटे ग्रंथों में दर्ज नहीं हो पाईं। उन सिसकियों की भी, जिन्हें सत्ता की चमक ने जानबूझकर अनसुना कर दिया। ऐसी ही एक सिसकी का नाम है महाधिरानी कामसुंदरी देवी। दरभंगा राज की भव्यता पर जब-जब चर्चा होती है, तो स्वर्णजटित महलों, अनगिनत ज़मींदारियों और अपार दान की गाथाएँ दोहराई जाती हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उसी वैभव की छाया में एक स्त्री थी, जो धीरे-धीरे सब कुछ खोती चली गई अधिकार, संपत्ति, सुरक्षा और अंततः स्वयं को भी इतिहास के हवाले कर दिया।

तिरहुत स्टेट के महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह, जिनका नाम देश के दानवीरों में लिया जाता है, जिनकी उदारता के किस्से आज भी दोहराए जाते हैं, उनकी मृत्यु के बाद जो कहानी शुरू हुई, वह किसी भी संवेदनशील आत्मा को भीतर तक कंपा देती है। मृत्यु से पहले उन्होंने जनता के नाम संपत्ति समर्पित कर दी, लेकिन उनके पीछे जो स्त्री छूट गई, उसे क्या मिला? उत्तर भयावह है त्याग का बोझ, संघर्ष का अंधेरा और उपेक्षा की ठंडी छाया।महाराजाधिराज के देहांत के साथ ही दरभंगा राज के गलियारों में एक सन्नाटा उतर आया। वही गलियारे, जहाँ कभी सत्ता की गूंज होती थी, अब एक युवा विधवा के कदमों की आहट से भी असहज हो उठे। महाधिरानी कामसुंदरी देवी उस समय मात्र 29 वर्ष की थीं। उम्र, जिसमें जीवन सपने देखता है, उन्होंने उसी उम्र में इतिहास का बोझ उठा लिया।

वसीयत का पन्ना जब खुला, तो उसमें भावनाएँ नहीं थीं, सिर्फ़ शर्तें थीं। रहने के लिए एक आवास और जीवन यापन के लिए पाँच हज़ार रुपये। पाँच हज़ार यह राशि नहीं, यह उस व्यवस्था का प्रमाण थी, जहाँ एक महारानी को धीरे-धीरे गुमनामी में धकेल दिया जाता है। उन्हें न तो सत्ता से बाहर किया गया, न ही भीतर रखा गया। वह बीच में लटकती रहीं न रानी, न साधारण नागरिक। यही स्थिति सबसे भयावह होती है, जहाँ मनुष्य पहचान खो देता है।महाधिरानी ने कभी विद्रोह नहीं किया। उन्होंने न अदालतों के दरवाज़े खटखटाए, न ही सार्वजनिक मंचों से अपनी पीड़ा को भुनाया। उन्होंने वह रास्ता चुना, जो सबसे कठिन होता है कर्तव्य का मार्ग।

1949 में स्थापित कामेश्वर रिलीजियस ट्रस्ट, महाराजाधिराज की आत्मा का विस्तार था। शुरुआत में इसकी ज़िम्मेदारी बड़ी महारानी राजलक्ष्मी देवी के पास थी। लेकिन 1976 में उनके निधन के बाद यह पूरा ढाँचा अचानक कामसुंदरी देवी के कंधों पर आ गिरा। यह केवल एक ट्रस्ट नहीं था, यह दरभंगा राज की स्मृति, उसकी धार्मिक-सांस्कृतिक चेतना और उसकी ऐतिहासिक जिम्मेदारी थी। यहाँ से शुरू होता है उस भयावह संघर्ष का अध्याय, जिसकी चर्चा शायद ही कहीं मिलती हो। आर्थिक तंगी, प्रशासनिक उपेक्षा और सामाजिक चुप्पी इन तीनों ने मिलकर महाधिरानी को हर रोज़ एक अदृश्य युद्ध में झोंक दिया। ट्रस्ट चलाने के लिए धन चाहिए था। लेकिन धन के रास्ते बंद थे। सत्ता दूर थी। समाज मौन था। ऐसे में उन्होंने वह निर्णय लिया, जो किसी भी स्त्री के लिए आत्मा चीर देने वाला होता है। उन्होंने अपनी तीस बीघा बग़ीचे की ज़मीन बेच दी।

यह केवल ज़मीन नहीं थी। यह उनकी निजी सुरक्षा, उनका भविष्य, उनका सहारा था। लेकिन इतिहास बचाने के लिए उन्होंने अपने वर्तमान को बेच दिया। उस दिन दरभंगा राज की विरासत एक स्त्री की आँखों से बहकर काग़ज़ों और पुस्तकों में समा गई। 1988 में कल्याणी निवास से जिस संस्था की नींव पड़ी.... महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन वह किसी सरकारी सहायता से नहीं, बल्कि एक विधवा स्त्री के त्याग से खड़ी हुई थी। यहीं से उन्होंने दरभंगा राज परिवार, मिथिला की संस्कृति और सामाजिक इतिहास को बचाने की मुहिम शुरू की। 27 महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन.... यह आंकड़ा नहीं, यह संघर्ष का दस्तावेज़ है। हर पुस्तक के पीछे अनगिनत रातें हैं, जहाँ दीपक की लौ के साथ उम्मीद भी कांपती थी। हज़ारों दुर्लभ दस्तावेज़, 12 से 13 हज़ार से अधिक फोटोग्राफ, दुर्लभ फिल्में.... यह संग्रह नहीं, यह सभ्यता की आख़िरी सांसें हैं, जिन्हें महाधिरानी ने अपनी हथेलियों में थाम लिया।

आज शोधार्थी इन्हें देखकर चकित होते हैं, लेकिन शायद ही कोई सोचता है कि इन दस्तावेज़ों की कीमत किसने चुकाई। वह कीमत थी.....अकेलापन। महाराजाधिराज की जयंती पर होने वाली व्याख्यानमालाएँ, दरअसल महाधिरानी की जीवित उपस्थिति का प्रमाण थीं। वह हर वर्ष यह सुनिश्चित करती थीं कि इतिहास को भुलाया न जाए। यह एक सतत संघर्ष था स्मृति के खिलाफ़ विस्मृति की लड़ाई। मधुबनी जिले के मंगरौनी गांव की पंडित हंसमणि झा की पुत्री, जिनका विवाह 6 मई 1943 को हुआ, शायद ही कभी कल्पना की होगी कि उनका जीवन एक दिन इतिहास की रक्षा में गल जाएगा। 1962 में विधवा होने के बाद उन्होंने अगले 64 वर्षों तक जीवन नहीं जिया, बल्कि एक दायित्व निभाया।

आज जब महाधिरानी कामसुंदरी देवी इस संसार में नहीं हैं, तब यह प्रश्न डराता है.... क्या उनका संघर्ष भी उनके साथ ही दफ़न हो जाएगा? कल्याणी निवास के कमरे आज भी खामोश हैं, लेकिन उस खामोशी में एक भयावह प्रश्न गूंजता है। उत्तराधिकारी राजकुमार कपिलेश्वर सिंह उसी खामोशी के बीच बैठकर भविष्य की राह तलाश रहे हैं। उनकी चिंता केवल संस्था की नहीं, उस आत्मा की है, जिसे महाधिरानी ने अंतिम सांस तक जिंदा रखा। यह कहानी किसी रानी की नहीं, यह कहानी कर्तव्य की कैद में बंद एक स्त्री की है। इतिहास अक्सर तलवारों को याद रखता है, लेकिन कभी-कभी वह उन हथेलियों को भी नमन करता है, जिन्होंने बिना हथियार के युद्ध लड़ा।महाधिरानी कामसुंदरी देवी .....एक नाम नहीं, एक चेतावनी। कि अगर ऐसी स्त्रियों को भुला दिया गया, तो इतिहास केवल इमारतों तक सिमट जाएगा, आत्मा से खाली।