सदियों की धरोहर, अब संरक्षण की बारी: दरभंगा के इतिहास पर दिल्ली की नजर, 82.50 लाख रुपये खर्च होने के बाद भी अधूरा रह गया दुर्लभ हाथी दांत की कलाकृतियों का संरक्षण; प्रधानमंत्री तक पहुंची शिकायत तो केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने मांगा हिसाब, जांच के आदेश से वर्षों पुरानी खामोशी में हलचल।
कभी जिस राजदरबार की भव्यता, कला-संरक्षण और सांस्कृतिक वैभव की चर्चा दूर-दूर तक होती थी, आज उसी राजपरंपरा से जुड़ी कुछ अनमोल निशानियां संरक्षण की प्रतीक्षा में समय की मार झेल रही हैं। दरभंगा के महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में सुरक्षित दुर्लभ हाथी दांत के पुरावशेषों और कलाकृतियों को लेकर अब केंद्र सरकार की निगाहें टिक गई हैं। वर्षों से लंबित संरक्षण कार्य, उसके लिए जारी की गई बड़ी राशि और काम के अधूरे रहने की शिकायत ने ऐसा मोड़ लिया है, जहां अब सवाल केवल पुरावशेषों की सुरक्षा का नहीं, बल्कि जवाबदेही और संरक्षण व्यवस्था की कार्यप्रणाली का भी बन गया है. पढ़े पूरी रिपोर्ट।
दरभंगा। कभी जिस राजदरबार की भव्यता, कला-संरक्षण और सांस्कृतिक वैभव की चर्चा दूर-दूर तक होती थी, आज उसी राजपरंपरा से जुड़ी कुछ अनमोल निशानियां संरक्षण की प्रतीक्षा में समय की मार झेल रही हैं। दरभंगा के महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में सुरक्षित दुर्लभ हाथी दांत के पुरावशेषों और कलाकृतियों को लेकर अब केंद्र सरकार की निगाहें टिक गई हैं। वर्षों से लंबित संरक्षण कार्य, उसके लिए जारी की गई बड़ी राशि और काम के अधूरे रहने की शिकायत ने ऐसा मोड़ लिया है, जहां अब सवाल केवल पुरावशेषों की सुरक्षा का नहीं, बल्कि जवाबदेही और संरक्षण व्यवस्था की कार्यप्रणाली का भी बन गया है।

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प्रधानमंत्री को की गई शिकायत के बाद केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने मामले को गंभीरता से लिया है। मंत्रालय ने नेशनल रिसर्च लेबोरेट्री फॉर कंजर्वेशन ऑफ कल्चरल प्रॉपर्टी (एनआरएलसी), लखनऊ को पत्र भेजकर संरक्षण कार्य में हुई कथित देरी और शिथिलता पर जवाब मांगा है। छह अगस्त को जारी पत्र में मामले की तत्काल जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने तथा लंबे समय से लंबित संरक्षण कार्य को बिना किसी और देरी के पूरा कर विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट मंत्रालय को भेजने का निर्देश दिया गया है। लेकिन इस पूरे मामले की कहानी केवल एक सरकारी पत्र से शुरू नहीं होती। इसके पीछे वर्षों से बंद पड़ी एक ऐसी फाइल है, जिसमें दरभंगा की कला-संपदा, राजपरिवार की विरासत, करोड़ों की सांस्कृतिक स्मृतियां और संरक्षण के इंतजार में खामोश होती कलाकृतियां दर्ज हैं।

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2019 में हुआ समझौता, तीन साल में पूरा होना था काम: पूर्व संग्रहालयाध्यक्ष एवं इंटैक बिहार स्टेट के सह-संयोजक डॉ. शिव कुमार मिश्र द्वारा प्रधानमंत्री को भेजी गई शिकायत के अनुसार, वर्ष 2019 में महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय और एनआरएलसी के बीच 155 दुर्लभ पुरावशेषों एवं कलाकृतियों के संरक्षण का समझौता हुआ था। इस कार्य की कुल स्वीकृत राशि 1.65 करोड़ रुपये बताई गई है। इसमें से 50 प्रतिशत यानी 82.50 लाख रुपये अग्रिम के रूप में एनआरएलसी को दिए गए थे। समझौते के अनुसार संरक्षण का काम तीन वर्षों के भीतर पूरा किया जाना था। यानी जिस काम के लिए समय-सीमा तय थी, उसके पूरा होने तक संग्रहालय को अपनी दुर्लभ धरोहरों के वैज्ञानिक संरक्षण की उम्मीद थी। लेकिन समय बीतता गया और संरक्षण की प्रक्रिया उस गति से आगे नहीं बढ़ सकी, जिसकी अपेक्षा की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि संरक्षण कार्य लंबित रहने के कारण दुर्लभ पुरावशेषों के क्षरण का खतरा बढ़ता गया। अब यही आरोप केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की जांच के दायरे में है।

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क्यों खास है यह संग्रहालय: दरभंगा के इतिहास को समझने के लिए महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय केवल एक इमारत या वस्तुओं को प्रदर्शित करने वाला स्थान नहीं है। यह दरभंगा राज की सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण अध्याय अपने भीतर समेटे हुए है। बिहार सरकार के अनुसार, संग्रहालय की मुख्य संग्रह-संपदा में दरभंगा राज परिवार द्वारा 1979 में सरकार को सौंपे गए अनेक दुर्लभ पुरावशेष शामिल हैं। संग्रह में सोने, चांदी और हाथी के दांत से बनी वस्तुओं के साथ-साथ राजसिंहासन, हथियार, धातु-कला, लकड़ी की कलाकृतियां और अन्य ऐतिहासिक वस्तुएं शामिल हैं। संग्रहालय की पहचान विशेष रूप से उसके हाथी दांत से निर्मित दुर्लभ शिल्प और कलाकृतियों के कारण बनी है। उपलब्ध विवरणों में यहां हाथी दांत के विशेष कक्षों और उनसे जुड़े दुर्लभ शिल्प का उल्लेख मिलता है। यही कारण है कि 155 कलाकृतियों के संरक्षण में हुई देरी सामान्य प्रशासनिक देरी भर नहीं मानी जा सकती। ये वस्तुएं उस समय की कलात्मक दक्षता, राजपरिवार की सौंदर्य-दृष्टि और मिथिला की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं।

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राजदरबार से संग्रहालय तक पहुंची विरासत: दरभंगा राज का इतिहास केवल सत्ता और संपत्ति का इतिहास नहीं रहा। राजपरिवार कला, संस्कृति, शिक्षा और संगीत के संरक्षण के लिए भी जाना जाता रहा है। दरभंगा की सांस्कृतिक पहचान में राजपरिवार का योगदान आज भी अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। इसी परंपरा का एक प्रमाण यह संग्रहालय भी है, जहां कभी राजपरिवार के उपयोग और संरक्षण में रही अनेक वस्तुएं आज आम लोगों के लिए इतिहास की खिड़की बन चुकी हैं। संग्रहालय के राजसिंहासन कक्ष में महाराज रामेश्वर सिंह से जुड़ा राजसिंहासन और अन्य राजकीय वस्तुएं संरक्षित हैं। बिहार के आधिकारिक पर्यटन विवरण में भी इसे दरभंगा राज की कला और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा महत्वपूर्ण संग्रह बताया गया है। सोचिए जिस राजदरबार में कभी इन वस्तुओं का इस्तेमाल हुआ होगा, जहां इनके निर्माण में महीनों या वर्षों की मेहनत लगी होगी, आज वही वस्तुएं संग्रहालय की दीवारों के भीतर आने वाली पीढ़ियों को अपने अतीत की कहानी सुनाती हैं। लेकिन इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस धरोहर को समय की सदियों ने बचाकर यहां तक पहुंचाया, उसे वर्तमान की लापरवाही से खतरा पैदा हो जाए।

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82.50 लाख रुपये के बाद भी क्यों अधूरा रहा संरक्षण: अब सबसे बड़ा सवाल यही है। जब संरक्षण के लिए समझौता हुआ, राशि स्वीकृत हुई और 82.50 लाख रुपये अग्रिम के रूप में दिए गए, तो आखिर वर्षों बाद भी काम पूरा क्यों नहीं हुआ? क्या संरक्षण की प्रक्रिया में तकनीकी अड़चन आई. क्या संसाधनों की कमी रही। क्या विशेषज्ञों की अनुपलब्धता समस्या बनी? या फिर प्रशासनिक स्तर पर समन्वय का अभाव रहा... इन सवालों का जवाब अब मंत्रालय द्वारा मांगी गई जांच रिपोर्ट से सामने आना है। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने एनआरएलसी के महानिदेशक को शिकायत की निष्पक्ष जांच कर विस्तृत प्रतिवेदन उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। साथ ही लंबित संरक्षण कार्य को पूरा कर अनुपालन रिपोर्ट भेजने को कहा गया है। यानी वर्षों से जिस मामले की गति धीमी थी, अब उस पर केंद्र की निगरानी का दबाव बढ़ गया है।

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खामोश कलाकृतियां अब मांग रही हैं जवाब: संग्रहालय की अलमारियों और कक्षों में रखी ये कलाकृतियां बोल नहीं सकतीं। वे यह नहीं बता सकतीं कि उनकी सतह पर समय की कौन-सी परत चढ़ रही है, किस हिस्से को संरक्षण की सबसे अधिक जरूरत है या कितनी देर और प्रतीक्षा उनके लिए नुकसानदेह हो सकती है। लेकिन उनका क्षरण अपने आप में एक मौन दस्तावेज है। एक ओर आधुनिक भारत अपनी पुरानी धरोहरों को डिजिटल माध्यमों से दुनिया तक पहुंचाने की बात करता है, दूसरी ओर यदि संग्रहालयों में सुरक्षित वास्तविक धरोहरों के संरक्षण में वर्षों लग जाएं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि हम अपने इतिहास को केवल याद रखना चाहते हैं या सचमुच बचाना भी चाहते हैं? दरभंगा के इस संग्रहालय का मामला इसी बड़े सवाल को सामने रखता है।

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दरभंगा राज की निशानियां, मिथिला की स्मृति: दरभंगा के लिए यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां की ऐतिहासिक पहचान केवल इमारतों से नहीं बनी। राजदरबार, संगीत, साहित्य, कला, धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएं और दुर्लभ वस्तुओं का विशाल संग्रह.... इन सभी ने मिलकर दरभंगा की विशिष्ट पहचान को आकार दिया। आज जब कोई व्यक्ति महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में प्रवेश करता है, तो वह केवल पुरानी वस्तुएं नहीं देखता। वह उस युग के वैभव, शिल्प-कौशल और जीवन-शैली के उन अंशों को देखता है जो अब कहीं और शायद उसी रूप में मौजूद नहीं हैं। हाथी दांत से बनी कोई वस्तु अपने आप में केवल एक कलाकृति हो सकती है, लेकिन जब वह किसी ऐतिहासिक राजपरिवार के संग्रह से निकलकर वर्तमान तक पहुंचती है, तो उसके साथ उससे कहीं बड़ी कहानी जुड़ जाती है। वह कहानी है... एक समय की, एक समाज की, एक कला की और एक पूरी सांस्कृतिक परंपरा की।

अब जांच से तय होगी जिम्मेदारी: केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की कार्रवाई ने इस मामले में एक नई उम्मीद पैदा की है। यदि जांच निष्पक्ष तरीके से होती है और संरक्षण में हुई देरी के कारण सामने आते हैं, तो यह केवल एक पुराने मामले का निपटारा नहीं होगा। यह देश के दूसरे संग्रहालयों के लिए भी एक संदेश होगा कि सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण महज कागजी प्रक्रिया नहीं हो सकता। वहीं, यदि किसी स्तर पर लापरवाही या शिथिलता प्रमाणित होती है, तो जिम्मेदारी तय करना भी उतना ही आवश्यक होगा। क्योंकि 155 दुर्लभ पुरावशेषों का संरक्षण केवल एक परियोजना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी है। प्रधानमंत्री तक पहुंची शिकायत के बाद केंद्र सरकार ने जिस तरह मामले को गंभीरता से लिया है, उससे दरभंगा में उम्मीद जगी है कि वर्षों से लंबित संरक्षण कार्य अब गति पकड़ेगा। लेकिन असली तस्वीर तब साफ होगी जब जांच रिपोर्ट सामने आएगी। क्या वर्षों की देरी के पीछे केवल प्रशासनिक शिथिलता थी? क्या अग्रिम राशि लेने के बाद काम अपेक्षित गति से नहीं हुआ... क्या दुर्लभ कलाकृतियों को समय पर वैज्ञानिक संरक्षण नहीं मिल सका? और सबसे महत्वपूर्ण क्या इस देरी के कारण किसी अमूल्य पुरावशेष को ऐसा नुकसान पहुंचा, जिसकी भरपाई संभव नहीं। इन सवालों के जवाब अब उस रिपोर्ट में तलाशे जाएंगे।

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दरभंगा की धरती ने सदियों का इतिहास देखा है। राजदरबार बदले, शासन बदला, समय बदला और संग्रहालयों ने राजसी जीवन की स्मृतियों को अपने भीतर सुरक्षित कर लिया। मगर इतिहास की सबसे कठिन परीक्षा तब होती है, जब उसकी विरासत वर्तमान की जिम्मेदारी बन जाती है। महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय की ये दुर्लभ कलाकृतियां आज उसी परीक्षा के बीच खड़ी हैं। एक तरफ बीते युग की चमक है, दूसरी तरफ समय का क्षरण। एक तरफ करोड़ों की सांस्कृतिक स्मृति है, दूसरी तरफ वर्षों से अधूरा संरक्षण। और अब पहली बार इस कहानी में केंद्र सरकार की सख्त निगाह शामिल हो चुकी है। देखना यही है कि जांच की कलम वर्षों से जमी खामोशी को तोड़ पाती है या नहीं.... और क्या दरभंगा की सदियों पुरानी धरोहर को आखिरकार वह संरक्षण मिल पाता है, जिसकी वह वर्षों से प्रतीक्षा कर रही है।
