मशालों की लौ में मुखर हुआ सवर्ण समाज का स्वर, यूजीसी के आदेश के विरुद्ध सड़कों पर उतरी संगठित चेतना......सवर्ण एक्ट, सवर्ण छात्रवृत्ति और छात्रावास की मांग के साथ केंद्र सरकार को निर्णायक संदेश, सुप्रीम कोर्ट की रोक को बताया न्याय, संविधान और लोकतांत्रिक विवेक की ऐतिहासिक विजय......

दरभंगा की सड़कों पर जब मशालें जलीं, तो वह केवल रोशनी नहीं थी......वह वर्षों से सुलग रहे असंतोष की लौ थी। यह लौ न तो अचानक भड़की और न ही किसी एक आदेश का क्षणिक प्रतिकार थी। यह उस सामाजिक वर्ग की सामूहिक पीड़ा, आक्रोश और न्याय-आकांक्षा का प्रकटीकरण थी, जो स्वयं को लंबे समय से नीतिगत उपेक्षा, संवैधानिक चुप्पी और प्रशासनिक अनदेखी का शिकार मानता रहा है. पढ़े पूरी खबर.......

मशालों की लौ में मुखर हुआ सवर्ण समाज का स्वर, यूजीसी के आदेश के विरुद्ध सड़कों पर उतरी संगठित चेतना......सवर्ण एक्ट, सवर्ण छात्रवृत्ति और छात्रावास की मांग के साथ केंद्र सरकार को निर्णायक संदेश, सुप्रीम कोर्ट की रोक को बताया न्याय, संविधान और लोकतांत्रिक विवेक की ऐतिहासिक विजय......
मशालों की लौ में मुखर हुआ सवर्ण समाज का स्वर, यूजीसी के आदेश के विरुद्ध सड़कों पर उतरी संगठित चेतना......सवर्ण एक्ट, सवर्ण छात्रवृत्ति और छात्रावास की मांग के साथ केंद्र सरकार को निर्णायक संदेश, सुप्रीम कोर्ट की रोक को बताया न्याय, संविधान और लोकतांत्रिक विवेक की ऐतिहासिक विजय......

दरभंगा की सड़कों पर जब मशालें जलीं, तो वह केवल रोशनी नहीं थी......वह वर्षों से सुलग रहे असंतोष की लौ थी। यह लौ न तो अचानक भड़की और न ही किसी एक आदेश का क्षणिक प्रतिकार थी। यह उस सामाजिक वर्ग की सामूहिक पीड़ा, आक्रोश और न्याय-आकांक्षा का प्रकटीकरण थी, जो स्वयं को लंबे समय से नीतिगत उपेक्षा, संवैधानिक चुप्पी और प्रशासनिक अनदेखी का शिकार मानता रहा है। केंद्र सरकार द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के माध्यम से जारी किए गए हालिया आदेशों के विरोध में, सवर्ण समाज दरभंगा के बैनर तले एक विशाल संयुक्त मशाल जुलूस का आयोजन किया गया, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि यह मुद्दा अब स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन चुका है।

इस आंदोलन का नेतृत्व युवा क्रांतिकारी नेता संतोष कुमार सिंह ने किया। जुलूस में सैकड़ों की संख्या में सवर्ण युवा, छात्र, बुद्धिजीवी, समाजसेवी और विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग शामिल हुए। नारों में केवल विरोध नहीं था, बल्कि अधिकारों की स्पष्ट मांग और भविष्य की चेतावनी भी निहित थी......सवर्ण एक्ट, सवर्ण छात्रवृत्ति और सवर्ण छात्रावास।

यूजीसी आदेश और सुप्रीम कोर्ट की रोक: इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में यूजीसी द्वारा जारी वह आदेश है, जिसे प्रदर्शनकारियों ने “दमनकारी” और “पूर्वाग्रह-प्रेरित” बताया। आंदोलनकारियों का आरोप है कि यह आदेश सवर्ण समाज के छात्रों, युवाओं और महिलाओं को संदेह की दृष्टि से देखने की मानसिकता को संस्थागत रूप देता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस आदेश पर रोक लगाए जाने को प्रदर्शनकारियों ने न केवल कानूनी राहत, बल्कि न्याय की नैतिक जीत के रूप में देखा।

नेतृत्व की आवाज़ें: मंच से उठे तीखे सवाल: प्रदर्शन को संबोधित करते हुए अखिल भारतीय सवर्ण मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजीव कुमार सिंह ने कहा कि संविधान निर्माण के समय से ही सवर्ण समाज के साथ सुनियोजित साजिश होती रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि नेहरू काल से लेकर वर्तमान तक की सरकारों ने सवर्ण समाज को योजनाबद्ध तरीके से दोयम दर्जे का नागरिक बनाए रखा। उनके शब्दों में, “आज तक सवर्ण समाज के लिए न कोई पृथक अधिनियम बना, न छात्रवृत्ति की व्यवस्था हुई और न ही छात्रावास जैसी बुनियादी सुविधाएं दी गईं। यह उपेक्षा नहीं, नीति है।

वरिष्ठ सवर्ण नेत्री श्रीमती रीता सिंह ने कहा कि यूजीसी के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन अब केवल विरोध नहीं, बल्कि अधिकारों की निर्णायक मांग बन चुका है। उन्होंने कहा कि अब सवर्ण समाज को आश्वासन नहीं, ठोस कानून चाहिए......जो शिक्षा, अवसर और सुरक्षा की गारंटी दे। कार्यक्रम संयोजक संतोष कुमार सिंह ने अपने संबोधन में कहा, “सवर्ण शक्ति ही राष्ट्र शक्ति है। इतिहास गवाह है कि जिसने भी सवर्ण समाज के अस्तित्व से खिलवाड़ किया, वह स्वयं इतिहास के हाशिये पर चला गया।” उन्होंने केंद्र सरकार से स्पष्ट शब्दों में सवर्ण एक्ट, सवर्ण छात्रवृत्ति और सवर्ण छात्रावास की घोषणा की मांग की।

वरिष्ठ सवर्ण नेता पप्पू चौधरी ने कहा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, भूमिहार, कायस्थ सहित सभी सवर्ण समुदाय आज एकजुट हैं और यूजीसी के इस आदेश को किसी भी हाल में स्वीकार नहीं करेंगे। युवा नेत्री प्रियंका झा ने कहा कि सवर्ण समाज को कमजोर समझने वालों को अब जमीनी जवाब दिया जा रहा है.......यह आंदोलन उसकी शुरुआत है, अंत नहीं। अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के दरभंगा जिला अध्यक्ष प्रवीण कुमार सिंह ‘पिंकू’ ने कहा, हम महाराणा प्रताप के वंशज हैं। अन्याय के सामने झुकना हमारे संस्कार में नहीं है। वरिष्ठ सवर्ण नेता आर.के. दत्ता ने एकजुटता पर जोर देते हुए कहा कि सवर्ण समाज पूरी मजबूती से खड़ा है और किसी भी प्रकार की गलतफहमी सरकार को नहीं पालनी चाहिए।

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सहभागिता: आंदोलन की व्यापकता: इस संयुक्त मशाल जुलूस में जिन प्रमुख लोगों की उपस्थिति दर्ज हुई, उनमें पप्पू चौधरी, रीता सिंह, विनय कुमार झा उर्फ संतोष झा, आर.के. दत्ता, संतोष सिंह, युवा नेता दीपक झा, सोशल एक्टिविस्ट प्रियंका झा, शैलेंद्र कुमार कश्यप, चंद्रशेखर झा उर्फ बूढ़ा भाई, वरिष्ठ सवर्ण नेता विजय झा, वार्ड पार्षद बिट्टू झा, रिटायर्ड पुलिस इंस्पेक्टर रंजीत कुमार सिंह, डॉ. आनंद प्रकाश झा, रौशन झा, पंकज दत्ता, कन्हैया दुबे, शैलेंद्र कश्यप, निरुपम सिंह, अक्षय सिंह, मनोज साह, पिंटू सिंह, शुभम सिंह, पिंकू सिंह, पृथ्वी चौधरी, संजीव सिंह, अभिषेक कुमार सिंह, रोहित मेहता, विभूति झा, पूर्व छात्र विश्वविद्यालय नेता कुणाल पाण्डेय, रोशन कुमार झा, राजीव कुमार झा, आदित्य तिवारी, विकास मिश्रा, अमन चौधरी, गंजर्व झा, मिथुन चौधरी, आशीष झा सहित सैकड़ों लोग शामिल थे।

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राजनीतिक और सामाजिक संकेत: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन केवल एक आदेश के विरोध तक सीमित नहीं रहेगा। यह शिक्षा नीति, सामाजिक न्याय की परिभाषा और संवैधानिक संतुलन पर एक व्यापक बहस को जन्म दे सकता है। सुप्रीम कोर्ट की रोक ने आंदोलन को कानूनी बल दिया है, वहीं सड़क पर उतरी भीड़ ने इसे सामाजिक ऊर्जा। यह मशाल जुलूस एक स्पष्ट संदेश है.......सवर्ण समाज अब मौन नहीं रहेगा। यह आंदोलन अधिकारों की मांग है, न्याय की पुकार है और उस व्यवस्था के लिए चेतावनी है, जो किसी भी वर्ग को स्थायी रूप से हाशिये पर रखने का भ्रम पालती है। सुप्रीम कोर्ट की रोक ने इस संघर्ष को नई दिशा दी है, लेकिन अंतिम मंज़िल तब तक दूर है, जब तक मांगें कानून का रूप नहीं ले लेतीं।