रोज खुलता है तारामंडल, फिर भी सैकड़ों लोगों के लिए क्यों बंद रह जाता है उसका दरवाजा?... सुबह होते ही कहां गायब हो जाती हैं 150 सीटें, क्यों समस्तीपुर, मधुबनी, सीतामढ़ी और नेपाल से आने वाले परिवार लौट रहे हैं निराश, पढ़िए दरभंगा तारामंडल की टिकट व्यवस्था का पूरा रहस्य।
आसमान की ओर उठती मासूम निगाहें… हाथों में बच्चों की उंगलियां थामे उम्मीदों से भरे माता-पिता… कई घंटों का सफर तय कर दरभंगा पहुंचने वाले पर्यटक… और फिर तारामंडल के मुख्य द्वार पर पहुंचते ही एक ऐसा सच, जो पूरे उत्साह को कुछ ही क्षणों में निराशा में बदल देता है। बच्चे पूछते हैं... पापा, अब हम ग्रह-तारे नहीं देख पाएंगे? माता-पिता की आंखों में जवाब होता है, लेकिन शब्द नहीं होते. पढ़े पूरी रिपोर्ट....
दरभंगा। आसमान की ओर उठती मासूम निगाहें… हाथों में बच्चों की उंगलियां थामे उम्मीदों से भरे माता-पिता… कई घंटों का सफर तय कर दरभंगा पहुंचने वाले पर्यटक… और फिर तारामंडल के मुख्य द्वार पर पहुंचते ही एक ऐसा सच, जो पूरे उत्साह को कुछ ही क्षणों में निराशा में बदल देता है। बच्चे पूछते हैं... पापा, अब हम ग्रह-तारे नहीं देख पाएंगे? माता-पिता की आंखों में जवाब होता है, लेकिन शब्द नहीं होते।

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दरभंगा का अत्याधुनिक तारामंडल, जिसे उत्तर बिहार में विज्ञान, तकनीक और आधुनिक शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है, इन दिनों किसी वैज्ञानिक खोज से नहीं, बल्कि टिकट व्यवस्था को लेकर चर्चा के केंद्र में है। अंतरिक्ष के रहस्यों को समझने की उत्सुकता लेकर आने वाले लोग अब सबसे पहले एक नए रहस्य से टकरा रहे हैं। टिकट आखिर गायब कहां हो जाते हैं? तारामंडल के बाहर खड़े सैकड़ों लोगों के लिए यह सवाल किसी पहेली से कम नहीं है। वे परिसर तक पहुंचते हैं, लेकिन उन्हें बताया जाता है कि सभी सीटें पहले ही भर चुकी हैं। टिकट खिड़की बंद है। ऑफलाइन टिकट उपलब्ध नहीं है। पूरा शो हाउसफुल है। यहीं से शुरू होती है उस व्यवस्था की कहानी, जिसने सुविधा तो बढ़ाई है, लेकिन साथ ही हजारों लोगों के लिए नई चुनौती भी खड़ी कर दी है।

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दरभंगा तारामंडल आज केवल दरभंगा जिले का नहीं, बल्कि पूरे उत्तर बिहार का वैज्ञानिक आकर्षण बन चुका है। समस्तीपुर, मधुबनी, सीतामढ़ी, सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, पूर्णिया और यहां तक कि पड़ोसी देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं। स्कूलों के शैक्षणिक भ्रमण हों या परिवार के साथ छुट्टी का कार्यक्रम तारामंडल लगभग हर दिन दर्शकों से गुलजार रहता है। लेकिन अब यहां एक बड़ा बदलाव लागू किया गया है। तारामंडल में ऑफलाइन टिकट व्यवस्था लगभग समाप्त हो चुकी है। सभी टिकट विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के आधिकारिक ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से अग्रिम बुकिंग द्वारा जारी किए जा रहे हैं। परिणाम यह है कि सुबह होते-होते अधिकांश शो की सभी सीटें भर जाती हैं। कई बार सप्ताहांत के लिए दो-तीन दिन पहले ही बुकिंग पूरी हो जाती है।

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तारामंडल की कुल क्षमता 150 सीटों की है। सोमवार से शनिवार तक प्रतिदिन पांच शो संचालित किए जाते हैं, जबकि रविवार को पर्यटकों की अधिक भीड़ को देखते हुए छह शो आयोजित किए जाते हैं। इसके बावजूद मांग इतनी अधिक है कि सीटें कुछ ही समय में भर जाती हैं। यह तस्वीर एक ओर दर्शाती है कि विज्ञान के प्रति लोगों की रुचि लगातार बढ़ रही है। लेकिन दूसरी ओर यह भी स्पष्ट करती है कि डिजिटल व्यवस्था हर व्यक्ति तक समान रूप से नहीं पहुंच पाई है।ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले अनेक लोग आज भी ऑनलाइन बुकिंग की प्रक्रिया से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। कई लोगों के पास स्मार्टफोन नहीं है। कई इंटरनेट का उपयोग नहीं कर पाते। अनेक लोगों को यह जानकारी ही नहीं होती कि अब टिकट केवल ऑनलाइन बुक करना अनिवार्य है।

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ऐसे में वे पुराने तरीके से सीधे टिकट काउंटर पर पहुंच जाते हैं। लेकिन वहां पहुंचकर उन्हें पता चलता है कि टिकट पहले ही समाप्त हो चुके हैं। सोचिए उस परिवार की स्थिति, जिसने बच्चों की खुशी के लिए पूरा दिन यात्रा में बिताया हो। जिसने किराया खर्च किया हो। जिसने उम्मीदों का संसार साथ लेकर दरभंगा का रुख किया हो। और फिर मुख्य द्वार पर पहुंचकर उसे यह सुनने को मिले कि आज कोई टिकट उपलब्ध नहीं है।यह केवल टिकट नहीं, बल्कि टूटती उम्मीदों की कहानी बन जाती है। इधर, लगातार बढ़ती भीड़ के कारण परिसर में कई बार दर्शकों और सुरक्षा कर्मियों के बीच बहस की स्थिति भी बन रही है। सुरक्षा कर्मी अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं, जबकि दर्शक अपनी पीड़ा व्यक्त करते हैं। दोनों अपने-अपने स्थान पर सही दिखाई देते हैं, लेकिन समाधान कहीं दिखाई नहीं देता।

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सबसे अधिक चिंता उन अभिभावकों की है, जो अपने बच्चों को विज्ञान से जोड़ने के उद्देश्य से यहां लेकर आते हैं। उनका कहना है कि यदि सभी सीटें ऑनलाइन ही बुक होती रहेंगी, तो अचानक आने वाले पर्यटक और ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग कभी भी इस सुविधा का लाभ नहीं उठा पाएंगे। कई अभिभावकों ने मांग उठाई है कि कुल सीटों में से कम से कम 20 से 30 प्रतिशत सीटें ऑफलाइन काउंटर के लिए सुरक्षित रखी जाएं। उनका तर्क है कि इससे डिजिटल और गैर-डिजिटल दोनों वर्गों के लोगों को समान अवसर मिलेगा।यह मांग केवल टिकट की नहीं, बल्कि समान अवसर की मांग है। डिजिटल इंडिया की अवधारणा निश्चित रूप से आधुनिक भारत की दिशा तय कर रही है। ऑनलाइन सेवाओं ने पारदर्शिता बढ़ाई है, दलालों की भूमिका कम की है और लोगों को घर बैठे सुविधा उपलब्ध कराई है। लेकिन भारत जैसे विविध सामाजिक ढांचे वाले देश में यह भी आवश्यक है कि डिजिटल परिवर्तन के साथ-साथ उन लोगों का भी ध्यान रखा जाए, जो अभी तकनीकी बदलाव की गति से कदम नहीं मिला पाए हैं।

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दरभंगा तारामंडल का वर्तमान अनुभव इसी संतुलन की आवश्यकता की ओर संकेत करता है। तारामंडल प्रशासन का कहना है कि व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी है। विभागीय वेबसाइट पर पहले बुकिंग करने वाले दर्शकों को सीट उपलब्ध हो जाती है। यदि ऑनलाइन बुकिंग के बाद कोई सीट रिक्त रह जाती है, तभी उसे ऑफलाइन टिकट काउंटर से उपलब्ध कराया जाता है। तारामंडल के प्रभारी ओपी राय के अनुसार, सभी 150 सीटें विभागीय वेबसाइट पर ऑनलाइन बुक हो जाती हैं। इसी कारण ऑफलाइन टिकट उपलब्ध नहीं हो पाता। यदि ऑनलाइन बुकिंग के बाद सीटें खाली बचती हैं, तभी ऑफलाइन टिकट जारी किए जाते हैं। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि घर से निकलने से पहले बिहार सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर टिकट अवश्य बुक करें। विशेष रूप से शनिवार और रविवार को अत्यधिक भीड़ रहती है, इसलिए दो से तीन दिन पहले स्लॉट सुरक्षित कर लेना बेहतर रहेगा।

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यह सलाह व्यवहारिक अवश्य है, लेकिन सवाल अब भी कायम है....क्या हर व्यक्ति के पास यह जानकारी समय पर पहुंच रही है? क्या हर ग्रामीण परिवार ऑनलाइन बुकिंग करने में सक्षम है. क्या विज्ञान के इस मंदिर तक पहुंचने का रास्ता केवल डिजिटल माध्यम से ही होकर गुजरना चाहिए। या फिर व्यवस्था में ऐसा संतुलन बनाया जा सकता है, जहां तकनीक भी रहे और आम लोगों की सहज पहुंच भी बनी रहे? दरभंगा तारामंडल आज विज्ञान के अद्भुत संसार की खिड़की है। यहां बैठकर बच्चे पहली बार ब्रह्मांड की विशालता को महसूस करते हैं। ग्रहों की गति, तारों की चमक और आकाशगंगाओं की अनंत दुनिया उन्हें कल्पना से वास्तविकता की यात्रा कराती है। ऐसे में यदि इस वैज्ञानिक यात्रा की शुरुआत ही टिकट न मिलने की निराशा से हो, तो यह केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि विज्ञान के लोकतांत्रिक प्रसार से जुड़ा विषय बन जाता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या भविष्य में ऐसी व्यवस्था बनेगी, जिसमें डिजिटल सुविधा भी बनी रहे और उन लोगों के लिए भी रास्ता खुला रहे, जो अब भी टिकट खिड़की पर भरोसा लेकर दरभंगा पहुंचते हैं। क्योंकि अंतरिक्ष का आकाश सभी का है और शायद उसे देखने का अवसर भी सभी के लिए समान होना चाहिए।
