लहेरियासराय: "प्रतीक, लौट आओ, माँ की गोद सूनी है" 15 वर्षीय प्रतीक वत्स लापता, परिवार में मचा कोहराम....
नगर थाना क्षेत्र के शुभंकरपुर से 15 वर्षीय प्रतीक वत्स के लापता होने की खबर ने न केवल उसके परिवार, बल्कि पूरे समुदाय को हिलाकर रख दिया है। यह घटना उस मासूम उम्र की कहानी बयां करती है, जहाँ सपने अभी पंख फैलाने की तैयारी में होते हैं, और मन में भविष्य की अनगिनत संभावनाएँ उमड़ती-घुमड़ती हैं। सूत्रों के हवाले से पता चला है कि प्रतीक रामबाग के प्रतिष्ठित संस्कृति इंटरनेशनल स्कूल का छात्र था, जहाँ वह अपनी शिक्षा के सुनहरे पड़ाव को जी रहा था..... पढ़े पुरी खबर........

लहेरियासराय: नगर थाना क्षेत्र के शुभंकरपुर से 15 वर्षीय प्रतीक वत्स के लापता होने की खबर ने न केवल उसके परिवार, बल्कि पूरे समुदाय को हिलाकर रख दिया है। यह घटना उस मासूम उम्र की कहानी बयां करती है, जहाँ सपने अभी पंख फैलाने की तैयारी में होते हैं, और मन में भविष्य की अनगिनत संभावनाएँ उमड़ती-घुमड़ती हैं। सूत्रों के हवाले से पता चला है कि प्रतीक रामबाग के प्रतिष्ठित संस्कृति इंटरनेशनल स्कूल का छात्र था, जहाँ वह अपनी शिक्षा के सुनहरे पड़ाव को जी रहा था। लेकिन नियति ने ऐसा खेल रचा कि एक साधारण दिन उसकी जिंदगी का सबसे अनिश्चित अध्याय बन गया।
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2 अप्रैल 2025 की दोपहर, जब सूरज अपनी पूरी शक्ति से धरती को प्रकाशित कर रहा था, प्रतीक ने अपने पिता पूर्णेन्दु कुमार झा से कहा, "पापा, मैं दरभंगा टावर जा रहा हूँ।" यह वाक्य, जो रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा था, अब उनके कानों में गूँजता है, जैसे कोई अनसुना सवाल। प्रतीक उस दिन घर से निकला, अपने कंधों पर स्कूल बैग और मन में शायद कुछ अनकही उलझनें लिए। वह लौटा नहीं। घंटों बीत गए, दिन ढला, और रात की चादर ने सब कुछ अपने आगोश में ले लिया, पर प्रतीक का कोई अता-पता नहीं।
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पूर्णेन्दु जी का दिल उस पल टूट गया जब उन्हें एहसास हुआ कि उनका लाडला, जिसे उन्होंने प्यार से बड़ा किया, कहीं खो गया है। प्रतीक का हाल ही में रिजल्ट आया था, और उसमें अच्छे अंक न आने की वजह से पिता ने उसे डाँटा था। शायद यह डाँट उस नन्हे मन पर भारी पड़ गई। पूर्णेन्दु जी की आँखों में अब आँसुओं के साथ-साथ आत्मग्लानि भी झलकती है। "काश, मैंने उसे समझाया होता, गले लगाया होता," यह विचार उनके मन को बार-बार कचोटता है। एक पिता का यह दर्द उस खामोशी में छिपा है, जो अब उनके घर की दीवारों से टकराती है।
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नगर थाने में प्राथमिकी दर्ज कराते वक्त पूर्णेन्दु जी की आवाज में काँपन था। उन्होंने पुलिस को बताया कि उनका बेटा संवेदनशील स्वभाव का था, और रिजल्ट की निराशा ने उसे अंदर से तोड़ा होगा। थानाध्यक्ष अरविंद कुमार ने आश्वासन दिया कि प्रतीक को ढूंढने के लिए हर संभव प्रयास किया जा रहा है। पुलिस की टीमें दरभंगा टावर के आसपास, स्कूल के रास्तों, और उन जगहों पर छानबीन कर रही हैं, जहाँ प्रतीक का आना-जाना हो सकता था। लेकिन हर बीतता पल परिवार की उम्मीद को और धूमिल करता जा रहा है।
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संस्कृति इंटरनेशनल स्कूल, जहाँ प्रतीक पढ़ता था, वहाँ भी सन्नाटा पसर गया है। उसके सहपाठी, जो कल तक उसके साथ हँसते-खेलते थे, आज उसकी खाली डेस्क को देखकर चुप हैं। शिक्षकों की आँखों में भी एक अनजाना भय है। प्रतीक का वह चेहरा, जो कक्षा में शांत रहकर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराता था, अब सबके मन में एक सवाल बनकर उभर रहा है—वह कहाँ है? स्कूल के प्रिंसिपल ने बताया कि प्रतीक एक मेहनती और संकोची छात्र था, जो हमेशा अपने काम में लगा रहता था। रिजल्ट के बाद उसकी उदासी किसी से छिपी नहीं थी, पर कोई नहीं जानता था कि यह उदासी इतना बड़ा कदम उठाने की वजह बन जाएगी।
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यह कहानी केवल प्रतीक की नहीं, बल्कि उन तमाम बच्चों की है, जो समाज और परिवार के दबाव में अपनी मासूमियत खो देते हैं। प्रतीक का लापता होना एक चेतावनी है—हमारे बच्चों के मन को समझने की, उनकी भावनाओं को सुनने की। क्या वह उदास मन लिए कहीं भटक रहा है? क्या वह अपने घर की राह भूल गया है? या फिर वह किसी अनजान कोने में अपनी तकलीफों से जूझ रहा है? ये सवाल न केवल उसके परिवार, बल्कि हम सबके लिए हैं।
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आज शुभंकरपुर की गलियाँ सूनी हैं। प्रतीक की माँ उसकी पसंदीदा किताब को सीने से लगाए बैठी है, और उसका छोटा भाई खिड़की से बाहर झाँकता है, शायद इस उम्मीद में कि उसका भैया लौट आएगा। पूर्णेन्दु जी हर फोन की घंटी पर चौंक पड़ते हैं, हर दस्तक पर दरवाजे की ओर दौड़ते हैं। लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगती है।
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प्रतीक, जहाँ कहीं भी हो, यह दुआ है कि तुम सुरक्षित रहो। तुम्हारा परिवार, तुम्हारे दोस्त, और यह पूरा शहर तुम्हारी राह देख रहा है। लौट आओ, प्रतीक, क्योंकि तुम्हारी एक मुस्कान के लिए ये सारी दुनिया तरस रही है।