दरभंगा राज किला: धरोहर के पुनरुत्थान का महासंकल्प, कुमार कपिलेश्वर सिंह का मिथिला को नवजीवन का स्वर्णिम स्वप्न

मिथिला की पवित्र धरती आज एक अलौकिक स्वप्न के साकार होने की प्रतीक्षा में संनादित हो रही है। वह प्राचीन दरभंगा राज किला, जो कभी इस क्षेत्र का गौरव-मुकुट था, मिथिला की शिराओं में बहता जीवन-प्रवाह और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक था, बरसों तक समय की मार और उपेक्षा की कालिमा से मूक साधना में लीन रहा। उसकी प्राचीरें, जो कभी राजसी शौर्य और वैभव की गाथाएं गाती थीं, धीरे-धीरे खामोशी के आवरण में लिपट गईं। पर अब, उस नीरवता में एक नवीन संगीत जाग रहा है, एक ऐसी धुन जो मिथिला की माटी को फिर से प्राणवान करने को आतुर है. पढ़े पुरी खबर.......

दरभंगा राज किला: धरोहर के पुनरुत्थान का महासंकल्प, कुमार कपिलेश्वर सिंह का मिथिला को नवजीवन का स्वर्णिम स्वप्न
दरभंगा राज किला: धरोहर के पुनरुत्थान का महासंकल्प, कुमार कपिलेश्वर सिंह का मिथिला को नवजीवन का स्वर्णिम स्वप्न; फोटो: मिथिला जन जन की आवाज

दरभंगा: मिथिला की पवित्र धरती आज एक अलौकिक स्वप्न के साकार होने की प्रतीक्षा में संनादित हो रही है। वह प्राचीन दरभंगा राज किला, जो कभी इस क्षेत्र का गौरव-मुकुट था, मिथिला की शिराओं में बहता जीवन-प्रवाह और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक था, बरसों तक समय की मार और उपेक्षा की कालिमा से मूक साधना में लीन रहा। उसकी प्राचीरें, जो कभी राजसी शौर्य और वैभव की गाथाएं गाती थीं, धीरे-धीरे खामोशी के आवरण में लिपट गईं। पर अब, उस नीरवता में एक नवीन संगीत जाग रहा है, एक ऐसी धुन जो मिथिला की माटी को फिर से प्राणवान करने को आतुर है। दरभंगा राज के वंशज, कुमार कपिलेश्वर सिंह, ने अपने पुरखों की इस अमर विरासत को पुनर्जनन का प्राण देने का महासंकल्प लिया है। यह कोई साधारण कदम नहीं, बल्कि एक ऐसी तपस्या है, जो मिथिला की आत्मा को नवचेतना से भर रही है—एक ऐसी ज्योति जो बरसों की उदासीनता और विनाश को भस्म कर, स्वर्णिम भविष्य का आलोक रचने को तत्पर है।

महाराजा के मुख्य द्वार पर एक अद्भुत डाचा से निर्मित आकर्षक गेटनुमा संरचना खड़ी जिसका तेजी से पहले जैसा रूप देने... का प्रयास....

कभी यह किला मिथिला के स्वर्णिम युग का जीवंत दर्पण था। इसकी प्राचीरें राजवंशों के शौर्य और ऐश्वर्य की साक्षी थीं। रामबाग का विशाल प्रांगण बच्चों की किलकारियों, ठहाकों और उल्लास की मधुर स्वरलहरियों से गूंजता था, मानो वह मिथिला की आत्मा का प्रफुल्लित राग हो। हवा में पंछियों की मधुर कूक तैरती थी, और किले के आंगन में नृत्य-संगीत की रसधारा बहती थी। राज किला के प्रवेश द्वार के भीतर और महाराजा के मुख्य द्वार पर एक अद्भुत डाचा से निर्मित आकर्षक गेटनुमा संरचना खड़ी थी—एक ऐसी शिल्पकला जो हर नजर को सम्मोहित कर देती थी। यह गेट मिथिला की कारीगरी का अनुपम उदाहरण था, जो आने-जाने वालों को राजसी ठाठ-बाट की झलक दिखाता था। पर समय का क्रूर चक्र घूमा, और यह सारा वैभव धीरे-धीरे स्मृतियों के धुंधलके में खो गया। रामबाग का वह प्रांगण, जो कभी जीवन का उत्सव था, बरसों से सड़कों और महलों से बहकर आने वाले काले, गंदे पानी की कराह में डूब गया। वह गंदगी मिथिला के गर्व को कुचलती रही। उधर, उस आकर्षक गेट पर बड़े-बड़े पीपल के वृक्ष जन्म ले चुके थे, जिनकी जड़ें उसकी नींव को जकड़ रही थीं। पीपल के उन विशाल पेड़ों के दबाव से गेट का एक तरफ का दीवाल ढह गया, और वह शिल्पकला का नगीना खंडहर में तब्दील हो गया। किले के पत्थर मौन गवाह बनकर खड़े रहे, और वह रौनक, वह चहल-पहल, कहीं गुम हो गई, मानो मिथिला की आत्मा गहरी निद्रा में सो गई हो।

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लेकिन अब, एक नवप्रभात की सुनहरी किरणें मिथिला के आकाश को आलोकित कर रही हैं। कुमार कपिलेश्वर सिंह—एक नाम, जो अब मिथिला के हर हृदय की धड़कन, हर प्रार्थना का मंत्र और हर आकांक्षा का स्वर बन गया है—ने इस धरोहर को अपने सीने से लगाकर इसके पुनरुत्थान की पहली नींव रखी है। यह कोई साधारण शुरुआत नहीं, बल्कि एक ऐसी अग्नि है, जो अतीत की पीड़ा और उपेक्षा को जलाकर भविष्य का स्वर्णिम कैनवास रचने को तैयार है। उनके संकल्प में एक गहन तपस्या और अडिग संन्यास का भाव है—अपने पूर्वजों की विरासत को न केवल संरक्षित करने की, बल्कि उसे उस शिखर तक ले जाने की, जहां से वह मिथिला का शिरोमणि बनकर चमके। बरसों से सड़क और मैदान को गंदगी में डुबोए हुए उस काले जल को अब विशाल नाले में बहाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। नाले का निर्माण जिस त्वरा, तन्मयता और दृढ़ता से चल रहा है, वह कपिलेश्वर सिंह के अटल निश्चय का जीवंत प्रमाण है। साथ ही, उस गेटनुमा संरचना पर उगे पीपल के विशाल वृक्षों को कटवाकर, उसके ढह चुके दीवाल को फिर से उसी पुरातन डिज़ाइन में मरम्मत करवाने का कार्य भी जोर-शोर से शुरू हो गया है। यह गंदगी और विनाश, जो मिथिला की धरोहर पर कलंक बनकर छाई थी, अब शीघ्र ही अतीत के पन्नों में समा जाएगी।

                             मरम्मतका कार्य जोरों से

कपिलेश्वर सिंह का यह संकल्प केवल एक किले को संवारने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक आत्मा को नवप्राण देने का एक महायज्ञ है। उनके इस प्रयास में एक गहरी संवेदना और करुणा है—वह संवेदना जो उस कराहते प्रांगण और ढहते गेट को देखकर उनके अंतर्मन में जागी होगी, और एक अटूट आकांक्षा जो मिथिला को उसके स्वर्णिम युग की ओर पुनर्जनन के पथ पर ले जाना चाहती है। नाले का निर्माण और गेट की मरम्मत केवल भौतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि उस दंश से मुक्ति का संनाद है, जो बरसों से मिथिला के गर्व को कुचल रहा था। रामबाग का प्रांगण, जो कभी इस गंदगी के बोझ तले दबा था, अब शीघ्र ही उमंग और उल्लास की लय पर थिरकने को तैयार है। वह आकर्षक गेट, जो पीपल के वृक्षों की जकड़न से मुक्त हो रहा है, फिर से अपनी पुरानी शिल्पकला में सजकर किले के प्रवेश को राजसी गरिमा प्रदान करेगा। यह परिवर्तन किले की प्राचीरों में नवचेतना का संचार करेगा, और हवा में फिर वही मधुर संगीत बहेगा जो कभी मिथिला की अमिट पहचान था।

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मिथिलांचल का हर प्राणी इस तैयारी से आनंद, अभिमान और आशा के अनंत सागर में डूबा है। बुजुर्गों की आंखों में आंसुओं के साथ एक स्वप्निल आलोक झिलमिला रहा है, जैसे वे अपने खोए हुए स्वर्णयुग को पुनर्जन्म लेते देख रहे हों। "हमारा किला फिर से प्राणवान होगा, हमारा प्रांगण फिर से संनादित होगा, हमारा गेट फिर से शिर ऊंचा करेगा," एक वृद्ध ने कांपते स्वर में कहा, मानो उनकी आत्मा कपिलेश्वर के इस संकल्प से प्रफुल्लित होकर नृत्य कर उठी हो। युवाओं के हृदय में उत्साह का ज्वार उमड़ रहा है—वे उस क्षण की प्रतीक्षा में हैं जब वे अपने बच्चों को वह मिथिला सौंप सकेंगे, जिसके गीत उनकी रगों में बसे हैं, और जिसका गर्व उनकी नसों में दौड़ता है। बच्चे भी इस बदलाव की आहट को महसूस कर रहे हैं, मानो वे जानते हों कि उनका खेल का मैदान फिर से उनकी किलकारियों से गूंजेगा।

दरभंगा राज किला का मुख्य द्वार.... जिसे हम सब सिंह द्वार भी    कहते है.

कपिलेश्वर सिंह का यह कदम एक संन्यासी की तपस्या, एक योद्धा के शौर्य और एक कवि के स्वप्न का संगम है। यह केवल पत्थरों और मिट्टी का पुनर्निर्माण नहीं, बल्कि मिथिला की आत्मा को पुनर्जागरण का अमृत पिलाने का एक महान संकल्प है। उनके इस जुनून में एक गहरा रस है—वह रस जो मिथिला की माटी की सोंधी सुगंध से उपजा है, जो उसके इतिहास की गहनता से संनादित है, और जो उसके भविष्य को स्वर्णिम रंगों से सजाने को आतुर है। यह संकल्प केवल एक किले को नहीं, बल्कि मिथिला की पूरी सांस्कृतिक धरोहर को नवजीवन देने का वचन है। हर पत्थर, हर गलियारा, हर कोना अब इस नवसृजन की कथा गाने को व्याकुल है। नाला बन रहा है, गेट संवर रहा है, और रामबाग का प्रांगण अपनी खोई हुई रौनक को फिर से पाने को बेताब है।

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आज मिथिला की धरती अपने इस लाल को साष्टांग दंडवत प्रणाम कर रही है। हर आंगन में एक ही स्वर संनादित हो रहा है—"कपिलेश्वर सिंह ने हमारी धरोहर को नवजीवन की राह दिखाई, हमारे हृदयों में गर्व का सूर्य उदित किया, और हमारी आंखों में स्वप्नों का आकाश रचा।" यह आनंद शब्दों में नहीं समाता, यह वह अनुभूति है जो हवा में तरंग बनकर लहरा रही है, जो वृक्षों की पत्तियों में संनाद बनकर गूंज रही है, जो मिथिला की माटी में नवप्रभात का स्वर बनकर बसी है। यह खुशी केवल किले की नहीं, बल्कि हर मिथिलावासी के हृदय की है, जो अपने गौरव को फिर से सिर उठाते देख रहा है।

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दरभंगा राज किला अभी अपने पुनरुत्थान की प्रतीक्षा में है, पर कपिलेश्वर सिंह का यह संकल्प मिथिला को एक नई आभा, एक नया जीवन, और एक नया गर्व दे रहा है। वह क्षण समीप है जब यह किला फिर से प्राणवान होगा, जब रामबाग का प्रांगण गंदगी से मुक्त होकर उमंग में झूमेगा, जब वह गेट अपनी पुरातन शिल्पकला में सजकर मिथिला के वैभव का स्वागत करेगा, और जब मिथिला का हर कोना इस नवसृजन के राग से संनादित होगा। मिथिला कह रही है, "मेरे आंगन का वैभव लौटने को व्याकुल है, मेरे कपिलेश्वर ने मुझे फिर से स्वप्नों का अनंत आकाश सौंपा है।" यह एक किले का नहीं, बल्कि एक संस्कृति, एक इतिहास, और एक संपूर्ण समुदाय के पुनर्जनन की महागाथा है।