दरभंगा पब्लिक स्कूल के प्रांगण में शब्दों और सपनों का अनोखा संगम: जब सिनेमा की रचनात्मक दृष्टि और साहित्य की संवेदनशील कलम एक ही मंच पर उतरी, और बारहवीं के विद्यार्थियों के सामने खुल गया संघर्ष, जुनून, कल्पना और भविष्य की अनंत संभावनाओं का वह संसार....जहाँ सवालों की मासूम जिज्ञासा और अनुभवों की गहराई ने मिलकर शिक्षा को किताबों से निकाल कर जीवन के वास्तविक अर्थों तक पहुँचा दिया।

दरभंगा शहर के दिल्ली मोड़ के समीप स्थित दरभंगा पब्लिक स्कूल का परिसर उस दिन कुछ अलग ही आभा से चमक रहा था। सामान्य दिनों की तरह यह केवल कक्षाओं, घंटियों और पाठ्यक्रमों का केंद्र नहीं था, बल्कि वह एक ऐसे विचार-मंच में बदल गया था जहाँ शब्दों की शक्ति, कल्पना की उड़ान और भविष्य के सपनों की आहट एक साथ सुनाई दे रही थी. पढ़े पूरी खबर.....

दरभंगा पब्लिक स्कूल के प्रांगण में शब्दों और सपनों का अनोखा संगम: जब सिनेमा की रचनात्मक दृष्टि और साहित्य की संवेदनशील कलम एक ही मंच पर उतरी, और बारहवीं के विद्यार्थियों के सामने खुल गया संघर्ष, जुनून, कल्पना और भविष्य की अनंत संभावनाओं का वह संसार....जहाँ सवालों की मासूम जिज्ञासा और अनुभवों की गहराई ने मिलकर शिक्षा को किताबों से निकाल कर जीवन के वास्तविक अर्थों तक पहुँचा दिया।
दरभंगा पब्लिक स्कूल के प्रांगण में शब्दों और सपनों का अनोखा संगम: जब सिनेमा की रचनात्मक दृष्टि और साहित्य की संवेदनशील कलम एक ही मंच पर उतरी, और बारहवीं के विद्यार्थियों के सामने खुल गया संघर्ष, जुनून, कल्पना और भविष्य की अनंत संभावनाओं का वह संसार....जहाँ सवालों की मासूम जिज्ञासा और अनुभवों की गहराई ने मिलकर शिक्षा को किताबों से निकाल कर जीवन के वास्तविक अर्थों तक पहुँचा दिया।

दरभंगा शहर के दिल्ली मोड़ के समीप स्थित दरभंगा पब्लिक स्कूल का परिसर उस दिन कुछ अलग ही आभा से चमक रहा था। सामान्य दिनों की तरह यह केवल कक्षाओं, घंटियों और पाठ्यक्रमों का केंद्र नहीं था, बल्कि वह एक ऐसे विचार-मंच में बदल गया था जहाँ शब्दों की शक्ति, कल्पना की उड़ान और भविष्य के सपनों की आहट एक साथ सुनाई दे रही थी।

विद्यालय के कक्षा 12 के विद्यार्थियों के लिए आयोजित विशेष इंटरैक्टिव सत्र ने शिक्षा को किताबों की सीमाओं से बाहर निकाल कर जीवन के वास्तविक अनुभवों से जोड़ दिया। इस अवसर पर बॉलीवुड निर्देशक आनंद तिवारी और समकालीन हिंदी साहित्य के चर्चित उपन्यासकार दिव्य प्रकाश दुबे मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। दो अलग-अलग रचनात्मक संसारों से आए ये दोनों युवा व्यक्तित्व उस दिन विद्यार्थियों के सामने केवल वक्ता नहीं थे, बल्कि वे संघर्ष, कल्पना और सफलता की जीवित कहानियाँ बनकर खड़े थे। जब वे विद्यालय परिसर में पहुँचे तो विद्यार्थियों के बीच उत्साह का ऐसा वातावरण था मानो किसी बड़े सांस्कृतिक उत्सव की शुरुआत हो रही हो।

दरभंगा पब्लिक स्कूल: शिक्षा का एक जीवंत केंद्र: दरभंगा पब्लिक स्कूल केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि वह एक ऐसा मंच है जहाँ शिक्षा, संस्कार और व्यक्तित्व विकास को समान महत्व दिया जाता है। दरभंगा की शैक्षणिक परंपरा में इस विद्यालय का नाम पिछले कई वर्षों से सम्मान के साथ लिया जाता रहा है। आधुनिक शिक्षण पद्धतियाँ, तकनीक आधारित अध्ययन, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ और छात्रों के सर्वांगीण विकास की सोच....इन सभी ने इसे शहर के प्रमुख विद्यालयों में स्थापित किया है।

विद्यालय के निदेशक डॉ. विशाल गौरव की शैक्षणिक दृष्टि हमेशा यह रही है कि विद्यार्थियों को केवल परीक्षाओं के लिए नहीं बल्कि जीवन के लिए तैयार किया जाए। यही कारण है कि यहाँ समय-समय पर देश के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले विशेषज्ञों, कलाकारों, वैज्ञानिकों और लेखकों के साथ संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। विद्यालय में आयोजित यह इंटरैक्टिव सत्र भी उसी विचारधारा का हिस्सा था.....कि विद्यार्थियों को प्रेरणा केवल किताबों से नहीं, बल्कि जीवित अनुभवों से भी मिलनी चाहिए।

दो रचनात्मक यात्राएँ, एक मंच: उस दिन मंच पर दो ऐसे व्यक्तित्व उपस्थित थे जिनकी यात्रा अलग-अलग दिशाओं से शुरू हुई थी, लेकिन दोनों का गंतव्य एक ही था....रचनात्मकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्र दुनिया। एक ओर थे फिल्म निर्देशक और अभिनेता आनंद तिवारी, जिन्होंने भारतीय फिल्म और वेब सीरीज़ की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है। दूसरी ओर थे युवा पीढ़ी के प्रिय लेखक दिव्य प्रकाश दुबे, जिनकी किताबें आज हिंदी के लाखों पाठकों के दिलों में जगह बना चुकी हैं। जब दोनों मंच पर आए तो सभागार तालियों से गूंज उठा। विद्यार्थियों की आँखों में उत्सुकता थी.... वे जानना चाहते थे कि सपनों की दुनिया तक पहुँचने का रास्ता आखिर कैसा होता है।

दिव्य प्रकाश दुबे : शब्दों से दुनिया रचने वाला लेखक: दिव्य प्रकाश दुबे का जन्म 8 मई 1982 को लखनऊ में हुआ। उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, फिर प्रबंधन की डिग्री हासिल की, और एक अच्छी कॉर्पोरेट नौकरी भी की। लेकिन भीतर कहीं शब्दों की एक बेचैन नदी बहती रही। उन्होंने विद्यार्थियों को बताते हुए कहा.... कभी-कभी जीवन हमें बहुत सुरक्षित रास्ता देता है, लेकिन दिल उस रास्ते पर नहीं जाना चाहता। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उन्होंने बताया कि बचपन से ही कहानियाँ और कविताएँ लिखना उनका प्रिय शौक था। समय के साथ वही शौक एक दिन जीवन का उद्देश्य बन गया। उनकी चर्चित रचनाओं में मुसाफिर कैफे, अक्टूबर जंक्शन, यार पापा, मसाला चाय, आको-बाको जैसी किताबें शामिल हैं। उनकी भाषा सरल है, लेकिन भावनाएँ बेहद गहरी। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा..... कहानी लिखना केवल शब्दों का काम नहीं है, यह जीवन को महसूस करने की कला है।

आनंद तिवारी : संघर्ष से सिनेमा तक: आनंद तिवारी की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। 29 मई 1983 को मुंबई में जन्मे आनंद तिवारी ने अभिनय से अपने करियर की शुरुआत की। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर में भी अभिनय किया और बाद में निर्देशन की दुनिया में कदम रखा।वे लोकप्रिय वेब सीरीज़ बंदिश बैंडिट्स के निर्माता और निर्देशक रहे हैं। इसके अलावा फिल्म बैड न्यूज जैसी परियोजनाओं से भी वे जुड़े रहे हैं। विद्यार्थियों से बातचीत के दौरान उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही.... मैंने किसी फिल्म स्कूल से पढ़ाई नहीं की। मैंने काम करते-करते सीखा। सीखना कभी बंद मत कीजिए। उनकी बातों में अनुभव की सादगी थी और संघर्ष की सच्चाई भी।

जब सवालों से भरा था सभागार: कार्यक्रम का सबसे जीवंत हिस्सा था....प्रश्न-उत्तर सत्र। विद्यार्थियों ने खुले दिल से अपने सवाल रखे। किसी ने लेखन के बारे में पूछा, किसी ने फिल्म उद्योग के बारे में, तो किसी ने करियर चुनने की उलझन साझा की। सुधांशु का प्रश्न.... सुधांशु ने पूछा कि अच्छा लेखक बनने के लिए कौन-सी किताबें पढ़नी चाहिए।bदिव्य प्रकाश दुबे ने मुस्कुराते हुए कहा.... जितना पढ़ेंगे, उतना अच्छा लिखेंगे।उन्होंने विद्यार्थियों को हिंदी साहित्य के महान लेखकों राही मासूम रज़ा और मनोहर श्याम जोशी की रचनाएँ पढ़ने की सलाह दी।

आकृति का सवाल : राइटर्स ब्लॉक: आकृति ने पूछा कि जब लिखने का मन नहीं करता तो क्या किया जाए। इस पर दिव्य प्रकाश दुबे ने कहा.... राइटर्स ब्लॉक असल में मन का डर होता है। लिखते रहिए, भले ही खराब लिखें। आनंद तिवारी ने भी जोड़ते हुए कहा.... रचनात्मक काम में अनुशासन उतना ही जरूरी है जितना प्रतिभा। शुभी श्रीवास्तव का सवाल.... शुभी ने पूछा कि क्या शौक और पेशा एक ही होना चाहिए। इस पर आनंद तिवारी ने स्पष्ट कहा.... जरूरी नहीं। बहुत लोगों का शौक और पेशा अलग होता है। यह बिल्कुल सामान्य है।

अदिति रंजन का सपना: अदिति रंजन ने बताया कि वह भविष्य में किसी बड़ी कंपनी की सीईओ बनना चाहती हैं। इस पर दोनों वक्ताओं ने उन्हें सलाह दी.... स्पष्ट लक्ष्य तय करें... मजबूत शिक्षा प्राप्त करें.... नेतृत्व कौशल विकसित करें.... और सबसे महत्वपूर्ण.....लगातार सीखते रहें.... पूरे सत्र के दौरान ऐसा महसूस हो रहा था कि मंच और दर्शकों के बीच कोई दूरी नहीं है। वक्ता और विद्यार्थी एक-दूसरे से उसी सहजता से बात कर रहे थे जैसे किसी मित्र से संवाद होता है।कई विद्यार्थियों ने बाद में कहा कि यह सत्र उनके लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं बल्कि जीवन की दिशा तय करने वाला अनुभव था। इस कार्यक्रम ने एक बार फिर यह साबित किया कि शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं है। जब विद्यार्थी उन लोगों से मिलते हैं जिन्होंने अपने सपनों को सच किया है, तब उन्हें समझ में आता है कि.... सफलता का रास्ता संघर्ष, धैर्य और निरंतर प्रयास से होकर गुजरता है।

दरभंगा पब्लिक स्कूल की शैक्षणिक पहल: दरभंगा पब्लिक स्कूल लगातार ऐसे कार्यक्रम आयोजित करता रहा है जिनका उद्देश्य विद्यार्थियों के भीतर छिपी प्रतिभा को सामने लाना है।विद्यालय में..... साहित्यिक गतिविधियाँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम, विज्ञान प्रदर्शनियाँ, खेल प्रतियोगिताएँ, नेतृत्व प्रशिक्षण.... जैसी अनेक गतिविधियाँ नियमित रूप से आयोजित की जाती हैं। इन सबका उद्देश्य यही है कि छात्र केवल परीक्षा में अच्छे अंक ही न लाएँ, बल्कि जीवन में भी उत्कृष्ट बनें। कार्यक्रम के अंत में विद्यालय के निदेशक डॉ. विशाल गौरव ने दोनों अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने कहा.... विद्यालय का उद्देश्य केवल पढ़ाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को जीवन की वास्तविकताओं से परिचित कराना भी है। ऐसे संवाद कार्यक्रम विद्यार्थियों को अपने सपनों की दिशा समझने में मदद करते हैं।उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में भी विद्यालय इसी तरह के प्रेरणादायक कार्यक्रम आयोजित करता रहेगा। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी विद्यार्थियों के चेहरे पर उत्साह साफ दिखाई दे रहा था। कई छात्र मंच के पास जाकर अतिथियों से बातचीत करते रहे। कुछ ने किताबों पर हस्ताक्षर लिए, तो कुछ ने फोटो खिंचवाई। उस दिन दरभंगा पब्लिक स्कूल का सभागार केवल एक कार्यक्रम का साक्षी नहीं था.... वह सपनों की नई शुरुआत का साक्षी था। जीवन में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जो चुपचाप हमारी सोच बदल देते हैं। दरभंगा पब्लिक स्कूल में आयोजित यह इंटरैक्टिव सत्र भी ऐसा ही एक क्षण था। आनंद तिवारी ने विद्यार्थियों को सिखाया कि सीखना कभी बंद नहीं होना चाहिए। दिव्य प्रकाश दुबे ने बताया कि जुनून के बिना कोई भी सपना पूरा नहीं होता। और विद्यार्थियों ने समझा कि.... सपनों की राह कठिन जरूर होती है, लेकिन असंभव नहीं।