दरभंगा: "न्याय की जीत: मुकेश कुश्वाहा प्रकरण में तीन पुलिस अधिकारियों का निलंबन, डीजीपी का कठोर कदम"
बिहार के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विनय कुमार ने एक संवेदनशील प्रकरण में कठोर कदम उठाते हुए तीन पुलिस अधिकारियों को निलंबन का आदेश दिया है। यह निर्णय तब लिया गया, जब बारहवीं कक्षा के एक मेधावी छात्र मुकेश कुमार कुश्वाहा को पॉक्सो अधिनियम (बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम) के एक कथित मिथ्या अभियोग में फंसाने का आरोप इन अधिकारियों पर लगा। निलंबित अधिकारियों में तत्कालीन उपाधीक्षक (डीएसपी) उमेश्वर चौधरी, बहेड़ा थाने के तत्कालीन थानाध्यक्ष सुनील कुमार और प्रकरण के अनुसंधानकर्ता (आईओ) जावेद आलम सम्मिलित हैं. पढ़े पुरी खबर.....

दरभंगा: बिहार के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विनय कुमार ने एक संवेदनशील प्रकरण में कठोर कदम उठाते हुए तीन पुलिस अधिकारियों को निलंबन का आदेश दिया है। यह निर्णय तब लिया गया, जब बारहवीं कक्षा के एक मेधावी छात्र मुकेश कुमार कुश्वाहा को पॉक्सो अधिनियम (बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम) के एक कथित मिथ्या अभियोग में फंसाने का आरोप इन अधिकारियों पर लगा। निलंबित अधिकारियों में तत्कालीन उपाधीक्षक (डीएसपी) उमेश्वर चौधरी, बहेड़ा थाने के तत्कालीन थानाध्यक्ष सुनील कुमार और प्रकरण के अनुसंधानकर्ता (आईओ) जावेद आलम सम्मिलित हैं। इस घटना ने पुलिस की कार्यशैली और नैतिकता पर गहन प्रश्नचिह्न खड़े किए, जिसके परिणामस्वरूप डीजीपी को स्वयं हस्तक्षेप करना पड़ा।
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प्रकरण का उद्भव: यह दुखद कथा सन् 2020 की है, जब मुकेश कुमार कुश्वाहा, जो दरभंगा के एक विद्यालय में बारहवीं कक्षा का छात्र था, को दुष्कर्म के एक कथित अभियोग में बंदी बनाया गया। पुलिस ने पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत कार्रवाई करते हुए उसे कारागार में डाल दिया। उसे बीस वर्ष की कठोर सजा सुनाई गई, किंतु पटना उच्च न्यायालय ने इस प्रकरण की सुनवाई के दौरान एक आश्चर्यजनक सत्य उद्घाटित किया। न्यायालय ने पाया कि यह संपूर्ण प्रकरण कपोल-कल्पित था और पुलिस ने साक्ष्यों के साथ छल-छद्म कर एक निष्पाप बालक को जाल में फंसाया था। उच्च न्यायालय ने उसकी सजा को निरस्त करते हुए उसे निर्दोष घोषित किया और तत्काल मुक्ति का आदेश दिया।
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मुकेश की मुक्ति के पश्चात यह प्रकरण जनमानस में चर्चा का विषय बन गया। स्थानीय जनता और सामाजिक संगठनों ने पुलिस की इस कृत्य के विरुद्ध स्वर बुलंद किया और दोषियों के लिए कठोर दंड की मांग की। अनुसंधान में यह प्रकट हुआ कि तत्कालीन डीएसपी उमेश्वर चौधरी, थानाध्यक्ष सुनील कुमार और अनुसंधानकर्ता जावेद आलम ने न केवल मिथ्या प्रकरण दर्ज किया, अपितु कृत्रिम साक्ष्य प्रस्तुत कर एक नाबालिग के जीवन को संकट में डाला।
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डीजीपी का हस्तक्षेप क्यों अपरिहार्य हुआ? इस प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए डीजीपी विनय कुमार को स्वयं संज्ञान लेना पड़ा। सूत्रों के अनुसार, पटना उच्च न्यायालय के निर्णय के पश्चात बिहार पुलिस की प्रतिष्ठा पर गहरा आघात लगा था। जनसामान्य में यह धारणा बलवती हो रही थी कि पुलिस अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर निष्पाप व्यक्तियों को संकट में डाल सकती है। ऐसी स्थिति में पुलिस विभाग की विश्वसनीयता को संरक्षित करने और उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने हेतु डीजीपी ने त्वरित और निर्णायक कदम उठाया।
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डीजीपी ने दरभंगा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) जगुनाथ रेड्डी को इन तीनों अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का निर्देश दिया। साथ ही, इस प्रकरण के गहन अनुसंधान हेतु एक उच्चस्तरीय समिति के गठन की चर्चा भी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह षड्यंत्र क्यों और कैसे रचा गया।
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अधिकारियों की वर्तमान स्थिति: निलंबित तीनों अधिकारी वर्तमान में विभिन्न स्थानों पर कार्यरत थे। उमेश्वर चौधरी पालीगंज में डीएसपी के पद पर थे, सुनील कुमार मधुबनी जिले में थानाध्यक्ष के रूप में नियुक्त थे, और जावेद आलम सारण जिले के अवतारनगर थाने में तैनात थे। निलंबन के पश्चात इनके विरुद्ध विभागीय जांच की संभावना भी प्रबल है, जिसमें और कठोर दंड की आशंका व्यक्त की जा रही है।
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जनमानस और विद्वानों का दृष्टिकोण: इस घटना ने स्थानीय जनता में रोष उत्पन्न किया है। मुकेश के कुटुंब ने कहा कि उनके पुत्र को बिना किसी अपराध के कारागार में डाला गया, जिससे उसकी शिक्षा और भविष्य पर गहरा कुठाराघात हुआ। समाजसेवियों का मत है कि यह प्रकरण पुलिस सुधार की अनिवार्यता को उजागर करता है। एक प्रख्यात विधिवेत्ता ने गोपनीयता की शर्त पर कहा, “पॉक्सो जैसे संवेदनशील विधान का दुरुपयोग न केवल पीड़ित के लिए अन्याय है, अपितु सच्चे पीड़ितों के लिए भी संकट उत्पन्न करता है।”
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भावी मार्ग: डीजीपी विनय कुमार का यह निर्णय पुलिस महकमे के लिए एक सशक्त संदेश है। यह कदम न केवल दोषियों को दंडित करने की दिशा में है, अपितु भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने हेतु एक उदाहरण स्थापित कर सकता है। तथापि, मुकेश और उसके कुटुंब के लिए यह प्रश्न अब भी शेष है कि क्या इस कार्रवाई से उनका खोया हुआ समय और सम्मान पुनः प्राप्त हो सकेगा?
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वर्तमान में दरभंगा पुलिस इस प्रकरण पर मौन साधे हुए है, किंतु डीजीपी के निर्देश के पश्चात कार्रवाई में तीव्रता आने की आशा है। यह घटना न केवल बिहार, अपितु संपूर्ण राष्ट्र में पुलिस सुधार और विधान के दुरुपयोग पर विमर्श को पुनर्जनन दे सकती है।