डीएमसीएच सुपर स्पेशलिटी के खामोश गलियारों में जब ‘ठक… ठक… ठक…’ करती आयुक्त के जूतों की भारी आवाज गूंजी, तो बंद लिफ्टों, अधूरी दवा व्यवस्था, रेफरल की पीड़ा और सुस्त पड़े स्वास्थ्य तंत्र में मच गया अदृश्य हड़कंप… हर कदम के साथ कांपती दिखी अस्पताल की अव्यवस्था, फाइलों से लेकर वार्ड तक पसरा डर साफ नजर आया… जानिए निरीक्षण के दौरान आखिर ऐसा क्या दिखा कि आयुक्त हिमांशु कुमार राय ने अधिकारियों को सख्त चेतावनी देते हुए मरीजों को राहत पहुंचाने के लिए जारी कर दिए बड़े निर्देश!

दरभंगा के चिकित्सा इतिहास में गुरुवार का दिन किसी सामान्य प्रशासनिक निरीक्षण का दिन नहीं था, बल्कि वह एक ऐसा क्षण बन गया जब डीएमसीएच सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की दीवारों ने सत्ता, जवाबदेही और स्वास्थ्य व्यवस्था की सिसकती सच्चाइयों को बेहद करीब से महसूस किया। जब दरभंगा प्रमंडल के आयुक्त हिमांशु कुमार राय का काफिला डीएमसीएच सुपर स्पेशलिटी परिसर में दाखिल हुआ, तो अस्पताल के गलियारों में अचानक एक अजीब सी बेचैनी तैरने लगी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वर्षों से धूल खा रही फाइलें, बंद पड़ी लिफ्टें, दवा की अधूरी अलमारियां और रेफरल की विवशता अचानक किसी कठोर प्रश्न के कटघरे में खड़ी कर दी गई हो. पढ़े पूरी रिपोर्ट.....

डीएमसीएच सुपर स्पेशलिटी के खामोश गलियारों में जब ‘ठक… ठक… ठक…’ करती आयुक्त के जूतों की भारी आवाज गूंजी, तो बंद लिफ्टों, अधूरी दवा व्यवस्था, रेफरल की पीड़ा और सुस्त पड़े स्वास्थ्य तंत्र में मच गया अदृश्य हड़कंप… हर कदम के साथ कांपती दिखी अस्पताल की अव्यवस्था, फाइलों से लेकर वार्ड तक पसरा डर साफ नजर आया… जानिए निरीक्षण के दौरान आखिर ऐसा क्या दिखा कि आयुक्त हिमांशु कुमार राय ने अधिकारियों को सख्त चेतावनी देते हुए मरीजों को राहत पहुंचाने के लिए जारी कर दिए बड़े निर्देश!
डीएमसीएच सुपर स्पेशलिटी के खामोश गलियारों में जब ‘ठक… ठक… ठक…’ करती आयुक्त के जूतों की भारी आवाज गूंजी, तो बंद लिफ्टों, अधूरी दवा व्यवस्था, रेफरल की पीड़ा और सुस्त पड़े स्वास्थ्य तंत्र में मच गया अदृश्य हड़कंप… हर कदम के साथ कांपती दिखी अस्पताल की अव्यवस्था, फाइलों से लेकर वार्ड तक पसरा डर साफ नजर आया… जानिए निरीक्षण के दौरान आखिर ऐसा क्या दिखा कि आयुक्त हिमांशु कुमार राय ने अधिकारियों को सख्त चेतावनी देते हुए मरीजों को राहत पहुंचाने के लिए जारी कर दिए बड़े निर्देश!

दरभंगा के चिकित्सा इतिहास में गुरुवार का दिन किसी सामान्य प्रशासनिक निरीक्षण का दिन नहीं था, बल्कि वह एक ऐसा क्षण बन गया जब डीएमसीएच सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की दीवारों ने सत्ता, जवाबदेही और स्वास्थ्य व्यवस्था की सिसकती सच्चाइयों को बेहद करीब से महसूस किया। जब दरभंगा प्रमंडल के आयुक्त हिमांशु कुमार राय का काफिला डीएमसीएच सुपर स्पेशलिटी परिसर में दाखिल हुआ, तो अस्पताल के गलियारों में अचानक एक अजीब सी बेचैनी तैरने लगी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वर्षों से धूल खा रही फाइलें, बंद पड़ी लिफ्टें, दवा की अधूरी अलमारियां और रेफरल की विवशता अचानक किसी कठोर प्रश्न के कटघरे में खड़ी कर दी गई हो।

सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की लंबी, सफेद लेकिन थकी हुई गलियों में जब आयुक्त के जूतों की आवाज गूंजी, तो वह महज कदमों की ध्वनि नहीं थी। वह स्वास्थ्य व्यवस्था के भीतर पसरे शिथिलपन पर किसी अदृश्य हथौड़े की चोट जैसी महसूस हो रही थी। कर्मचारियों के चेहरे पर हड़बड़ी साफ दिख रही थी। कई विभागों में अचानक फाइलें सीधी होने लगीं, कुर्सियां व्यवस्थित की जाने लगीं और वे लिफ्टें, जो महीनों से बीमार व्यवस्था की तरह खामोश पड़ी थीं, अचानक चर्चा के केंद्र में आ गईं।निरीक्षण के दौरान आयुक्त ने अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं, दवा उपलब्धता, ब्लड बैंक, एंबुलेंस सेवा, ऑक्सीजन आपूर्ति, मानव संसाधन और मरीजों को दी जा रही सुविधाओं की गहन समीक्षा की। बैठक में चिकित्सकों ने स्वीकार किया कि सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में अभी केवल 06 विभाग संचालित हो रहे हैं, जबकि इसकी परिकल्पना 08 विभागों के साथ की गई थी। यह तथ्य स्वयं इस बात का संकेत था कि करोड़ों की इमारतें खड़ी कर देना और उन्हें पूर्ण क्षमता से संचालित करना, दोनों अलग-अलग सच्चाइयां हैं।

आयुक्त ने शेष विभागों को शीघ्र प्रारंभ करने का निर्देश देते हुए स्पष्ट किया कि “सुपर स्पेशलिटी” शब्द केवल भवन के नाम में नहीं, बल्कि मरीजों को मिलने वाली सुविधा में भी दिखना चाहिए। बैठक के दौरान चिकित्सकों ने एनेस्थीसिया और रेडियोलॉजी विभाग में चिकित्सकों की भारी कमी का मुद्दा उठाया। अधिकारियों ने बताया कि एक ही दिन में 401 एक्स-रे किए गए। यह संख्या सिर्फ जांच का आंकड़ा नहीं थी, बल्कि यह उस बढ़ते दबाव का दस्तावेज भी थी जिसके सहारे सीमित संसाधनों में अस्पताल खुद को जीवित रखने की कोशिश कर रहा है।

दवा व्यवस्था की समीक्षा के दौरान जो तथ्य सामने आया, उसने स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविकता को और अधिक भयावह बना दिया। डीएमसीएच अधीक्षक ने बताया कि कुल 612 आवश्यक दवाओं में से मात्र 208 दवाएं ही वर्तमान में उपलब्ध हैं। यानी एक सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में लगभग दो-तिहाई दवाओं का अभाव। यह आंकड़ा सुनते ही बैठक कक्ष का वातावरण कुछ क्षणों के लिए भारी हो गया। आयुक्त ने सख्त लहजे में निर्देश दिया कि मरीजों को अस्पताल से बाहर दवा खरीदने को मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर कारपोरेशन लिमिटेड को प्रत्येक माह दवा आपूर्ति सुनिश्चित करने तथा वितरण व्यवस्था की नियमित निगरानी करने का निर्देश दिया।

निरीक्षण के दौरान सबसे अधिक नाराजगी तब देखने को मिली जब आयुक्त को बताया गया कि अस्पताल में छह लिफ्टें हैं, लेकिन सभी बंद पड़ी हैं। यह केवल तकनीकी खराबी नहीं थी, बल्कि उस व्यवस्था का प्रतीक बन चुकी थी जिसमें मरीज स्ट्रेचर पर कराहते हुए मंजिलें तय करते हैं और स्वास्थ्य तंत्र कागजों में “सुपर” बना रहता है।बताया जाता है कि आयुक्त कुछ क्षणों के लिए वहीं रुक गए। उनकी आंखें बंद पड़ी लिफ्टों पर टिक गईं। आसपास मौजूद अधिकारियों के चेहरों पर तनाव साफ दिखने लगा। उस समय गलियारे में पसरा सन्नाटा किसी भयावह सरकारी सच का जीवित चित्र प्रतीत हो रहा था।

आयुक्त ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मरीजों को अनावश्यक रूप से रेफर नहीं किया जाए। यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि डीएमसीएच से रेफरल की शिकायतें लंबे समय से उठती रही हैं। गरीब मरीज अक्सर यह आरोप लगाते रहे हैं कि मामूली जटिलता पर भी उन्हें पटना या अन्य बड़े संस्थानों की ओर भेज दिया जाता है, जिससे इलाज से पहले ही उनकी आर्थिक कमर टूट जाती है। निरीक्षण के दौरान अस्पताल परिसर की साफ-सफाई, ऑक्सीजन सिलेंडर की उपलब्धता, ओटी असिस्टेंट, सीनियर रेजिडेंट और विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी पर भी विस्तार से चर्चा हुई। आयुक्त ने अधीक्षक, प्राचार्य, सिविल सर्जन और संबंधित चिकित्सकों को निर्देश दिया कि आवश्यक मानव संसाधन का विस्तृत प्रतिवेदन तत्काल तैयार कर उपलब्ध कराया जाए।

डीएमसीएच के इस निरीक्षण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों की वास्तविक स्थिति इतनी अस्थिर क्यों है? क्या स्वास्थ्य व्यवस्था केवल उद्घाटन समारोहों और सरकारी विज्ञप्तियों तक सीमित होकर रह गई है। दरभंगा और मिथिलांचल के लाखों लोगों की उम्मीदें जिस अस्पताल से जुड़ी हैं, वहां दवाओं की कमी, बंद लिफ्टें, विशेषज्ञ चिकित्सकों का अभाव और अधूरे विभाग आज भी मरीजों को डर और असुरक्षा के बीच इलाज कराने को मजबूर कर रहे हैं।हालांकि आयुक्त हिमांशु कुमार राय के इस औचक निरीक्षण ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि अब डीएमसीएच की खामोश दीवारों के पीछे छिपी अव्यवस्थाएं शायद ज्यादा दिनों तक परदे में नहीं रह पाएंगी। क्योंकि इस बार निरीक्षण केवल औपचारिकता नहीं लग रहा था। यह उस व्यवस्था के दरवाजे पर दस्तक जैसा था, जिसकी थकी हुई आत्मा वर्षों से जवाबदेही का इंतजार कर रही है।