आगे पढ़िए हमारी इस विशेष रिपोर्ट में! ईओयू की कार्रवाई के बाद केवटी प्रखंड में कैसे बढ़ी हलचल, रविंद्रनाथ सिंह चिंटू ने किन गंभीर आधारों पर संपत्ति जांच की मांग उठाई, किस आदेश के बाद प्रमुख की कुर्सी पर संकट गहराया, 13 लाख से अधिक की कथित वित्तीय अनियमितता में किन-किन पर कार्रवाई की तलवार लटकी और आखिर क्यों पूरा मामला अब प्रशासनिक गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा का विषय बन गया है।
केवटी प्रखंड इन दिनों विकास योजनाओं की उपलब्धियों से नहीं, बल्कि वित्तीय अनियमितताओं, विभागीय कार्रवाई, पदच्युति के आदेश और संपत्ति जांच की मांग को लेकर चर्चा के केंद्र में है। जिन कार्यालयों से ग्रामीण विकास की योजनाएं निकलनी चाहिए थीं, उन्हीं पर अब सरकारी धन के दुरुपयोग के गंभीर आरोपों की परछाई दिखाई दे रही है। यह मामला केवल एक प्रखंड प्रमुख या एक बीडीओ तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने पूरे स्थानीय प्रशासनिक ढांचे की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। लोक शिकायत निवारण के द्वितीय अपीलीय प्राधिकार, पंचायती राज विभाग, पटना द्वारा पारित आदेश ने इस पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्राधिकार ने जांच के बाद प्रखंड प्रमुख जिवछी देवी तथा तत्कालीन बीडीओ चंद्र मोहन पासवान से जुड़े मामले में कठोर टिप्पणी करते हुए आगे की कार्रवाई का निर्देश दिया है. पढ़े पूरी रिपोर्ट.....
दरभंगा। केवटी प्रखंड इन दिनों विकास योजनाओं की उपलब्धियों से नहीं, बल्कि वित्तीय अनियमितताओं, विभागीय कार्रवाई, पदच्युति के आदेश और संपत्ति जांच की मांग को लेकर चर्चा के केंद्र में है। जिन कार्यालयों से ग्रामीण विकास की योजनाएं निकलनी चाहिए थीं, उन्हीं पर अब सरकारी धन के दुरुपयोग के गंभीर आरोपों की परछाई दिखाई दे रही है। यह मामला केवल एक प्रखंड प्रमुख या एक बीडीओ तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने पूरे स्थानीय प्रशासनिक ढांचे की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। लोक शिकायत निवारण के द्वितीय अपीलीय प्राधिकार, पंचायती राज विभाग, पटना द्वारा पारित आदेश ने इस पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्राधिकार ने जांच के बाद प्रखंड प्रमुख जिवछी देवी तथा तत्कालीन बीडीओ चंद्र मोहन पासवान से जुड़े मामले में कठोर टिप्पणी करते हुए आगे की कार्रवाई का निर्देश दिया है।

13 लाख से अधिक सरकारी राशि के कथित दुरुपयोग का मामला: इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर पक्ष वह निष्कर्ष है जिसमें लगभग 13 लाख 15 हजार 187 रुपये की सरकारी राशि के कथित दुरुपयोग का उल्लेख किया गया है। सरकारी योजनाओं के लिए आवंटित राशि यदि अपने निर्धारित उद्देश्य तक नहीं पहुंचती, तो उसका सीधा प्रभाव उन गरीब परिवारों पर पड़ता है जिनके लिए विकास योजनाएं बनाई जाती हैं। यही कारण है कि जब किसी सरकारी आदेश में वित्तीय अनियमितता की पुष्टि जैसी स्थिति सामने आती है, तो उसका प्रभाव केवल कागजों तक सीमित नहीं रहता बल्कि जनता के विश्वास पर भी गहरा आघात करता है।

Advertisement
प्रमुख को पद से हटाने की अनुशंसा का आदेश: प्राप्त जानकारी के अनुसार द्वितीय अपीलीय प्राधिकार ने लोक प्रहरी सह प्रमंडलीय आयुक्त, दरभंगा को निर्देश दिया है कि पंचायती राज अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप प्रखंड प्रमुख को पद से हटाने के लिए लोक प्रहरी, पटना को अनुशंसा भेजी जाए। यदि यह प्रक्रिया नियमानुसार आगे बढ़ती है तो यह केवटी प्रखंड की राजनीति और प्रशासन दोनों के लिए एक बड़ा घटनाक्रम माना जाएगा। किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि के विरुद्ध इस प्रकार की अनुशंसात्मक कार्रवाई अपने आप में अत्यंत गंभीर मानी जाती है।

Advertisement
तत्कालीन बीडीओ और पंचायत सचिव पर अनुशासनिक कार्रवाई का निर्देश: आदेश में केवल प्रखंड प्रमुख तक ही बात सीमित नहीं रही। तत्कालीन बीडीओ तथा पंचायत सचिव के विरुद्ध भी अनुशासनिक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है। साथ ही जिन लोगों को दोषी माना गया है उनसे सरकारी राशि की वसूली करने का भी आदेश दिया गया है। सरकारी धन की वसूली का आदेश यह संकेत देता है कि प्रशासन अब वित्तीय जवाबदेही तय करने के प्रयास में दिखाई दे रहा है। यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर कार्रवाई होती है तो यह पूरे जिले में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि संबंधित कार्रवाई निर्धारित अवधि में पूरी कर इसकी सूचना प्राधिकार को उपलब्ध कराई जाए। इस समय सीमा ने प्रशासनिक अधिकारियों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा दिया है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आदेश का पालन कितनी गंभीरता से किया जाता है और क्या दोष निर्धारण की प्रक्रिया आगे भी इसी गति से जारी रहती है।

Advertisement
जांच टीम बनी, स्पष्टीकरण मांगा गया, फिर खारिज हुआ जवाब: सूत्रों के अनुसार 12 मई 2026 को पूरे मामले की जांच के लिए टीम गठित की गई थी। जांच के क्रम में संबंधित पक्षों से स्पष्टीकरण मांगा गया, जो 8 जून 2026 को प्राधिकार के समक्ष प्रस्तुत किया गया। बताया जा रहा है कि उपलब्ध स्पष्टीकरण से प्राधिकार संतुष्ट नहीं हुआ और उसे स्वीकार नहीं किया गया। इसके बाद कथित वित्तीय अनियमितता के संबंध में संबंधित पक्षों के विरुद्ध कार्रवाई की दिशा में आदेश पारित किया गया। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि मामले की प्रक्रिया केवल शिकायत के स्तर तक सीमित नहीं रही बल्कि जांच, स्पष्टीकरण और उसके परीक्षण के बाद आदेश जारी किया गया। पूर्व सांसद प्रतिनिधि रविंद्रनाथ सिंह चिंटू ने इस पूरे मामले को एक नया आयाम देते हुए आर्थिक अपराध इकाई के अपर पुलिस महानिदेशक को पत्र सौंपा है। उन्होंने आरोप लगाया है कि भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले विजय गुप्ता और इकबाल अंसारी को फर्जी मुकदमों में फंसाकर जेल भेजा गया। यदि इस आरोप की निष्पक्ष जांच होती है और उसमें सच्चाई सामने आती है, तो यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता का नहीं बल्कि कथित प्रतिशोधात्मक कार्रवाई का भी रूप ले सकता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और विधिक प्रक्रिया अभी शेष है।

Advertisement
संपत्ति जांच की मांग ने बढ़ाई राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल: रविंद्रनाथ सिंह चिंटू ने यह भी मांग की है कि प्रखंड प्रमुख की संपत्ति की जांच आर्थिक अपराध इकाई द्वारा कराई जाए। उनका दावा है कि चुनावी शपथपत्र में घोषित संपत्ति और वर्तमान संपत्ति के बीच बड़ा अंतर है। यदि इस संबंध में सक्षम एजेंसियों द्वारा जांच की जाती है, तो उसके निष्कर्ष आगे की कानूनी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।फिलहाल यह एक मांग और आरोप है, जिसकी पुष्टि सक्षम जांच एजेंसियों द्वारा की जानी बाकी है। इससे पहले आर्थिक अपराध इकाई द्वारा बीडीओ के विरुद्ध कांड दर्ज कर विभिन्न स्थानों पर छापेमारी किए जाने की सूचना भी सामने आ चुकी है। जब किसी प्रशासनिक अधिकारी के विरुद्ध आर्थिक अपराध इकाई जैसी एजेंसी कार्रवाई करती है, तो स्वाभाविक रूप से पूरे प्रशासनिक ढांचे पर निगाहें टिक जाती हैं। इससे आम लोगों के मन में यह प्रश्न उठना भी स्वाभाविक है कि कहीं विकास योजनाओं का धन व्यवस्था की कमजोरियों में तो नहीं उलझ रहा। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिन योजनाओं के माध्यम से गांवों में सड़क, नाली, जलनिकासी, सार्वजनिक सुविधाएं और आधारभूत विकास होना था, यदि उन्हीं योजनाओं पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगते हैं तो आम नागरिक किस पर भरोसा करे। करदाताओं का पैसा यदि सही जगह खर्च नहीं होता, तो नुकसान केवल सरकारी खजाने का नहीं बल्कि उस गरीब परिवार का होता है जिसे विकास का लाभ मिलना चाहिए था।

Advertisement
अब आगे क्या होगा: अब सबकी नजरें प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या पदच्युति की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी? क्या सरकारी राशि की वसूली होगी? क्या अनुशासनिक कार्रवाई समय पर पूरी होगी? क्या संपत्ति जांच की मांग पर कोई निर्णय होगा? और क्या इस पूरे प्रकरण में अन्य जिम्मेदार लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी. इन सभी प्रश्नों का उत्तर आने वाले दिनों में प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से सामने आएगा। केवटी प्रखंड से जुड़ा यह मामला केवल एक स्थानीय विवाद नहीं रह गया है। इसने पंचायत व्यवस्था, वित्तीय पारदर्शिता, प्रशासनिक जवाबदेही और जनविश्वास जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को केंद्र में ला खड़ा किया है। यदि आदेशों का अक्षरशः पालन होता है और निष्पक्ष जांच आगे बढ़ती है, तो यह मामला बिहार में स्थानीय निकायों की जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। वहीं यदि कार्रवाई अधूरी रह जाती है, तो यह जनता के उस विश्वास को और कमजोर करेगी जो लोकतांत्रिक संस्थाओं की सबसे बड़ी पूंजी माना जाता है।
