कलम के चारों ओर यदि संदेह का घेरा खिंचने लगे, तो समझिए लोकतंत्र की नींव सवालों के भूकंप से कांप रही है; दरभंगा के पत्रकारों का सामूहिक ज्ञापन बना संवैधानिक चेतना का ऐतिहासिक दस्तावेज! जानिए आज दरभंगा के पत्रकारों के बीच ऐसा क्या हुआ, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

इतिहास के पृष्ठ साक्षी हैं कि साम्राज्य तलवारों से नहीं, बल्कि सत्य को मौन करने की प्रवृत्ति से कमजोर हुए हैं। जब प्रश्न पूछने वाली आवाज़ें संकोच में बदलने लगती हैं, जब जनपक्षधर लेखनी अपने ही भविष्य को लेकर आशंकित हो जाती है और जब समाचार संकलन का दायित्व निभाने वाला व्यक्ति स्वयं कानूनी अनिश्चितताओं के कुहासे में खड़ा दिखाई देता है, तब संकट किसी व्यक्ति या पेशे का नहीं रह जाता... वह लोकतांत्रिक चेतना की परीक्षा बन जाता है. पढ़े पूरी खबर....

कलम के चारों ओर यदि संदेह का घेरा खिंचने लगे, तो समझिए लोकतंत्र की नींव सवालों के भूकंप से कांप रही है; दरभंगा के पत्रकारों का सामूहिक ज्ञापन बना संवैधानिक चेतना का ऐतिहासिक दस्तावेज! जानिए आज दरभंगा के पत्रकारों के बीच ऐसा क्या हुआ, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
कलम के चारों ओर यदि संदेह का घेरा खिंचने लगे, तो समझिए लोकतंत्र की नींव सवालों के भूकंप से कांप रही है; दरभंगा के पत्रकारों का सामूहिक ज्ञापन बना संवैधानिक चेतना का ऐतिहासिक दस्तावेज! जानिए आज दरभंगा के पत्रकारों के बीच ऐसा क्या हुआ, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

दरभंगा। इतिहास के पृष्ठ साक्षी हैं कि साम्राज्य तलवारों से नहीं, बल्कि सत्य को मौन करने की प्रवृत्ति से कमजोर हुए हैं। जब प्रश्न पूछने वाली आवाज़ें संकोच में बदलने लगती हैं, जब जनपक्षधर लेखनी अपने ही भविष्य को लेकर आशंकित हो जाती है और जब समाचार संकलन का दायित्व निभाने वाला व्यक्ति स्वयं कानूनी अनिश्चितताओं के कुहासे में खड़ा दिखाई देता है, तब संकट किसी व्यक्ति या पेशे का नहीं रह जाता... वह लोकतांत्रिक चेतना की परीक्षा बन जाता है।

दरभंगा में हाल के वर्षों में पत्रकारों के विरुद्ध विभिन्न थानों में प्राथमिकी दर्ज होने तथा गिरफ्तारी की घटनाओं को लेकर उत्पन्न चिंताओं के बीच जिले के अनेक पत्रकार एक मंच पर आए और उन्होंने मिथिला प्रक्षेत्र के पुलिस उप महानिरीक्षक मनोज कुमार तिवारी तथा दरभंगा के जिलाधिकारी कौशल कुमार को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। यह ज्ञापन किसी विशेष मामले की पैरवी नहीं, बल्कि निष्पक्ष प्रक्रिया, प्राकृतिक न्याय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संरक्षण की मांग का दस्तावेज है।

ज्ञापन में कहा गया कि पत्रकार लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में समाज और प्रशासन के बीच संवाद का सेतु हैं। जनहित के प्रश्नों को सामने लाना उनका संवैधानिक और सामाजिक दायित्व है। ऐसे में यदि पत्रकारों के विरुद्ध प्राप्त शिकायतों पर बिना पर्याप्त तथ्य-सत्यापन, बिना प्रारंभिक जांच और बिना उनका पक्ष सुने सीधे प्राथमिकी दर्ज करने की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो इससे स्वतंत्र पत्रकारिता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और पत्रकारों के बीच असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो सकती है।

पत्रकार प्रतिनिधिमंडल ने प्रशासन के समक्ष सात महत्वपूर्ण मांगें रखीं। इनमें किसी भी पत्रकार के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने से पहले वरीय अधिकारियों को सूचना देने, संबंधित पत्रकार को अपना पक्ष रखने का अवसर प्रदान करने, डीएसपी अथवा उससे उच्च अधिकारी से प्रारंभिक जांच कराने, तथ्य सत्यापन के बिना गिरफ्तारी जैसी कठोर कार्रवाई से परहेज़ करने, पत्रकारों से जुड़ी शिकायतों के लिए पारदर्शी प्रक्रिया बनाने, समय-समय पर पत्रकारों और प्रशासन के बीच समन्वय बैठक आयोजित करने तथा दर्ज मामलों की समीक्षा कर दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई की संभावना समाप्त करने की मांग शामिल है।

इस सामूहिक पहल में अनेक पत्रकारों ने अपनी उपस्थिति और हस्ताक्षर के माध्यम से समर्थन दर्ज कराया। इनमें प्रमुख रूप से संजय कुमार, अभिषेक कुमार, गुड्डू राज, लाल बाबू, एमएच खान, नौशाद अहमद, चंद्रप्रकाश कर्ण उर्फ टिंकू, विवेक मुस्कान पंडित, फैजान दानिश, आशीष महापात्र, ज़ाहिद अनवर राजू, रोहित कुमार, सूरज कुमार, प्रो. संतोष दत्त झा, कौशल किशोर कर्ण, राहुल चौधरी, लक्ष्मण कुमार, नीरज कुमार राय, सरफराज़ आलम, राकेश झा, धर्मेंद्र मिश्रा, रमन चौधरी, संजय राय, मनोज कुमार झा, प्रभास रंजन, सोनू झा, मोहन झा, लालटून शर्मा, रमेश शर्मा, वीरू पासवान तथा मनीष कुमार सहित अन्य पत्रकार शामिल रहे। यह ज्ञापन किसी विशेषाधिकार की मांग नहीं करता, बल्कि विधिसम्मत प्रक्रिया के पालन की अपेक्षा व्यक्त करता है। लोकतंत्र में कानून और अभिव्यक्ति दोनों की गरिमा समान रूप से महत्वपूर्ण है। यदि जांच निष्पक्ष होगी, प्रक्रिया पारदर्शी होगी और संवाद सतत रहेगा, तो इससे प्रशासन और समाज दोनों का विश्वास मजबूत होगा।

दरभंगा प्रशासन के समक्ष यह अवसर है कि वह इस ज्ञापन को केवल एक औपचारिक आवेदन न माने, बल्कि संस्थागत संवाद को सुदृढ़ करने की दिशा में एक रचनात्मक पहल के रूप में देखे। यदि पत्रकार प्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच नियमित संवाद की व्यवस्था विकसित होती है, तो इससे अनावश्यक विवादों की संभावना कम होगी और जनहित के मुद्दों पर स्वस्थ सहयोग का वातावरण बनेगा। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आलोचना को सुनने की क्षमता है। एक उत्तरदायी प्रशासन और एक निर्भीक पत्रकारिता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि जनहित की साझा यात्रा के सहयात्री हैं। इसलिए यह ज्ञापन केवल पत्रकारों की आवाज़ नहीं, बल्कि उस व्यापक सिद्धांत की याद दिलाता है कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।कलम का दायित्व प्रश्न उठाना है और प्रशासन का दायित्व निष्पक्ष उत्तरदायित्व निभाना। जब दोनों अपनी-अपनी संवैधानिक मर्यादा में कार्य करते हैं, तभी लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप सुदृढ़ होता है। दरभंगा के पत्रकारों की यह सामूहिक पहल उसी संवैधानिक विश्वास की अभिव्यक्ति है... जहाँ संवाद संघर्ष से बड़ा है, प्रक्रिया पूर्वाग्रह से बड़ी है और न्याय किसी भी व्यवस्था की सर्वोच्च पहचान है।