हराही, दिग्घी और गंगासागर की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर: 28 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय में होगी अहम सुनवाई, NGT के आदेश के बाद दरभंगा में शुरू हुई अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को ‘ऐतिहासिक’ बताते हुए तालाब बचाओ अभियान ने जिला प्रशासन का जताया आभार; अब तीनों ऐतिहासिक जलाशयों के सीमांकन, ‘यूजर्स एसोसिएशन’ के गठन, वेटलैंड संरक्षण, भूजल संकट और पर्यावरणीय पुनर्जीवन को लेकर राज्य सरकार से नए ज्ञापन की तैयारी…

मिथिला की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और पारिस्थितिक विरासत माने जाने वाले हराही, दिग्घी और गंगासागर जलाशयों को बचाने की बहुचर्चित मुहिम एक बार फिर निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुकी है। वर्षों से न्यायालयों, पर्यावरणीय मंचों और सामाजिक आंदोलनों के माध्यम से चल रहे ‘तालाब बचाओ अभियान’ ने अब अपनी रणनीति को और अधिक व्यापक स्वरूप देने का निर्णय लिया है। रविवार को दरभंगा स्थित सीतायन में अजित कुमार मिश्र की अध्यक्षता में आयोजित अभियान की महत्वपूर्ण बैठक में न केवल सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामले की आगामी सुनवाई पर विस्तार से चर्चा हुई, बल्कि जलाशयों के दीर्घकालिक संरक्षण, अतिक्रमण उन्मूलन, जनभागीदारी, भूजल संरक्षण तथा पर्यावरणीय पुनर्स्थापन की दिशा में अनेक ठोस प्रस्ताव भी सामने आए. पढ़े पूरी खबर.....

हराही, दिग्घी और गंगासागर की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर: 28 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय में होगी अहम सुनवाई, NGT के आदेश के बाद दरभंगा में शुरू हुई अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को ‘ऐतिहासिक’ बताते हुए तालाब बचाओ अभियान ने जिला प्रशासन का जताया आभार; अब तीनों ऐतिहासिक जलाशयों के सीमांकन, ‘यूजर्स एसोसिएशन’ के गठन, वेटलैंड संरक्षण, भूजल संकट और पर्यावरणीय पुनर्जीवन को लेकर राज्य सरकार से नए ज्ञापन की तैयारी…
हराही, दिग्घी और गंगासागर की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर: 28 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय में होगी अहम सुनवाई, NGT के आदेश के बाद दरभंगा में शुरू हुई अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को ‘ऐतिहासिक’ बताते हुए तालाब बचाओ अभियान ने जिला प्रशासन का जताया आभार; अब तीनों ऐतिहासिक जलाशयों के सीमांकन, ‘यूजर्स एसोसिएशन’ के गठन, वेटलैंड संरक्षण, भूजल संकट और पर्यावरणीय पुनर्जीवन को लेकर राज्य सरकार से नए ज्ञापन की तैयारी…

दरभंगा। मिथिला की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और पारिस्थितिक विरासत माने जाने वाले हराही, दिग्घी और गंगासागर जलाशयों को बचाने की बहुचर्चित मुहिम एक बार फिर निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुकी है। वर्षों से न्यायालयों, पर्यावरणीय मंचों और सामाजिक आंदोलनों के माध्यम से चल रहे ‘तालाब बचाओ अभियान’ ने अब अपनी रणनीति को और अधिक व्यापक स्वरूप देने का निर्णय लिया है। रविवार को दरभंगा स्थित सीतायन में श्री अजीत कुमार मिश्र की अध्यक्षता में आयोजित अभियान की महत्वपूर्ण बैठक में न केवल सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामले की आगामी सुनवाई पर विस्तार से चर्चा हुई, बल्कि जलाशयों के दीर्घकालिक संरक्षण, अतिक्रमण उन्मूलन, जनभागीदारी, भूजल संरक्षण तथा पर्यावरणीय पुनर्स्थापन की दिशा में अनेक ठोस प्रस्ताव भी सामने आए।

बैठक में नई दिल्ली से जुड़े अभियान के अधिवक्ता कमलेश कुमार मिश्र ने जानकारी दी कि 28 जुलाई 2026 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय में हराही, दिग्घी और गंगासागर से संबंधित मामले की सुनवाई प्रस्तावित है। उन्होंने बताया कि इस महत्वपूर्ण सुनवाई में देश के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं प्रख्यात पर्यावरणविद् संजय पारीख तालाब बचाओ अभियान की ओर से पक्ष रख सकते हैं। इसे अभियान के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है, क्योंकि यह मामला केवल तीन जलाशयों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी जल संरक्षण, पर्यावरणीय न्याय और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा से जुड़े व्यापक प्रश्नों को भी स्पर्श करता है। बैठक के दौरान अधिवक्ता कमलेश कुमार मिश्र ने अभियान से जुड़े सदस्यों को सुझाव दिया कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), पूर्वी क्षेत्र पीठ के 23 मार्च 2023 के आदेश, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 8 फरवरी 2017 के निर्देश तथा 16वीं लोकसभा की जल संसाधन संबंधी स्थायी समिति की दसवीं रिपोर्ट के आलोक में बिहार सरकार और जिला प्रशासन को एक नया विस्तृत ज्ञापन (Fresh Memorandum) सौंपा जाए। इस ज्ञापन में विशेष रूप से तीनों जलाशयों की वास्तविक सीमा का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कर उसे सार्वजनिक करने, जलाशयों के संरक्षण में स्थानीय नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने तथा ‘यूजर्स एसोसिएशन’ के गठन की मांग प्रमुख रूप से शामिल की जाएगी।

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बैठक में यह भी उल्लेख किया गया कि हराही, दिग्घी और गंगासागर केवल स्थानीय तालाब नहीं हैं, बल्कि इनका उल्लेख देश के राष्ट्रीय वेटलैंड एटलस में भी दर्ज है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा वर्ष 2010–11 में तैयार राष्ट्रीय वेटलैंड मानचित्र में इन जलाशयों की पहचान की गई थी। देशभर में चिन्हित लगभग 2.01 लाख वेटलैंड्स की सूची में इन ऐतिहासिक जलाशयों का शामिल होना इनके पर्यावरणीय महत्व को और अधिक रेखांकित करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे जलाशयों का संरक्षण केवल स्थानीय प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पर्यावरणीय दायित्व का भी हिस्सा है। बैठक में हाल के दिनों में जिला प्रशासन द्वारा दिग्घी और गंगासागर झीलों से अतिक्रमण हटाने के लिए प्रारंभ की गई कार्रवाई का स्वागत किया गया। तालाब बचाओ अभियान के सदस्यों ने इसे वर्षों से लंबित पर्यावरणीय न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक प्रशासनिक पहल बताते हुए जिलाधिकारी, दरभंगा के प्रति औपचारिक आभार व्यक्त किया। वक्ताओं का मत था कि यदि यह अभियान निष्पक्षता, पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप निरंतर जारी रहा, तो मिथिला के अन्य सार्वजनिक जलाशयों के संरक्षण का भी मार्ग प्रशस्त होगा।

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बैठक में उपस्थित विभिन्न विशेषज्ञों ने भी अपने-अपने सुझाव रखे। प्रो. विद्यानाथ झा, तसीम नवाब, डॉ. अमरजी कुमार और जितेन्द्र कुमार मिश्र ने सामाजिक जागरूकता अभियान को गाँवों, मोहल्लों और शैक्षणिक संस्थानों तक विस्तारित करने की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं डॉ. राम बाबू खेतान ने प्रशासन और नागरिक समाज के बीच बेहतर समन्वय विकसित करने का सुझाव दिया। डॉ. संजय कुमार सहनी ने स्कूलों, महाविद्यालयों तथा मत्स्यजीवी समुदायों के बीच विशेष जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने की अनुशंसा की, ताकि जल संरक्षण को जनांदोलन का स्वरूप दिया जा सके। बैठक केवल तीन जलाशयों तक सीमित नहीं रही। इसमें मोईन पोखर पर बढ़ते अतिक्रमण, मिथिला क्षेत्र में गहराते पेयजल संकट, भारत–नेपाल कमला मैत्री मंच के साथ संयुक्त कार्यक्रम, दरभंगा एवं मधुबनी जिले के सार्वजनिक जलाशयों की भूमि पर पंचायत सरकार भवनों के कथित निर्माण, NGT में लंबित स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज से जुड़े मामलों तथा अभियान के संचालन के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने जैसे विषयों पर भी गंभीर चर्चा हुई। इससे स्पष्ट संकेत मिला कि तालाब बचाओ अभियान अब केवल अतिक्रमण हटाने तक सीमित न रहकर जल प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा को व्यापक सामाजिक विमर्श का विषय बनाना चाहता है।

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बैठक में डॉ. विजय कुमार, संतोष कुमार यादव, छात्र नेता दिलीप कुमार, अविनाश भास्कर, रौशन कुमार तथा अभियान के संयोजक नारायण जी चौधरी सहित अनेक सदस्यों ने अपने विचार व्यक्त किए। सभी वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि यदि न्यायालयों के निर्देश, वैज्ञानिक अध्ययन और जनभागीदारी को समान महत्व दिया जाए, तो हराही, दिग्घी और गंगासागर जैसे ऐतिहासिक जलाशयों को पुनर्जीवित कर भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है। दरभंगा के हराही, दिग्घी और गंगासागर को लेकर संघर्ष कोई नया नहीं है। बीते कई वर्षों से पर्यावरणविद्, सामाजिक संगठन और स्थानीय नागरिक इन जलाशयों को अतिक्रमण से मुक्त कराने, इनके प्राकृतिक स्वरूप को बहाल करने तथा न्यायालयों के आदेशों के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग करते रहे हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेशों और न्यायिक हस्तक्षेप के बाद प्रशासनिक सक्रियता बढ़ी है। अब 28 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तावित सुनवाई पर न केवल इस अभियान से जुड़े लोगों, बल्कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों और स्थानीय नागरिकों की भी निगाहें टिकी हुई हैं, क्योंकि इस मामले का प्रभाव केवल तीन जलाशयों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह बिहार में सार्वजनिक जलाशयों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण नज़ीर भी स्थापित कर सकता है।