पढ़िए प्रधान संपादक आशिष कुमार की विशेष रिपोर्ट! 22 अप्रैल को ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक जुबिली हॉल में होगा ज्ञान का महाआगमन, जब बिहार के राज्यपाल सह कुलाधिपति लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैय्यद अता हसनैन के करकमलों से ‘समकालीन समय में व्यावसायिक अनुसंधान’ विषयक पाँच दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का होगा भव्य उद्घाटन, देशभर से 300 से अधिक विद्वान, शोधार्थी और शिक्षाविद जुटेंगे दरभंगा की धरती पर....

दरभंगा की धरती अक्सर अपने इतिहास, अपनी संस्कृति और अपने बौद्धिक वैभव के लिए जानी जाती रही है। यहाँ की मिट्टी में सदियों से ज्ञान का अंकुर फूटता रहा है। कभी राजदरबारों में शास्त्रार्थ हुआ, कभी विश्वविद्यालयों के प्रांगण में विचारों का महासंग्राम। और अब एक बार फिर ऐसा ही एक क्षण आने वाला है, जब ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय का परिसर पाँच दिनों तक ज्ञान, शोध और विचारों के एक ऐसे महासंगम का साक्षी बनेगा, जिसकी गूंज न केवल दरभंगा बल्कि पूरे देश के अकादमिक जगत में सुनाई देगी. पढ़े पूरी खबर.......

पढ़िए प्रधान संपादक आशिष कुमार की विशेष रिपोर्ट! 22 अप्रैल को ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक जुबिली हॉल में होगा ज्ञान का महाआगमन, जब बिहार के राज्यपाल सह कुलाधिपति लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैय्यद अता हसनैन के करकमलों से ‘समकालीन समय में व्यावसायिक अनुसंधान’ विषयक पाँच दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का होगा भव्य उद्घाटन, देशभर से 300 से अधिक विद्वान, शोधार्थी और शिक्षाविद जुटेंगे दरभंगा की धरती पर....
पढ़िए प्रधान संपादक आशिष कुमार की विशेष रिपोर्ट! 22 अप्रैल को ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक जुबिली हॉल में होगा ज्ञान का महाआगमन, जब बिहार के राज्यपाल सह कुलाधिपति लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैय्यद अता हसनैन के करकमलों से ‘समकालीन समय में व्यावसायिक अनुसंधान’ विषयक पाँच दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का होगा भव्य उद्घाटन, देशभर से 300 से अधिक विद्वान, शोधार्थी और शिक्षाविद जुटेंगे दरभंगा की धरती पर....

दरभंगा की धरती अक्सर अपने इतिहास, अपनी संस्कृति और अपने बौद्धिक वैभव के लिए जानी जाती रही है। यहाँ की मिट्टी में सदियों से ज्ञान का अंकुर फूटता रहा है। कभी राजदरबारों में शास्त्रार्थ हुआ, कभी विश्वविद्यालयों के प्रांगण में विचारों का महासंग्राम। और अब एक बार फिर ऐसा ही एक क्षण आने वाला है, जब ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय का परिसर पाँच दिनों तक ज्ञान, शोध और विचारों के एक ऐसे महासंगम का साक्षी बनेगा, जिसकी गूंज न केवल दरभंगा बल्कि पूरे देश के अकादमिक जगत में सुनाई देगी।

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22 अप्रैल की सुबह, ठीक पूर्वाह्न 10:30 बजे, विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक जुबिली हॉल का वातावरण कुछ अलग होगा। मंच सजा होगा, विद्वानों का जमावड़ा होगा, और उसी मंच पर बिहार के राज्यपाल सह कुलाधिपति लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैय्यद अता हसनैन का आगमन होगा। यह केवल एक औपचारिक उद्घाटन नहीं होगा, बल्कि वह क्षण होगा जब शिक्षा, शोध और भविष्य की अर्थव्यवस्था पर विमर्श का एक बड़ा द्वार खुलेगा। यह अवसर होगा विश्वविद्यालय वाणिज्य एवं व्यवसाय प्रशासन विभाग के तत्वावधान में आयोजित ‘समकालीन समय में व्यावसायिक अनुसंधान’ विषयक पाँच दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन। यह सम्मेलन 22 अप्रैल से 26 अप्रैल तक चलेगा और इन पाँच दिनों के दौरान विश्वविद्यालय का हर कोना विचारों के कंपन से भरा रहेगा।

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ज्ञान का मंच, जहाँ देश के कोने-कोने से आएंगे विद्वान: इस राष्ट्रीय सम्मेलन की खासियत यह है कि यह केवल एक विभागीय कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा बौद्धिक मंच बनने जा रहा है जहाँ देश के विभिन्न प्रांतों से 300 से अधिक विद्वान, शोधार्थी और विद्यार्थी जुटेंगे। यह वही मंच होगा जहाँ विचारों का आदान-प्रदान होगा, बहसें होंगी, शोध के नए रास्ते खुलेंगे और व्यापार, प्रबंधन तथा अर्थव्यवस्था के बदलते स्वरूप पर गहन मंथन होगा। सम्मेलन की तैयारी को अंतिम रूप देने के लिए वाणिज्य संकायाध्यक्ष सह संरक्षक प्रो. एचके सिंह की अध्यक्षता में विभागीय बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में सम्मेलन की रूपरेखा, कार्यक्रमों की संरचना और व्यवस्थाओं की समीक्षा की गई। बैठक के दौरान प्रो. हरे कृष्ण सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह सम्मेलन केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय की अकादमिक पहचान को और मजबूत करने का अवसर है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय के कुलपति सह सम्मेलन के मुख्य संरक्षक प्रो. संजय कुमार चौधरी के मार्गदर्शन में सभी तैयारियाँ निर्धारित समयानुसार तेजी से पूरी की जा रही हैं। उनके अनुसार, यह सम्मेलन न केवल वाणिज्य संकाय बल्कि पूरे विश्वविद्यालय के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि साबित हो सकता है।

विशिष्ट अतिथियों की मौजूदगी बढ़ाएगी सम्मेलन की गरिमा: इस राष्ट्रीय सम्मेलन में कई प्रतिष्ठित शिक्षाविदों की उपस्थिति कार्यक्रम की गरिमा को और ऊँचा करेगी। सम्मेलन में पूर्व कुलपति प्रो. एनसी गौतम और प्रो. एनके यादव ‘इन्दु’ विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल होंगे। इसके अतिरिक्त महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव भी अपने विचारों से सम्मेलन को समृद्ध करेंगे। साथ ही पूर्व कुलपति प्रो. एचके सिंह और प्रो. नीलिमा गुप्ता सहित अनेक वरिष्ठ शिक्षाविद संसाधन पुरुष के रूप में विभिन्न सत्रों में भाग लेंगे। इन सभी विद्वानों की मौजूदगी इस सम्मेलन को केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं रहने देगी, बल्कि यह एक गंभीर बौद्धिक विमर्श का मंच बनेगा।

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250 से अधिक विद्वानों का पंजीकरण, शोध का बढ़ता उत्साह: सम्मेलन के आयोजन सचिव डॉ. राजकुमार साह ने जानकारी देते हुए बताया कि इस सम्मेलन के लिए अब तक 250 से अधिक विद्वान, शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी पंजीकरण करा चुके हैं। उन्होंने कहा कि यह संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि देशभर के अकादमिक जगत में इस सम्मेलन को लेकर उत्साह है। डॉ. साह ने बताया कि सम्मेलन के दौरान उद्घाटन और समापन सत्र के अलावा पाँच तकनीकी सत्रों का आयोजन किया जाएगा। इन तकनीकी सत्रों में देश के प्रमुख वाणिज्य-शास्त्री, प्रबंधन-शास्त्री और अर्थशास्त्री अपने शोधपत्र प्रस्तुत करेंगे और समकालीन आर्थिक परिदृश्य पर गंभीर चर्चा करेंगे।

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शोध केन्द्रित हो रहा है विश्वविद्यालय का चरित्र: राष्ट्रीय सम्मेलन के संयोजक डॉ. दिवाकर झा ने बताया कि विश्वविद्यालय को हाल ही में मिले मेरू (MERO) दर्जे के बाद इसकी गतिविधियाँ तेजी से शोध केन्द्रित होती जा रही हैं।उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन का उद्देश्य केवल एक कार्यक्रम आयोजित करना नहीं है, बल्कि वाणिज्य संकाय में शोध के वातावरण को और मजबूत बनाना है। डॉ. झा के अनुसार आज का समय तेजी से बदल रहा है। व्यापार की संरचना बदल रही है, बाजार की भाषा बदल रही है और तकनीक ने अर्थव्यवस्था को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है। ऐसे समय में आवश्यक है कि विश्वविद्यालय केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रहे, बल्कि वह शोध और नवाचार के माध्यम से समाज और अर्थव्यवस्था को दिशा देने का कार्य करे।

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एआई, स्मार्ट इकोसिस्टम और सतत विकास पर होगी चर्चा: इस सम्मेलन में कई महत्वपूर्ण विषयों पर गहन चर्चा होने वाली है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं: सतत विकास (Sustainable Development), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग, स्मार्ट इकोसिस्टम का निर्माण, नीति निर्माण में शोध की भूमिका, बहुउद्देशीय पहुंच और समग्र शोध-विधि, नवाचार आधारित आर्थिक वातावरण....इन विषयों पर होने वाला मंथन आने वाले वर्षों की आर्थिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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युद्ध स्तर पर चल रही तैयारियाँ: सम्मेलन की संयुक्त आयोजन सचिव डॉ. निर्मला कुशवाह ने बताया कि कार्यक्रम की तैयारियाँ युद्ध स्तर पर चल रही हैं। सम्मेलन को सफल बनाने के लिए कई समितियाँ गठित की गई हैं, जिनमें शामिल हैं..... आयोजन समिति, स्वागत समिति, तकनीकी समिति, आवास समिति, यातायात समिति.... इन समितियों के सदस्य लगातार दिन-रात काम कर रहे हैं ताकि देशभर से आने वाले विद्वानों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

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जब जुबिली हॉल बनेगा विचारों का रणक्षेत्र: दरभंगा का जुबिली हॉल कई ऐतिहासिक क्षणों का साक्षी रहा है। लेकिन 22 अप्रैल की सुबह यह हॉल एक बार फिर इतिहास लिखने वाला है। जब राज्यपाल सह कुलाधिपति लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैय्यद अता हसनैन मंच पर उपस्थित होंगे और सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे, तब यह केवल एक औपचारिक शुरुआत नहीं होगी। वह क्षण होगा जब विचारों का एक नया अध्याय खुलेगा। जहाँ शोधपत्रों के माध्यम से अर्थव्यवस्था के भविष्य पर सवाल उठेंगे। जहाँ युवा शोधार्थी अपने विचार रखेंगे। जहाँ वरिष्ठ विद्वान अनुभवों का खजाना साझा करेंगे।और जहाँ से शायद कई ऐसे विचार जन्म लेंगे, जो आने वाले वर्षों में व्यापार, प्रबंधन और अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेंगे।

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दरभंगा के लिए क्यों है यह सम्मेलन महत्वपूर्ण: दरभंगा केवल एक शहर नहीं, बल्कि यह एक सांस्कृतिक और बौद्धिक केंद्र रहा है। यह वही धरती है जहाँ विद्वानों ने सदियों तक ज्ञान की मशाल जलाए रखी। ऐसे में जब राष्ट्रीय स्तर का सम्मेलन यहाँ आयोजित होता है, तो यह केवल विश्वविद्यालय की उपलब्धि नहीं होती, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए गर्व का विषय बन जाती है।यह सम्मेलन दरभंगा को एक बार फिर राष्ट्रीय अकादमिक नक्शे पर मजबूत उपस्थिति दिला सकता है। पाँच दिनों तक चलने वाला यह सम्मेलन केवल शोधपत्रों की प्रस्तुति तक सीमित नहीं रहेगा। यह एक ऐसा मंच होगा जहाँ विचार टकराएँगे, नए प्रश्न उठेंगे और शायद कई पुराने भ्रम भी टूटेंगे। क्योंकि आज का समय केवल सूचना का नहीं, बल्कि गंभीर शोध और नवाचार का समय है। और यही संदेश यह सम्मेलन देने वाला है। 22 अप्रैल की सुबह जब जुबिली हॉल के दरवाजे खुलेंगे, जब मंच पर विद्वानों का जमावड़ा होगा, जब राज्यपाल सह कुलाधिपति का आगमन होगा..... तब शायद दरभंगा की हवा में भी एक अलग सी हलचल होगी। वह हलचल होगी ज्ञान की, शोध की और भविष्य की। और शायद इसी कारण यह सम्मेलन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक विचार-यात्रा की शुरुआत बन सकता है।