सृष्टि का अमृत सायंकाल: मिथिलांचल की वह कथा जो आज ब्रह्मांड में गूँजेगी
आज जब सूरज अपनी अंतिम किरणों को मिथिलांचल की पावन धरती पर बिखेर रहा है, एक ऐसी शाम का आलिंगन होने जा रहा है, जो समय के परदे को चीरकर अनंत तक पहुँचेगी। कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय का प्रांगण आज केवल एक मिट्टी का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक दिव्य मंदिर बनने को तैयार है—जहाँ "सृष्टि ओडिसी नृत्य संस्थान" अपनी दो दशकों की साधना को अमृत की बूँदों में ढालकर मानवता को समर्पित करेगा. पढ़े पुरी खबर......

दरभंगा: आज जब सूरज अपनी अंतिम किरणों को मिथिलांचल की पावन धरती पर बिखेर रहा है, एक ऐसी शाम का आलिंगन होने जा रहा है, जो समय के परदे को चीरकर अनंत तक पहुँचेगी। कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय का प्रांगण आज केवल एक मिट्टी का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक दिव्य मंदिर बनने को तैयार है—जहाँ "सृष्टि ओडिसी नृत्य संस्थान" अपनी दो दशकों की साधना को अमृत की बूँदों में ढालकर मानवता को समर्पित करेगा। आज शाम, जब मुख्य अतिथि के रूप में दरभंगा महाराज के पौत्र कुमार कपिलेश्वर सिंह इस पवित्र भूमि पर पधारेंगे, यह क्षण मिथिला की आत्मा का वह स्वर होगा, जो धरती से लेकर नक्षत्रों तक संनाद करेगा। हवा में एक मधुर कंपन है, पेड़ों की पत्तियाँ किसी प्राचीन मंत्र की लय में झूम रही हैं, और मिथिलांचल का हर प्राणी इस अमृत सायंकाल की प्रतीक्षा में अपने हृदय को थामे हुए है।
एक बीज से ब्रह्मांड तक की यात्रा: यह कथा उस पवित्र दिन से शुरू होती है—14 जुलाई 2006, जब मिथिला के हृदयस्थल दरभंगा में गुरु हिमांशु शेखर नायक की कृपा से जयप्रकाश नारायण पाठक और नयन कुमार माँझी ने एक स्वप्न को जन्म दिया। यह स्वप्न था "सृष्टि ओडिसी नृत्य संस्थान"—एक ऐसा संकल्प, जो ओडिसी नृत्य के एकल स्वर से शुरू होकर मिथिलांचल की सांस्कृतिक आत्मा को पुनर्जागृत करने का भागीरथी प्रयास बना। उस दिन जो बीज बोया गया, वह केवल मिट्टी में नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक चेतना में अंकुरित हुआ। आज, दो दशक बाद, यह एक विशाल वृक्ष बन चुका है, जिसकी जड़ें मिथिला की प्राचीन गाथाओं में गहरे धँसी हैं, और शाखाएँ नृत्य की आठों विधाओं, संगीत की अमर लयों और पेंटिंग के अनंत रंगों तक फैल चुकी हैं। यहाँ प्रशिक्षण केवल कला का पाठ नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है—जहाँ बच्चे संस्कारों के सूरज में खिलते हैं और अनुशासन के पंखों से उड़ान भरते हैं।
सृष्टि के इस आंगन से निकले सितारे आज आकाश को रोशन कर रहे हैं। दर्जनों बच्चे सांस्कृतिक कोटे से सरकारी नौकरियों में मिथिला का गौरव बढ़ा रहे हैं, तो सैकड़ों निजी मंचों पर विश्व को मिथिलांचल की कला का दर्शन करा रहे हैं। पर सृष्टि का ध्येय इससे कहीं ऊँचा है। यह केवल व्यक्तियों को नहीं, बल्कि एक समूची सभ्यता को पुनर्जन्म देना चाहता है। यह मिथिलांचल की हर नदी, हर पहाड़, हर हृदय में कला की वह अग्नि जलाना चाहता है, जो अंधेरे को भस्म कर दे और प्रकाश का एक नया युग रचे। सृष्टि केवल एक संस्थान नहीं, बल्कि एक आंदोलन है—जो मानवता को उसकी जड़ों से जोड़कर ब्रह्मांड तक ले जाना चाहता है।
इतिहास को अमर करने का संकल्प: सृष्टि ने कभी हार नहीं मानी। इसने उन स्थानों को चुना, जो समय की धूल में दब गए थे, और उन्हें अपनी कला से स्वर्ग बना दिया। 2014 से 2018 तक ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के चौरंगी पर दरभंगा नृत्य उत्सव ने एक भूले-बिसरे स्थल को कला का ताज पहनाया। वहाँ हर नृत्य में मिथिला की देवियाँ नाचीं, हर संगीत में माँ जानकी की वीणा बजी। फिर 2018 से पंडे इन्द्र भवन को अपने स्वरों से जीवंत कर सृष्टि ने सिद्ध कर दिया कि कला केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि एक शक्ति है—जो मृत को भी प्राण दे सकती है। और अब, कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय का यह प्रांगण उस अगले अध्याय का साक्षी बनने जा रहा है, जहाँ सृष्टि धरती को आकाश से जोड़ेगी। यहाँ हर पत्थर, हर कोना कला की सुगंध से भर जाएगा, और यह स्थल एक तीर्थ बनकर इतिहास में दर्ज हो जाएगा।
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आज का वह सायंकाल जो देवलोक को धरती पर लाएगा: आज शाम, जब सूरज की अंतिम किरणें इस प्रांगण को चूमकर विदा लेंगी, एक नया प्रकाश जन्म लेगा—सृष्टि का प्रकाश। यह मंच अभी सजा है, जैसे कोई स्वर्ग धरती पर अवतरित हो गया हो। फूलों की मालाओं से लिपटा यह प्रांगण, रंग-बिरंगी रोशनी से नहाया हुआ, और हवा में गूँजती संगीत की मधुर तरंगें—सब कुछ एक अलौकिक चित्र रच रहे हैं। कुमार कपिलेश्वर सिंह की शाही उपस्थिति इस सायंकाल को एक राजसी वैभव देगी, और सृष्टि के ये नन्हे साधक अपनी कला से ऐसा चमत्कार रचेंगे कि समय ठहर जाएगा।
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जैसे ही शाम गहराएगी, यह प्रांगण एक जादुई लोक में बदल जाएगा। यहाँ नृत्य की हर थाप धरती को स्पंदित करेगी, जैसे मिथिला की आत्मा अपने पैरों से ताल दे रही हो। संगीत की हर लहर हवा में तैरती हुई आत्मा को छूएगी, जैसे कोई प्राचीन मंत्र ब्रह्मांड में गूँज रहा हो। और पेंटिंग के रंग ऐसे होंगे, जैसे मधुबनी की आत्मा कैनवास से निकलकर जीवंत हो उठी हो। ये युवा कलाकार केवल प्रदर्शन नहीं करेंगे—वे पुरातन और नवीनता के उस संगम को जन्म देंगे, जो समय और अंतरिक्ष की सारी सीमाओं को लाँघ जाएगा। यहाँ मिथिला की प्राचीन कथाएँ साँस लेंगी, ओडिसी की मुद्राएँ एक नई भाषा बोलेंगी, और हर प्रस्तुति एक ऐसी कविता होगी, जो अनंत तक गूँजेगी।
यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक यज्ञ है—जहाँ मिथिलांचल की आत्मा अपने पूरे वैभव में प्रकट होगी। यहाँ हर बच्चा एक देवता बनकर नाचेगा, हर स्वर एक देवी का आह्वान होगा, और हर रंग एक नई सृष्टि रचेगा। यह सायंकाल केवल देखा नहीं जाएगा, बल्कि महसूस किया जाएगा—हर धड़कन में, हर साँस में, हर आँख के आँसुओं में।
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एक स्वप्न जो विश्व को प्रेरित करेगा: अभी कुछ घंटों बाद, जब तारे आकाश में अपने नन्हे दीप जलाएँगे, सृष्टि का यह स्वप्न साकार होने लगेगा। दर्शकों की आँखों में एक सपना चमकेगा, उनकी तालियों में एक आशीर्वाद गूँजेगा, और इन बच्चों की मुस्कानों में वह शक्ति होगी, जो इस सायंकाल को अमर बना देगी। सृष्टि का यह संकल्प है कि वह कला के माध्यम से न केवल मिथिलांचल, बल्कि विश्व को एक नई दिशा दे—जहाँ संस्कार, अनुशासन और सृजन का एक ऐसा त्रिवेणी संगम हो, जो मानवता को पुनर्जनन दे। यहाँ से निकला हर बच्चा एक सूरज होगा, जो अंधेरे को भेदकर प्रकाश का नया युग लाएगा। यहाँ हर प्रस्तुति एक प्रार्थना होगी, जो मिथिला की धरती को अनंत काल तक आशीर्वाद देगी।
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सृष्टि परिवार इस पल को समाज के हर हाथ, हर हृदय, हर आत्मा के सहयोग से ब्रह्मांड तक ले जाना चाहता है। यह केवल एक संस्थान की कहानी नहीं, बल्कि एक सभ्यता के पुनर्जागरण की गाथा है। यह वह क्षण है, जो मिथिलांचल को विश्व के मंच पर स्थापित करेगा—जहाँ हर संस्कृति इसे देखकर प्रेरणा लेगी, और हर मन इसे गाकर गर्व करेगा।
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आपका आह्वान, सृष्टि की पुकार: आज का यह सायंकाल अभी शुरू होने को है। सृष्टि परिवार आपके कदमों की आहट सुन रहा है—आपके उत्साह की गर्मी, आपके सहयोग की शक्ति, और आपके प्यार की मिठास का इंतज़ार कर रहा है। यह केवल एक मंच नहीं, बल्कि एक स्वप्न का आकाश है, जो आपके साथ मिलकर तारों को छूएगा। आइए, इस अमृत सायंकाल के साक्षी बनें। आइए, इस कथा का हिस्सा बनें। आइए, सृष्टि के साथ मिलकर एक ऐसी दुनिया रचें, जो कल्पना से भी परे हो—जहाँ मिथिलांचल की धड़कन ब्रह्मांड की धड़कन बन जाए। यह वह क्षण है, जो अनंत को स्पर्श करने को तैयार है—और आप इसके सहयात्री हैं।