बागमती तटबंध परियोजना को लेकर फिर गरमाया विरोध, दरभंगा-मुजफ्फरपुर के हजारों किसानों की खेती-किसानी और पर्यावरण पर मंडराए संकट का दावा; 2017 में बनी 9 सदस्यीय रिव्यू कमेटी की एक बैठक के बाद ठप हुई प्रक्रिया पर उठे सवाल, अब 15 अगस्त के बाद विशेषज्ञों की ‘अध्ययन समिति’ गठित कर पटना हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करने की तैयारी।
बागमती नदी पर प्रस्तावित तटबंध परियोजना को लेकर दरभंगा और मुजफ्फरपुर जिले के किसानों के बीच एक बार फिर असंतोष गहराता दिखाई दे रहा है। किसानों और बागमती तटबंध परियोजना का विरोध कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि परियोजना के निर्माण से दोनों जिलों के हजारों किसानों की खेती-किसानी, आजीविका और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। किसानों का कहना है कि किसी भी बड़े निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने से पहले उसके सामाजिक, पर्यावरणीय और कृषि संबंधी प्रभावों का व्यापक अध्ययन आवश्यक है. पढ़े पूरी खबर.....
दरभंगा। बागमती नदी पर प्रस्तावित तटबंध परियोजना को लेकर दरभंगा और मुजफ्फरपुर जिले के किसानों के बीच एक बार फिर असंतोष गहराता दिखाई दे रहा है। किसानों और बागमती तटबंध परियोजना का विरोध कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि परियोजना के निर्माण से दोनों जिलों के हजारों किसानों की खेती-किसानी, आजीविका और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। किसानों का कहना है कि किसी भी बड़े निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने से पहले उसके सामाजिक, पर्यावरणीय और कृषि संबंधी प्रभावों का व्यापक अध्ययन आवश्यक है।

इसी मुद्दे को लेकर आयोजित बैठक में ‘चास वास बचाओ अभियान’ के संयोजक जितेंद्र यादव ने कहा कि बागमती तटबंध परियोजना के संभावित विनाशकारी प्रभावों से दरभंगा और मुजफ्फरपुर जिले के हजारों किसानों का जीवन प्रभावित हो सकता है। उन्होंने कहा कि किसान लंबे समय से इस परियोजना को लेकर अपनी आपत्तियां सरकार के समक्ष रखते रहे हैं और वर्ष 2011 से ही दरभंगा तथा मुजफ्फरपुर के किसान लगातार बागमती तटबंध परियोजना का विरोध करते आ रहे हैं।

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2011 से जारी है किसानों का विरोध: बैठक में बताया गया कि बागमती तटबंध परियोजना को लेकर किसानों की चिंता कोई नई बात नहीं है। वर्ष 2011 से ही दोनों जिलों के हजारों किसान परियोजना के संभावित प्रभावों को लेकर विरोध दर्ज कराते रहे हैं। किसानों का मुख्य तर्क है कि तटबंध निर्माण से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि इससे उनकी कृषि भूमि, खेती की व्यवस्था, जल प्रवाह, पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय परिस्थितियों पर किस प्रकार का असर पड़ेगा। किसानों का कहना है कि बागमती जैसी नदी से जुड़ी किसी भी बड़ी परियोजना का प्रभाव केवल नदी के किनारे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे व्यापक क्षेत्र की कृषि और ग्रामीण जीवन प्रभावित हो सकता है। इसलिए परियोजना पर अंतिम निर्णय लेने से पहले वैज्ञानिक और विशेषज्ञ अध्ययन जरूरी है।

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2017 में मुख्यमंत्री के निर्देश पर बनी थी नौ सदस्यीय रिव्यू कमेटी: बैठक में बागमती तटबंध परियोजना के रिव्यू से जुड़े एक महत्वपूर्ण पुराने निर्णय का भी उल्लेख किया गया। प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, वर्ष 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के निर्देश पर बागमती तटबंध परियोजना के रिव्यू के लिए नौ सदस्यीय रिव्यू कमेटी का गठन किया गया था। इस कमेटी में किसानों की ओर से चार विशेषज्ञों एवं सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों को शामिल किया गया था। इनमें नदी और पर्यावरण से जुड़े अनुभवी विशेषज्ञों को स्थान दिया गया था।कमेटी में शामिल प्रमुख नामों में... दिनेश कुमार मिश्र, प्रसिद्ध नदी विशेषज्ञ, प्रो. राजीव सिन्हा, डिपार्टमेंट ऑफ अर्थ, आईआईटी कानपुर, प्रो. रामाकार झा, नदी विशेषज्ञ, एनआईटी पटना, अनिल प्रकाश, पर्यावरण कार्यकर्ता... शामिल बताए गए हैं। किसानों और आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि रिव्यू कमेटी का गठन इस बात का संकेत था कि सरकार भी परियोजना से जुड़े विभिन्न पहलुओं का पुनर्मूल्यांकन करना चाहती थी।

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एक बैठक के बाद रिव्यू कमेटी की गतिविधियां ठप होने का दावा: बैठक में सबसे गंभीर सवाल रिव्यू कमेटी की कार्यप्रणाली को लेकर उठाया गया। किसानों की ओर से कहा गया कि रिव्यू कमेटी की शुरुआत में एक बैठक हुई थी, लेकिन उसके बाद से आज तक इस कमेटी की दोबारा बैठक नहीं हुई। आंदोलन से जुड़े लोगों का आरोप है कि वर्ष 2017 में गठित रिव्यू कमेटी के गठन के बावजूद परियोजना का व्यापक पुनरावलोकन उस स्तर पर आगे नहीं बढ़ सका, जिसकी किसानों को उम्मीद थी। अब किसानों की चिंता इसलिए और बढ़ गई है क्योंकि उनके अनुसार सरकार एक बार फिर बागमती तटबंध निर्माण की दिशा में सक्रिय होती दिखाई दे रही है। बैठक में यह आरोप भी लगाया गया कि सरकार अब रिव्यू कमेटी के अध्ययन और निर्णय की प्रक्रिया पूरी हुए बिना ही बागमती बांध निर्माण की दिशा में पुनः सक्रिय हो रही है। किसानों और अभियान से जुड़े लोगों ने इसे गंभीर विषय बताते हुए कहा कि जब किसी परियोजना के पुनर्मूल्यांकन के लिए विशेषज्ञों की कमेटी पहले से गठित की जा चुकी है, तो उस कमेटी के अध्ययन और निष्कर्ष के बिना परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले सभी पहलुओं पर स्पष्टता जरूरी है। उनका कहना है कि विकास परियोजनाओं का विरोध केवल विरोध के लिए नहीं किया जा रहा है, बल्कि किसानों की मांग है कि परियोजना से होने वाले संभावित लाभ और नुकसान का वैज्ञानिक आधार पर आकलन किया जाए।

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नवल किशोर सिंह बोले... पहले हो समग्र अध्ययन, फिर लिया जाए निर्णय: बैठक में नवल किशोर सिंह ने किसानों की ओर से परियोजना को लेकर अपनी मांग स्पष्ट करते हुए कहा कि सभी किसान चाहते हैं कि बागमती तटबंध निर्माण से पहले परियोजना का समग्र अध्ययन कराया जाए। उन्होंने कहा कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि तटबंध निर्माण से किसानों की खेती-किसानी पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इसके साथ ही पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का भी उचित और वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए। किसानों का कहना है कि खेती केवल जमीन पर निर्भर नहीं है। जल प्रवाह, मिट्टी, प्राकृतिक जल निकासी, नदी की स्थिति और स्थानीय पारिस्थितिकी का भी कृषि व्यवस्था से सीधा संबंध है। ऐसे में किसी भी बड़े हस्तक्षेप से पहले इन सभी पहलुओं को एक साथ समझना आवश्यक है। बैठक में किसानों और अभियान से जुड़े लोगों ने आगे की रणनीति को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय भी लिया। निर्णय लिया गया कि 15 अगस्त के बाद डॉ. विद्यानाथ झा की अध्यक्षता में एक ‘अध्ययन समिति’ का गठन किया जाएगा। इस प्रस्तावित अध्ययन समिति में अलग-अलग विषयों के विशेषज्ञों को शामिल किए जाने की बात कही गई है। इसमें... वनस्पति विज्ञान, पर्यावरण, भूगोल, कृषि विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों की भागीदारी प्रस्तावित है। इस समिति का उद्देश्य बागमती तटबंध परियोजना के संभावित प्रभावों का व्यापक अध्ययन करना बताया गया है।

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अध्ययन रिपोर्ट के आधार पर पटना हाईकोर्ट जाने की तैयारी: बैठक में केवल अध्ययन समिति बनाने का निर्णय ही नहीं लिया गया, बल्कि अध्ययन के परिणाम के आधार पर कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाने की रणनीति भी तय की गई। प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, प्रस्तावित अध्ययन समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी और अध्ययन रिपोर्ट के आधार पर किसानों की ओर से पटना उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की जाएगी। इस निर्णय के बाद बागमती तटबंध परियोजना का मुद्दा आने वाले दिनों में कानूनी स्तर पर भी उठने की संभावना है। किसानों का पक्ष है कि परियोजना से जुड़े निर्णय से पहले उसके व्यापक सामाजिक, कृषि, पर्यावरणीय और पारिस्थितिक प्रभावों का अध्ययन होना चाहिए। बागमती तटबंध परियोजना को लेकर आयोजित बैठक में दरभंगा और मुजफ्फरपुर दोनों जिलों से लोगों की भागीदारी रही। इससे यह संकेत मिलता है कि परियोजना को लेकर किसानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय बनाने की कोशिश की जा रही है। बैठक में मुजफ्फरपुर से जितेंद्र यादव, नवल किशोर सिंह, राम लोचन सिंह, राज कुमार मंडल और विवेक कुमार शामिल हुए। वहीं दरभंगा से प्रो. विद्यानाथ झा, तसीम नवाब और नारायण जी चौधरी ने भाग लिया।

बैठक के अंत में नारायण जी चौधरी की ओर से प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई। परियोजना से जुड़े सवाल अब फिर सामने... बागमती तटबंध परियोजना को लेकर किसानों की ओर से उठाई गई आपत्तियों ने एक बार फिर कई बुनियादी सवालों को सामने ला दिया है। किसानों का कहना है कि नदी आधारित किसी भी बड़ी परियोजना को केवल निर्माण के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। उसके साथ जुड़े कृषि, पर्यावरण, भूगोल, वनस्पति, जल प्रवाह और स्थानीय जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। वर्ष 2017 में गठित नौ सदस्यीय रिव्यू कमेटी की आगे की गतिविधियों और उसकी बैठकें नहीं होने का मुद्दा भी किसानों ने प्रमुखता से उठाया है। अब 15 अगस्त के बाद प्रस्तावित अध्ययन समिति के गठन और उसके बाद तैयार होने वाली रिपोर्ट पर सभी की निगाहें रहेंगी। यदि अध्ययन समिति गठित होती है और उसके निष्कर्षों के आधार पर पटना उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की जाती है, तो बागमती तटबंध परियोजना का मुद्दा आने वाले दिनों में न्यायिक और सार्वजनिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय बन सकता है।फिलहाल दरभंगा और मुजफ्फरपुर के किसानों की मांग स्पष्ट है। बागमती तटबंध परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले व्यापक, वैज्ञानिक और समग्र अध्ययन कराया जाए तथा किसानों की खेती-किसानी, पर्यावरण और स्थानीय पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले प्रभावों को समझे बिना कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जाए।
