जानिए स्वाती झा की वह अनकही कहानी, जहाँ डॉक्टर बनने का सपना अचानक रंगों और रेखाओं में बदल गया; मिथिला की सांस्कृतिक विरासत से निकली दरभंगा की बेटी ने अपनी कला के दम पर ChatGPT के वैश्विक विज्ञापन तक कैसे बनाई जगह, पढ़िए संघर्ष, परिवार और दादी के त्याग से बुनी पूरी कहानी।
कभी-कभी किसी उपलब्धि की चमक के पीछे एक ऐसी कहानी छिपी होती है, जिसे मंच की रोशनी में खड़े होकर बताना आसान नहीं होता। दुनिया किसी तस्वीर को देखती है, किसी विज्ञापन में दिखाई देने वाले चेहरे को पहचानती है और फिर तालियों के बीच उपलब्धि का उत्सव समाप्त हो जाता है; लेकिन उस एक क्षण तक पहुँचने के पीछे कितने मोड़, कितने संशय, कितने त्याग और कितनी अदृश्य हथेलियों का आशीर्वाद रहा होगा....यह कहानी अक्सर पर्दे के पीछे ही रह जाती है. पढ़े पूरी रिपोर्ट....
दरभंगा/बसंत। कभी-कभी किसी उपलब्धि की चमक के पीछे एक ऐसी कहानी छिपी होती है, जिसे मंच की रोशनी में खड़े होकर बताना आसान नहीं होता। दुनिया किसी तस्वीर को देखती है, किसी विज्ञापन में दिखाई देने वाले चेहरे को पहचानती है और फिर तालियों के बीच उपलब्धि का उत्सव समाप्त हो जाता है; लेकिन उस एक क्षण तक पहुँचने के पीछे कितने मोड़, कितने संशय, कितने त्याग और कितनी अदृश्य हथेलियों का आशीर्वाद रहा होगा....यह कहानी अक्सर पर्दे के पीछे ही रह जाती है।

दरभंगा जिले के जाले प्रखंड अंतर्गत बसंत गाँव की बेटी स्वाती झा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। मिथिला की सांस्कृतिक स्मृतियों से निकली एक साधारण-सी बालिका, जिसने कभी डॉक्टर बनने का सपना देखा था, आज कला की दुनिया में अपनी पहचान बना रही है और हाल में ChatGPT से संबंधित एक विशेष विज्ञापन अभियान का हिस्सा बनकर एक ऐसे वैश्विक मंच तक पहुँची हैं, जहाँ उनकी मिथिला पेंटिंग और उनकी कलात्मक यात्रा को व्यापक दर्शक मिले। लेकिन स्वाती की कहानी केवल ChatGPT के विज्ञापन तक पहुँचने की कहानी नहीं है। यह उस निर्णय की कहानी है, जब एक छात्रा ने समाज द्वारा स्वाभाविक समझे जाने वाले करियर-पथ से हटकर अपने भीतर की आवाज सुनी; यह उस परिवार की कहानी है जिसने परिस्थितियों की कठिनाइयों के बावजूद बेटी के सपनों को दम नहीं तोड़ने दिया; और सबसे बढ़कर यह उस दादी की कहानी है, जो आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन जिनका स्नेह और आर्थिक सहयोग आज भी स्वाती की प्रत्येक उपलब्धि के पीछे एक मौन हस्ताक्षर की तरह मौजूद है।

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मानस्थली से चित्रकूट तक... शिक्षा ने बदली दिशा, लेकिन मंजिल कला ने तय की: स्वाती की प्रारंभिक शिक्षा दरभंगा के मानस्थली पब्लिक स्कूल, लक्ष्मीसागर से हुई, जहाँ उन्होंने UKG से आठवीं कक्षा तक अध्ययन किया। इसके बाद उनकी शिक्षा-यात्रा झारखंड के देवघर पहुँची, जहाँ सुप्रभा शिक्षा स्थली, विलियम्स टाउन से उन्होंने आगे की स्कूली शिक्षा पूरी की। दसवीं के बाद उन्होंने जीवविज्ञान को चुना। उस समय उनके मन में डॉक्टर बनने का सपना था। उन्होंने 11वीं और 12वीं की पढ़ाई कामतौल कॉलेज, दरभंगा से बायोलॉजी विषय के साथ पूरी की। देखने में यह वही पारंपरिक शैक्षणिक यात्रा थी, जिसमें एक विद्यार्थी अपने भविष्य को किसी प्रतिष्ठित पेशे के साथ जोड़कर देखता है। लेकिन नियति शायद स्वाती के लिए कोई दूसरी पटकथा लिख रही थी।

जब वह महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय, चित्रकूट पहुँचीं, तब उनके सामने कला की एक ऐसी दुनिया खुली, जिसने उनके भीतर दबे किसी अनाम आकर्षण को आवाज दे दी। उन्होंने फाइन आर्ट्स के वातावरण को देखा, कला को करीब से महसूस किया और धीरे-धीरे उन्हें यह एहसास हुआ कि उनका वास्तविक झुकाव चिकित्सा विज्ञान की ओर नहीं, बल्कि सृजन की उस दुनिया की ओर है जहाँ रंग, रेखाएँ, प्रतीक और परंपराएँ मिलकर भावनाओं को आकार देती हैं। और यहीं से उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ आया। उन्होंने डॉक्टर बनने के अपने पुराने स्वप्न से हटकर फाइन आर्ट्स को अपना करियर बनाने का निर्णय लिया। उन्होंने उसी विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ फाइन आर्ट्स (BFA) पूरा किया और वर्तमान में वहीं से मास्टर ऑफ फाइन आर्ट्स (MFA) कर रही हैं। यह निर्णय शायद बाहर से एक साधारण विषय-परिवर्तन दिखाई दे, लेकिन किसी युवा के लिए अपने वर्षों पुराने लक्ष्य को बदलकर अपनी अंतरात्मा की आवाज को स्वीकार करना अपने आप में साहस का परिचायक है।

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मिथिला की बेटी के भीतर कला का बीज कहाँ से आया: स्वाती की कला-यात्रा का कोई एक दिन नहीं है, जब उन्होंने अचानक चित्रकारी शुरू कर दी हो। इसकी जड़ें उनके बचपन की उन स्मृतियों में हैं, जहाँ मिथिला की संस्कृति जीवन का स्वाभाविक हिस्सा थी। घर में अरिपन, मधुबनी पेंटिंग और लोक परंपराओं को देखते हुए उनका बचपन बीता। हालांकि शुरुआती दिनों में कला को लेकर उनके भीतर कोई विशेष आकर्षण नहीं था। लेकिन चित्रकूट पहुँचने के बाद एक ऐसा संयोग बना जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। अपने मामा के घर में उन्होंने मधुबनी और फाइन आर्ट्स की अनेक पेंटिंग्स देखीं। रंगों और रेखाओं के उस संसार ने उनके भीतर सोई हुई जिज्ञासा को जैसे अचानक जगा दिया। वह आकर्षण धीरे-धीरे रुचि में बदला और रुचि ने अंततः जीवन के निर्णय का रूप ले लिया। उनके परिवार में भी कला और संस्कृति का वातावरण रहा है। उनके मामा फाइन आर्ट्स के प्रोफेसर और स्वयं कलाकार हैं, जबकि उनकी मामी भी मधुबनी कला से जुड़ी रही हैं। उनकी माँ श्रीमती स्नेहलता झा ने भी मधुबनी पेंटिंग का प्रशिक्षण लिया था। अर्थात स्वाती के लिए कला कोई बाहरी विषय नहीं थी। वह उनके पारिवारिक और सांस्कृतिक परिवेश में पहले से ही किसी मौन धारा की तरह बह रही थी। चित्रकूट ने उस धारा को दिशा दे दी।

बसंत गाँव से निकली प्रतिभा के पीछे शिक्षा और संस्कार का संसार: स्वाती मूल रूप से दरभंगा जिले के जाले प्रखंड के बसंत गाँव की निवासी हैं। उनके पिता श्री लोकेश झा बिहार सरकार के एक सरकारी उच्च विद्यालय में लाइब्रेरियन के पद पर कार्यरत हैं। माँ स्नेहलता झा गृहिणी हैं। परिवार में तीन भाई-बहन हैं और स्वाती सबसे बड़ी हैं। उनके छोटे भाई और छोटी बहन दोनों जयपुर से बी.टेक. की पढ़ाई कर रहे हैं। इस परिवार की विशेषता केवल यह नहीं कि सभी बच्चे उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर हैं; बल्कि यह भी है कि परिवार ने अपनी बेटी को उसके चुने हुए मार्ग पर चलने का साहस दिया। स्वाती के अनुसार, उनके माता-पिता ने उनके प्रत्येक निर्णय में उनका साथ दिया। जब उन्होंने डॉक्टर बनने की दिशा से हटकर फाइन आर्ट्स को जीवन का लक्ष्य बनाया, तब परिवार ने उनके निर्णय को अस्वीकार करने के बजाय उन्हें आगे बढ़ने की शक्ति दी।

और फिर आया वह मोड़, जब स्वाती की कला ChatGPT के अभियान तक पहुँची: किसी वैश्विक तकनीकी मंच के अभियान का हिस्सा बन जाना अपने आप में एक असाधारण अवसर है। लेकिन स्वाती के लिए यह अवसर किसी अचानक खुले दरवाजे की तरह नहीं आया था। इस यात्रा में जिज्ञासा मिश्रा, जो स्वयं कलाकार और पत्रकार हैं, की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्हें रचनात्मक कलाकारों की तलाश से जुड़ी जानकारी मिली और उन्होंने स्वाती का नाम सुझाया। इसके बाद ChatGPT अभियान की टीम ने स्वाती से संपर्क किया। बातचीत के कई चरण हुए। टीम ने उनकी कला-यात्रा, मधुबनी पेंटिंग और एक कलाकार के रूप में ChatGPT के उपयोग के बारे में जाना। इन्हीं संवादों और प्रक्रियाओं के बाद स्वाती को अभियान का हिस्सा बनने का अवसर मिला। और यहीं उनकी कहानी स्थानीय पहचान की सीमा से बाहर निकलती है। जिस कला की स्मृतियाँ उन्होंने मिथिला के घर-आँगन में देखीं, वही कला अब आधुनिक तकनीक के वैश्विक परिदृश्य में दिखाई देने लगी। एक ओर सदियों पुरानी लोक-संस्कृति की रेखाएँ थीं और दूसरी ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग की अत्याधुनिक तकनीक.... इन दोनों के बीच स्वाती की कला ने एक सेतु का रूप लिया।

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लेकिन इस चमकदार उपलब्धि के पीछे एक अदृश्य संघर्ष भी था: हर सफलता की तस्वीर चमकदार होती है, लेकिन उसके पीछे का संघर्ष अक्सर धुंधला रहता है। स्वाती ने बताया कि इस अभियान के दौरान उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अंग्रेज़ी भाषा को लेकर सहज न होना थी। एक वैश्विक टीम के साथ संवाद करना उनके लिए आसान नहीं था। लेकिन टीम ने सहयोग किया और जहाँ आवश्यकता हुई, वहाँ अनुवाद की व्यवस्था भी की गई। इस सहयोग ने उन्हें आत्मविश्वास दिया और उन्होंने बिना झिझक अपनी कला और अपनी बात सामने रखी। लेकिन भाषा की कठिनाई ही अकेली चुनौती नहीं थी। आर्थिक परिस्थितियाँ भी हमेशा अनुकूल नहीं रहीं। समाज में बेटियों की शिक्षा और उनके भविष्य को लेकर मौजूद पारंपरिक धारणाएँ भी कभी-कभी रास्ते में खड़ी हुईं। ऐसे समय में परिवार उनके लिए केवल परिवार नहीं रहा.... वह उनका कवच बन गया। और उस कवच के भीतर सबसे मजबूत धातु थीं...उनकी दादी।

स्वाती की सफलता का सबसे रहस्यमय और मार्मिक अध्याय एक दादी, जो आज नहीं हैं: स्वाती की पूरी कहानी में यदि कोई एक प्रसंग सबसे अधिक भीतर तक उतरता है, तो वह उनकी दादी से जुड़ा है। उनके शब्दों में, उनकी सफलता के पीछे सबसे बड़ा योगदान उनकी दादी का रहा। जब आर्थिक परिस्थितियाँ कठिन थीं और समाज में बेटियों की पढ़ाई को लेकर तरह-तरह की धारणाएँ मौजूद थीं, तब उनकी दादी ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार आर्थिक सहयोग भी किया। किसी भी उपलब्धि के इतिहास में आर्थिक सहयोग की राशि का उल्लेख महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण वह विश्वास होता है जो किसी व्यक्ति को यह कहता है.... तुम आगे बढ़ो, रास्ता हम देख लेंगे। स्वाती की दादी ने शायद यही किया। आज वह दादी इस दुनिया में नहीं हैं। और यही इस सफलता की सबसे बड़ी विडंबना है। जिस मुकाम तक पहुँचने के लिए उन्होंने स्वाती को आगे बढ़ाया, जिस भविष्य को देखने की आकांक्षा उनके भीतर रही होगी, उसी भविष्य की चमक देखने के लिए उनकी आँखें आज मौजूद नहीं हैं। स्वाती के मन में यही एक पीड़ा आज भी जीवित है कि उनकी दादी उन्हें इस मुकाम पर नहीं देख सकीं। इसलिए ChatGPT के विज्ञापन में दिखाई देने वाला स्वाती का चेहरा केवल एक कलाकार का चेहरा नहीं है। उस चेहरे के पीछे एक ऐसी स्त्री की स्मृति भी खड़ी है, जिसने शायद अपनी सीमित सामर्थ्य में एक लड़की के सपनों को भविष्य की ओर धकेला था। स्वाती की प्रत्येक उपलब्धि अब उनके लिए एक मौन श्रद्धांजलि भी है।

मिथिला पेंटिंग के लिए स्वाती का सपना क्या है: स्वाती के लिए मिथिला पेंटिंग केवल रंगों और रेखाओं का संयोजन नहीं है। यह उनकी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। उनका मानना है कि आज की पीढ़ी को अपनी संस्कृति और कला पर गर्व करना चाहिए। वह युवाओं और विशेष रूप से मिथिला की बेटियों से कहती हैं कि अपने सपनों पर विश्वास रखें। प्रतिभा और परिश्रम के साथ कोई भी मंजिल असंभव नहीं है। यह संदेश उस समय और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, जब पारंपरिक कलाएँ आधुनिकता की तेज गति में कई बार अपनी पहचान के लिए संघर्ष करती दिखाई देती हैं। स्वाती का सफर इस बात का संकेत है कि परंपरा और आधुनिकता को एक-दूसरे का विरोधी मानना आवश्यक नहीं। मिथिला की कला अपनी जड़ों को बचाए रखते हुए आधुनिक मंचों पर नई भाषा बोल सकती है।

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बसंत से वैश्विक मंच तक... एक यात्रा अभी पूरी नहीं हुई: स्वाती झा की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शायद यह है कि यह कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है। BFA पूरा करने के बाद वह MFA कर रही हैं। उनकी कला-यात्रा अभी निर्माण की अवस्था में है। ChatGPT अभियान में उनकी उपस्थिति निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, लेकिन इसे अंतिम मंजिल कहना शायद उनकी यात्रा को छोटा कर देना होगा। एक ऐसी लड़की, जिसने डॉक्टर बनने का सपना देखा था; जिसने चित्रकूट में जाकर अपनी वास्तविक रुचि पहचानी; जिसने परिवार की परंपरा से मधुबनी कला की स्मृतियाँ प्राप्त कीं; जिसने आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद कला को अपना जीवन बनाया; जिसने भाषा की बाधा के बावजूद एक वैश्विक अभियान का हिस्सा बनने का आत्मविश्वास अर्जित किया.... उसकी कहानी अभी आगे लिखी जानी बाकी है। और उस आगे की कहानी में शायद मिथिला की कला के लिए कोई नया अध्याय लिखा जाए। आज जब ChatGPT के विज्ञापन में स्वाती झा का चेहरा दिखाई देता है, तो उसके पीछे केवल एक कलाकार की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं दिखाई देती। वहाँ दरभंगा की मिट्टी, बसंत गाँव की स्मृतियाँ, माता-पिता का विश्वास, मामा-मामी से मिला कलात्मक वातावरण, चित्रकूट की शिक्षा, और सबसे बढ़कर एक ऐसी दादी का अधूरा सपना दिखाई देता है, जो स्वयं उस उपलब्धि की साक्षी बनने के लिए जीवित नहीं रहीं। यही वह बिंदु है जहाँ स्वाती की कहानी महज सफलता की खबर नहीं रह जाती। यह एक ऐसी यात्रा बन जाती है, जिसमें मिथिला की पारंपरिक कला आधुनिक तकनीक के वैश्विक क्षितिज से संवाद करती है; एक बेटी अपने भीतर की आवाज सुनकर अपना रास्ता बदलती है; और एक दिवंगत दादी का विश्वास, समय और मृत्यु की सीमाओं को पार करके अपनी पोती की उपलब्धियों में आज भी जीवित दिखाई देता है। बसंत की उस बेटी की कहानी अभी जारी है.... और शायद आने वाले समय में मिथिला की कला के इतिहास में स्वाती झा का नाम केवल एक विज्ञापन में दिखाई देने वाले चेहरे के रूप में नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की प्रतिनिधि कलाकार के रूप में दर्ज हो, जिसने लोककला को उसकी जड़ों से उठाकर आधुनिक विश्व के नए कैनवास तक पहुँचाने का साहस किया। मिथिला की कला, समकालीन सृजन और अपनी कलात्मक यात्रा को निरंतर आगे बढ़ा रहीं स्वाती झा की गतिविधियों और आगामी रचनात्मक कार्यों से जुड़े रहने के लिए पाठक उन्हें इंस्टाग्राम पर भी फॉलो कर सकते हैं। उनके कला-सफर, नई रचनाओं और भविष्य की उपलब्धियों की झलक उनके आधिकारिक इंस्टाग्राम हैंडल @Swatijha012 पर देखी जा सकती है।
