जब दरभंगा के स्टेशन पर थमा लोकतंत्र और मब्बी चौक पर जला जनाक्रोश 'मिथिला जन जन की आवाज़' की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट: मतदाता सूची संशोधन या सामाजिक बहिष्कार की नई पटकथा?

बुधवार की सुबह दरभंगा ने अपने आप में एक राजनीतिक दस्तावेज देखा। जनशक्ति, जनाक्रोश और जनसंवेदना की त्रयी ने जैसे इस ऐतिहासिक ज़िले को लोकतंत्र के प्रासंगिक सवालों का मंच बना दिया।एनएच-27 की सड़कें हों या दरभंगा जंक्शन की पटरियां दोनों जगहों पर सत्ता के ख़िलाफ़ आवाज़ें गूंजती रहीं। दिल्ली और मुंबई की चकाचौंध से दूर, बिहार के इस सांस्कृतिक शहर ने इस दिन बता दिया कि लोकतंत्र की असली नब्ज़ गाँव, गली, स्टेशन और चौराहों पर धड़कती है न कि सिर्फ़ राजधानी के वातानुकूलित कॉन्फ्रेंस हॉलों में. पढ़े पुरी खबर.......

जब दरभंगा के स्टेशन पर थमा लोकतंत्र और मब्बी चौक पर जला जनाक्रोश 'मिथिला जन जन की आवाज़' की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट: मतदाता सूची संशोधन या सामाजिक बहिष्कार की नई पटकथा?
जब दरभंगा के स्टेशन पर थमा लोकतंत्र और मब्बी चौक पर जला जनाक्रोश 'मिथिला जन जन की आवाज़' की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट: मतदाता सूची संशोधन या सामाजिक बहिष्कार की नई पटकथा?

बुधवार की सुबह दरभंगा ने अपने आप में एक राजनीतिक दस्तावेज देखा। जनशक्ति, जनाक्रोश और जनसंवेदना की त्रयी ने जैसे इस ऐतिहासिक ज़िले को लोकतंत्र के प्रासंगिक सवालों का मंच बना दिया।एनएच-27 की सड़कें हों या दरभंगा जंक्शन की पटरियां दोनों जगहों पर सत्ता के ख़िलाफ़ आवाज़ें गूंजती रहीं। दिल्ली और मुंबई की चकाचौंध से दूर, बिहार के इस सांस्कृतिक शहर ने इस दिन बता दिया कि लोकतंत्र की असली नब्ज़ गाँव, गली, स्टेशन और चौराहों पर धड़कती है न कि सिर्फ़ राजधानी के वातानुकूलित कॉन्फ्रेंस हॉलों में।

 

रेल पटरी नहीं, जनसंविधान पर धरना था दरभंगा में थमा लोकतंत्र का पहिया: बिहार बंद के तहत जब महागठबंधन के कार्यकर्ता दरभंगा जंक्शन पर पटरियों पर बैठ गए, तो वह दृश्य सिर्फ ट्रेनों के चक्का जाम की कहानी नहीं कह रहा था। यह उस "संविधान की असहमति" का प्रदर्शन था, जिसमें नागरिकों ने चुनाव आयोग से सीधा संवाद मांगा। बिहार संपर्क क्रांति सुपरफास्ट ट्रेन, जो दरभंगा से दिल्ली जाने वाली एक प्रमुख ट्रेन मानी जाती है, को घंटों रोककर कार्यकर्ताओं ने एक प्रतीक गढ़ा "जब हम चल नहीं सकते, तो आपकी सत्ता भी नहीं चलेगी।" स्टेशन पर अफरा-तफरी, यात्री परेशान, महिलाएं बच्चों को संभालतीं, बुज़ुर्गों की आंखों में थकान ये सब मिलकर एक सवाल पूछ रहे थे, "किसके लिए है ये पुनरीक्षण?"

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सड़कें बनी सवालों की सरहद मब्बी चौक पर धधकता आक्रोश: अगर रेलवे ट्रैक पर लोकतंत्र बैठा था, तो एनएच-27 पर वो चीख रहा था। मब्बी चौक से आगे का इलाका एक युद्धभूमि बन चुका था। टायर जलाए गए, वाहन रुक गए, धूप में जाम में फंसे स्कूली बच्चे, ऑफिस जा रहे लोग, मरीज ले जा रही एंबुलेंस हर चेहरा सत्ता से एक ही सवाल करता दिखा, "क्यों?"

प्रदर्शनकारी बार-बार दोहरा रहे थे "मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण कोई तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक हेरफेर है।" महागठबंधन की ज़ुबानी "यह केवल एक सूची नहीं, बल्कि हमारे वजूद का प्रश्न है": महागठबंधन के नेताओं ने मंच से नहीं, सड़क से बात की। उनका आरोप साफ़ था "केंद्र सरकार और चुनाव आयोग की मिलीभगत से ये विशेष पुनरीक्षण दलित, पिछड़े, मुस्लिम और गरीब तबके को वोट देने के अधिकार से वंचित करने की साजिश है।" प्रवक्ताओं ने कहा कि "मनमाने ढंग से नाम हटाए जा रहे हैं, परिवारों के सदस्य सूची से गायब हैं और मोबाइल OTP आधारित सत्यापन जैसे हथकंडे सिर्फ शहरी सुविधा के लिए हैं, ग्रामीण वंचन के लिए नहीं।"

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क्या यह लोकतंत्र के नाम पर टेक्नोक्रेसी है?

"डिजिटल इंडिया" के नाम पर आधार कार्ड, मोबाइल नंबर और OTP सिस्टम से जुड़े पुनरीक्षण को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। दरभंगा जैसे ज़िलों में जहां हजारों ऐसे मतदाता हैं जिनके पास स्मार्टफोन नहीं, या नेटवर्क की सुविधा नहीं है, वे लोग कैसे डिजिटल माध्यम से अपने वोटिंग अधिकार को सिद्ध करें? क्या लोकतंत्र अब एक डिजिटल एप पर आधारित सुविधा मात्र बन चुका है? यात्रियों का दर्द "रेल चलाने वालों को हमारी तकलीफ़ दिखती है क्या?"

बिहार संपर्क क्रांति ट्रेन में फंसे यात्रियों ने सवाल उठाया:

“हमारे पास ज़रूरी काम है, दिल्ली में मेडिकल अपॉइंटमेंट, नौकरी की इंटरव्यू, बोर्डिंग फ्लाइट सबकुछ बर्बाद हो गया। लेकिन हम प्रदर्शनकारियों से नाराज़ नहीं हैं... हम सिस्टम से परेशान हैं, जो इतना असंवेदनशील हो गया है।”

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प्रशासनिक रवैया मौन और मशविरा: दरभंगा जिला प्रशासन की ओर से बंद को लेकर कोई बड़ी सख्ती नहीं देखी गई। पुलिस-बल की तैनाती रही, लेकिन स्थिति को शांतिपूर्ण बनाए रखने की कोशिश में 'सहमति और सहनशीलता' का खेल खेला गया। विरोध करने वालों से संवाद की कोशिश न होना इस बात का संकेत है कि सत्ता और सड़क के बीच की खाई आज भी बहुत गहरी है।

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क्या बिहार बंद से कुछ बदलेगा?

ये सवाल राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी कठिन है। लेकिन एक बात तय है इस आंदोलन ने वो बहस जरूर शुरू कर दी है जो अब तक 'फॉर्म भरने' और 'नाम छपने' तक सीमित थी।

अब सवाल है:

क्या मतदाता सूची की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सहभागी बनाया जाएगा?

क्या डिजिटल सत्यापन की जगह जमीनी सत्यों पर भरोसा होगा?

क्या लोकतंत्र सिर्फ वोट देने की तारीख तक सीमित रहेगा या उसकी प्रक्रिया में भी जनभागीदारी का स्थान होगा?

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दरभंगा से उठी आवाज़ अब गूंजेगी राजधानी में?

बिहार बंद ने बता दिया कि आने वाले विधानसभा चुनाव महज़ सीटों का गणित नहीं रहेंगे, यह अस्मिता और अधिकार की लड़ाई बन चुके हैं। दरभंगा जैसे शहरों ने, जहाँ से लोकनायक जयप्रकाश नारायण की आवाज़ भी कभी उठी थी, आज फिर लोकतंत्र को उसकी ज़मीन याद दिला दी है।

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लोकतंत्र की पटरियों पर जब जनता बैठ जाए, तो सत्ता को चलना बंद करना ही पड़ता है: बिहार बंद कोई सामान्य राजनीतिक औपचारिकता नहीं थी। यह चेतावनी थी वोटर लिस्ट सिर्फ नामों की फेहरिस्त नहीं, जनता के अधिकारों का आईना है। अगर उसे धुंधलाया गया, तो फिर रास्ते और रेल दोनों ठहरेंगे।दरभंगा ने यह दिखा दिया है बिहार जाग रहा है।