का हो तिवारी साहब… क्या हत्या भी आपको जगा नहीं पाई? गणेश महतो की मौत के बाद सात महीने तक आज़ाद घूमते आरोपी, दरोगा मुकेश कुमार की सुस्त जांच, फाइलों में दबी कार्रवाई और आखिरकार डीआईजी स्वप्ना गौतम मेश्राम की सख्ती से हिली बिरौल पुलिस की नींव....

कभी-कभी किसी इंसान की मौत सिर्फ एक मौत नहीं होती। वह मौत पूरे सिस्टम की नब्ज टटोल देती है। दरभंगा के बिरौल थाना क्षेत्र में घटित यह मामला भी कुछ ऐसा ही है जहां एक बुजुर्ग की जान तो चली गई, लेकिन कानून की आत्मा महीनों तक कोमा में पड़ी रही।यह कहानी है गणेश महतो की। लेकिन यह कहानी उससे भी ज्यादा है यह कहानी है पुलिस की उदासीनता, जांच की सुस्ती, और उस खौफनाक सच्चाई की, जहां हत्या के बाद भी आरोपी बेखौफ घूमते रहे. पढ़े पूरी खबर.......

का हो तिवारी साहब… क्या हत्या भी आपको जगा नहीं पाई? गणेश महतो की मौत के बाद सात महीने तक आज़ाद घूमते आरोपी, दरोगा मुकेश कुमार की सुस्त जांच, फाइलों में दबी कार्रवाई और आखिरकार डीआईजी स्वप्ना गौतम मेश्राम की सख्ती से हिली बिरौल पुलिस की नींव....
का हो तिवारी साहब… क्या हत्या भी आपको जगा नहीं पाई? गणेश महतो की मौत के बाद सात महीने तक आज़ाद घूमते आरोपी, दरोगा मुकेश कुमार की सुस्त जांच, फाइलों में दबी कार्रवाई और आखिरकार डीआईजी स्वप्ना गौतम मेश्राम की सख्ती से हिली बिरौल पुलिस की नींव....

दरभंगा। कभी-कभी किसी इंसान की मौत सिर्फ एक मौत नहीं होती। वह मौत पूरे सिस्टम की नब्ज टटोल देती है। दरभंगा के बिरौल थाना क्षेत्र में घटित यह मामला भी कुछ ऐसा ही है जहां एक बुजुर्ग की जान तो चली गई, लेकिन कानून की आत्मा महीनों तक कोमा में पड़ी रही।यह कहानी है गणेश महतो की। लेकिन यह कहानी उससे भी ज्यादा है यह कहानी है पुलिस की उदासीनता, जांच की सुस्ती, और उस खौफनाक सच्चाई की, जहां हत्या के बाद भी आरोपी बेखौफ घूमते रहे।

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जब मारपीट मौत में बदली और कानून सुस्त पड़ गया: 28 अक्टूबर 2025। यह तारीख बिरौल थाना के रजिस्टर में दर्ज है। एक साधारण-सी प्राथमिकी के रूप में। लेकिन इस तारीख के पीछे एक बुजुर्ग की टूटी हड्डियां थीं, कराहती सांसें थीं और अंत में मौत थी। गणेश महतो, उम्र ढल चुकी थी। शरीर कमजोर था। लेकिन उस दिन जिन हाथों ने उन पर हमला किया, उन हाथों में न कोई रहम था, न डर। गंभीर मारपीट के बाद जब उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इलाज चला, उम्मीदें भी चलीं और फिर एक दिन डॉक्टरों ने वह शब्द कह दिया, जिसके बाद सब खत्म हो जाता है।मृत।

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मौत के बाद उठे सवाल, लेकिन जवाब नहीं: हत्या जैसे संगीन अपराध में आमतौर पर पुलिस की गाड़ी सबसे पहले दौड़ती है। गिरफ्तारी होती है। छापेमारी होती है।इलाके में डर पैदा किया जाता है। लेकिन यहां जो हुआ, वह डराने वाला था पुलिस की निष्क्रियता। प्राथमिकी में नौ नामजद आरोपी थे। सात महीने बीत गए। लेकिन कानून का शिकंजा सिर्फ एक व्यक्ति तक ही पहुंच पाया।बाकी आठ? वे गांव में दिखते रहे। खुलेआम घूमते रहे।शायद मुस्कुराते भी रहे होंगे क्योंकि उन्हें पता था कि कानून उनके पीछे नहीं आ रहा।

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इश्तेहार सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया: जब गिरफ्तारी नहीं हुई, तब कागजी कार्रवाई शुरू हुई। इश्तेहार। नोटिस। तामिला। सब हुआ लेकिन सिर्फ फाइलों में। ढाई महीने से ज्यादा वक्त बीत गया। न कुर्की-जब्ती हुई। न दबाव बना। न कार्रवाई। यह वही दौर था जब आरोपी सबसे ज्यादा कमजोर होते हैं। लेकिन पुलिस उस वक्त सबसे ज्यादा सुस्त दिखी। यह सवाल उठना लाज़मी है.... क्या पुलिस को इस बात का इंतज़ार था कि मामला ठंडा पड़ जाए? कि परिवार थक जाए? कि गांव चुप हो जाए?

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जब ऊपर तक पहुंची बदबू, तब हिली कुर्सी: इस पूरे मामले में अगर कोई मोड़ आया, तो वह तब आया जब मामला मिथिला क्षेत्र की डीआईजी डॉ. स्वप्ना गौतम मेश्राम तक पहुंचा। 26 दिसंबर। वर्चुअल समीक्षा बैठक।जो तस्वीर सामने आई, वह पुलिस महकमे के लिए असहज करने वाली थी। हत्या का मामला। लेकिन कोई नियमित समीक्षा नहीं, महीनों तक निष्क्रियता, प्रगति रिपोर्ट भेजने में भी असामान्य देरी...यह सब मिलकर एक ही बात कह रहे थे यह सिर्फ लापरवाही नहीं, यह सिस्टम फेल्योर है।

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जांचकर्ता पर कार्रवाई: देर से सही, लेकिन जरूरी: जांच की कमान संभाल रहे दरोगा मुकेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठे। और सवाल सिर्फ उठे ही नहीं उन पर कार्रवाई का आदेश भी हुआ। डीआईजी स्तर से साफ कहा गया हत्या जैसे गंभीर कांड में इस तरह की शिथिलता अस्वीकार्य है। दस दिनों के भीतर विभागीय कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी गई। यह आदेश सिर्फ एक दरोगा के लिए नहीं था यह पूरे थाना सिस्टम के लिए चेतावनी थी।

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एसडीपीओ की कार्यशैली भी कठघरे में: लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। बिरौल के एसडीपीओ प्रभाकर तिवारी जिनके जिम्मे पूरे अनुमंडल की कानून-व्यवस्था है। उनकी भूमिका पर भी सवाल उठे। समीक्षा न करना। मामले को लटकने देना। साढ़े सात महीने बाद प्रगति रिपोर्ट भेजना। यह सब बताता है कि नेतृत्व स्तर पर भी ढिलाई थी। एक सप्ताह के भीतर स्पष्टीकरण मांगा जाना इस बात का संकेत है कि अब सिर्फ निचले स्तर के कर्मियों को दोषी ठहराकर मामला नहीं टाला जाएगा।

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गणेश महतो का परिवार: जो अब सिर्फ इंसाफ चाहता है: गणेश महतो अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनका परिवार आज भी उसी घर में है जहां दीवारें सवाल पूछती हैं। अगर मेरे पिता अमीर होते, तो क्या आरोपी आज भी खुले घूमते? यह सवाल किसी एक घर का नहीं है। यह पूरे समाज का सवाल है। डीआईजी ने आदेश दे दिया है....शेष आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी या कुर्की-जब्ती, पर्यवेक्षण प्रतिवेदन का पालन और शीघ्र निष्पादन, लेकिन सवाल बड़ा है.... क्या आदेश जमीन पर उतरेंगे?या फिर यह मामला भी कागजों की कब्र में दफन हो जाएगा?

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यह मामला सिर्फ बिरौल का नहीं है... यह कहानी बिरौल की है, लेकिन इसकी गूंज पूरे बिहार में सुनाई देती है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जहां गरीब की मौत अक्सर फाइल नंबर बनकर रह जाती है। अगर इस बार भी आरोपी बच गए तो यह सिर्फ गणेश महतो की हार नहीं होगी। यह कानून की हार होगी। अगर एक बुजुर्ग की हत्या के बाद सात महीने तक आरोपी आज़ाद रह सकते हैं तो आम आदमी किस भरोसे जिए?