बेटी के जन्मदिन की खुशियां सजाने निकला था फौजी पिता... लेकिन घर लौटा तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर; छह महीने की गर्भवती पत्नी की अंतिम पुकार....मेरे अजन्मे बच्चे को उसके पिता का चेहरा भी नसीब नहीं होगा...और तीन साल की मासूम बेटी की मासूम निगाहों ने पूरे दरभंगा की आंखें नम कर दीं।
कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी किसी युद्धभूमि में नहीं, बल्कि घर लौटने की उस छोटी-सी खुशी के बीच लिखी जाती है, जहाँ एक पिता अपनी नन्ही बेटी के जन्मदिन का केक लेने निकला हो। नियति ने ऐसा निर्मम प्रहार किया कि एक परिवार की सारी खुशियाँ पलभर में उजड़ गईं। रविवार को सड़क हादसे में भारतीय सेना के जवान अखिलेश आनंद की असमय मृत्यु ने न केवल उनके परिवार को, बल्कि पूरे दरभंगा जिले और पत्रकारिता जगत को गहरे शोक में डुबो दिया. पढ़े पूरी खबर.....
दरभंगा। कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी किसी युद्धभूमि में नहीं, बल्कि घर लौटने की उस छोटी-सी खुशी के बीच लिखी जाती है, जहाँ एक पिता अपनी नन्ही बेटी के जन्मदिन का केक लेने निकला हो। नियति ने ऐसा निर्मम प्रहार किया कि एक परिवार की सारी खुशियाँ पलभर में उजड़ गईं। रविवार को सड़क हादसे में भारतीय सेना के जवान अखिलेश आनंद की असमय मृत्यु ने न केवल उनके परिवार को, बल्कि पूरे दरभंगा जिले और पत्रकारिता जगत को गहरे शोक में डुबो दिया।

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सोमवार को जब पोस्टमॉर्टम के बाद अखिलेश आनंद का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटकर उनके पैतृक गांव बड़गांव पहुंचा, तो मानो पूरा गांव मौन हो गया। हर आंख नम थी, हर चेहरा स्तब्ध था। जिस बेटे के स्वागत के लिए कुछ दिन पहले घर का आंगन मुस्कुरा रहा था, उसी बेटे की अंतिम विदाई के लिए आज पूरा गांव उमड़ पड़ा था। वातावरण में केवल सिसकियां थीं, आंसू थे और ऐसी पीड़ा थी, जिसे शब्दों में समेटना लगभग असंभव है। भारतीय सेना के जवानों ने पूरे सैन्य सम्मान के साथ अपने वीर साथी को गार्ड ऑफ ऑनर दिया। जैसे ही अंतिम सलामी दी गई, वहां मौजूद हजारों लोगों की आंखें छलक उठीं। पूरे गांव में 'भारत माता की जय' और 'वीर जवान अमर रहें' के गगनभेदी नारों के बीच एक वीर सपूत पंचतत्व में विलीन हो गया।

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लेकिन इस पूरे दृश्य का सबसे हृदयविदारक क्षण तब आया, जब अखिलेश की छह महीने की गर्भवती पत्नी अंशु अपने पति के पार्थिव शरीर से लिपटकर बिलख पड़ी। उनका करुण क्रंदन वहां उपस्थित हर व्यक्ति के हृदय को चीर रहा था। कांपती आवाज में वे बार-बार यही कह रही थीं.... मेरा क्या होगा... हमारी छोटी-सी बेटी को कौन संभालेगा... मेरे गर्भ में पल रहे बच्चे को उसके पिता का चेहरा भी नसीब नहीं होगा... इन शब्दों ने वहां मौजूद लोगों को भीतर तक झकझोर दिया। शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति रहा हो जिसकी आंखें नम न हुई हों। किसी की सांत्वना उन आंसुओं को रोक नहीं पा रही थी। उधर, महज तीन वर्ष की मासूम बेटी काव्या कुछ समझ नहीं पा रही थी। वह रोते हुए कभी अपनी मां को देखती, कभी तिरंगे में लिपटे अपने पिता को। उसे शायद यह एहसास भी नहीं कि जिसके साथ वह खेलती थी, जो उसके जन्मदिन का केक लाने निकले थे, वे अब कभी लौटकर नहीं आएंगे। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए जीवनभर भूल पाना आसान नहीं होगा।

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विडंबना देखिए, अखिलेश आनंद अपनी बेटी का जन्मदिन मनाने के लिए बीस दिनों की छुट्टी लेकर घर आए थे। घर में खुशियों की तैयारियां चल रही थीं। जन्मदिन की योजनाएं बन रही थीं। परिवार उत्साहित था। लेकिन नियति ने ऐसी करवट ली कि जन्मदिन की मुस्कान मातम में बदल गई। केक लाने निकले अखिलेश अपने दो मित्रों के साथ सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए। एक ट्रक की टक्कर ने तीन परिवारों के जीवन की दिशा ही बदल दी। इस हादसे में उनके दो घनिष्ठ मित्र पंकज राय और बादल यादव की भी मृत्यु हो गई। तीनों दोस्त वर्षों से एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी थे। जन्मदिन की तैयारी भी साथ कर रहे थे। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि यह साथ उनकी अंतिम यात्रा तक पहुंच जाएगा। अखिलेश आनंद कुशेश्वरस्थान प्रखंड के बड़गांव निवासी वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार राय के छोटे पुत्र थे। वर्ष 2014 में भारतीय सेना में भर्ती हुए और राजस्थान के बीकानेर में देश की सेवा कर रहे थे। वे 16 जुलाई को ही अवकाश लेकर अपने गांव पहुंचे थे। किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ ही दिनों बाद वही जवान तिरंगे में लिपटकर लौटेगा।

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उनके अंतिम संस्कार में विधायक, पूर्व विधायक, प्रशासनिक अधिकारी, जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता तथा हजारों ग्रामीणों ने श्रद्धांजलि अर्पित की। पूरे सैन्य सम्मान के साथ गांव में उनका अंतिम संस्कार किया गया। मुखाग्नि उनके 12 वर्षीय भतीजे अभिनव राज ने दी। वह दृश्य भी अत्यंत मार्मिक था, जब एक मासूम बालक कांपते हाथों से अपने चाचा को अंतिम विदाई दे रहा था। इस घटना ने केवल एक परिवार को नहीं, बल्कि पूरे दरभंगा के पत्रकार समाज को भी गहरे शोक में डुबो दिया है। वरिष्ठ पत्रकार के परिवार पर टूटा यह दुःख हर पत्रकार अपने निजी दर्द की तरह महसूस कर रहा है। पत्रकार साथियों की आंखों में भी वही प्रश्न है.... क्या एक बेटी के जन्मदिन की तैयारी करने निकले पिता की कहानी का अंत ऐसा होना चाहिए था? हादसे के बाद ग्रामीणों का आक्रोश भी फूट पड़ा। लोगों ने सड़क जाम कर प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन किया और दुर्घटना के लिए जिम्मेदार लोगों पर कठोर कार्रवाई, पीड़ित परिवारों को समुचित मुआवजा तथा सड़क सुरक्षा के प्रभावी इंतजाम की मांग की। ग्रामीणों का कहना है कि यदि सड़क सुरक्षा के पर्याप्त उपाय समय पर किए गए होते, तो शायद तीन परिवार आज उजड़ने से बच जाते।

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आज बड़गांव का हर घर शोक में डूबा है। गांव की गलियों में पहले जैसी चहल-पहल नहीं, बल्कि एक गहरी खामोशी पसरी हुई है। यह घटना केवल एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि उन अनगिनत सपनों का अंत है, जो एक पिता, एक पति, एक बेटे और एक सैनिक ने अपने परिवार के लिए संजोए थे। अब समय आगे बढ़ जाएगा। कैलेंडर की तारीखें बदल जाएंगी। लेकिन जब भी उस मासूम बेटी का जन्मदिन आएगा, केक की हर मोमबत्ती शायद अपने पिता की याद में ही जलेगी। और जब छह महीने बाद गर्भ में पल रहा शिशु इस दुनिया में आएगा, तो वह अपने पिता की कहानियां तो सुनेगा, लेकिन उनके स्नेहिल स्पर्श को कभी महसूस नहीं कर पाएगा। एक सड़क हादसे ने केवल तीन जिंदगियां नहीं छीनीं, बल्कि कई परिवारों के भविष्य से मुस्कुराहट, विश्वास और उम्मीद भी छीन ली। वीर जवान अखिलेश आनंद अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका त्याग, उनका कर्तव्य और उनकी स्मृतियां हमेशा दरभंगा की मिट्टी, उनके गांव और हर भारतीय के हृदय में अमर रहेंगी। वीर जवान अखिलेश आनंद को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।
