पढ़िए यह हृदयविदारक खबर जिस बेटे की संदिग्ध मौत ने माँ को न्याय की राह पर भटकाया, उसी बेटे के बाद अब उसी माँ ने भी ज़हर पीकर दुनिया को कह दिया अलविदा; कश्यप के बाद मनीषा कुमारी की मौत ने सिस्टम, संवेदना और इंसाफ तीनों पर खड़े कर दिए हैं सबसे कठोर सवाल....
कभी कपड़ों की दुकान में बैठकर अपने बेटे के भविष्य के सपने सिलने वाली मनीषा कुमारी की ज़िंदगी आखिरकार उसी सिस्टम ने तोड़ दी, जिससे वह महीनों तक न्याय की भीख मांगती रहीं। जिस माँ ने अपने 10 वर्षीय बेटे कश्यप कुमार को अफसर बनाने का सपना देखा था, आज वही माँ न्याय न मिलने की पीड़ा में इस दुनिया को छोड़ गई. पढ़े पूरी खबर......
दरभंगा। कभी कपड़ों की दुकान में बैठकर अपने बेटे के भविष्य के सपने सिलने वाली मनीषा कुमारी की ज़िंदगी आखिरकार उसी सिस्टम ने तोड़ दी, जिससे वह महीनों तक न्याय की भीख मांगती रहीं। जिस माँ ने अपने 10 वर्षीय बेटे कश्यप कुमार को अफसर बनाने का सपना देखा था, आज वही माँ न्याय न मिलने की पीड़ा में इस दुनिया को छोड़ गई। यह कोई अचानक लिया गया कदम नहीं था। यह उस लंबे, थकाऊ और बेरहम संघर्ष का अंत था, जिसमें एक माँ हर दरवाज़े पर गई लेकिन हर जगह उसे सिर्फ़ ख़ामोशी, आश्वासन और इंतज़ार मिला।

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जहाँ से टूटी थी उम्मीदों की पहली सांस: तीन महीने पहले, दरभंगा के लहेरियासराय स्थित माउंट समर स्कूल के हॉस्टल में मनीषा कुमारी के बेटे कश्यप कुमार का शव संदिग्ध परिस्थिति में पंखे से लटका हुआ मिला था। वह बच्चा, जिसने अभी ठीक से दुनिया देखना भी शुरू नहीं किया था, अचानक “फंदे” की कहानी में बदल दिया गया। उस दिन से मनीषा कुमारी की ज़िंदगी रुक गई थी।वह रोई नहीं थी वह लड़ रही थी। वह बहादुरपुर थाना गई, फिर एसएसपी कार्यालय, फिर डीआईजी तक गुहार लगाई। हर बार यही कहा मेरे बेटे की मौत आत्महत्या नहीं हो सकती, यह हत्या है। लेकिन जवाब में उसे मिला “जांच चल रही है।”

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जांच के इंतज़ार में बुझती गई माँ: दिन बीतते गए, महीने गुजरते गए, लेकिन न्याय का सूरज नहीं निकला। मिथिला जन जन की आवाज ने उस समय इस मामले को प्रमुखता से उठाया था। हमने लिखा था कि कैसे एक गरीब माँ, जो कपड़ों की दुकान में काम कर अपने बेटे को पढ़ा रही थी, आज उसी स्कूल की दीवारों से जवाब मांग रही है। लेकिन सिस्टम चुप रहा। और इसी चुप्पी ने मनीषा कुमारी को अवसाद की गहराइयों में धकेल दिया।परिजनों के अनुसार, न्याय न मिलने की टीस ने उसे भीतर से तोड़ दिया था। वह अक्सर कहती थी अगर मेरे बेटे के लिए भी इंसाफ नहीं है, तो इस दुनिया में मेरे लिए क्या बचा है?

अंततः टूट गई हिम्मत: न्याय की सारी राहें बंद देखकर, मनीषा कुमारी ने अपने मायके भटियारी सराय में अत्यंत पीड़ादायक कदम उठा लिया। परिजन उन्हें गंभीर अवस्था में डीएमसीएच लेकर पहुंचे। डॉक्टरों ने भरसक प्रयास किया, लेकिन यह लड़ाई अब चिकित्सा से आगे निकल चुकी थी। इलाज के दौरान मनीषा कुमारी की मौत हो गई। एक माँ, जो न्याय के भरोसे जी रही थी, न्याय के अभाव में मर गई।

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अगर समय पर न्याय मिलता, मेरी बहन ज़िंदा होती: मृतका के भाई शिवशंकर कुमार साह का आरोप सीधा और दर्दनाक है अगर प्रशासन समय रहते कश्यप की मौत की निष्पक्ष जांच करता, अगर दोषियों पर कार्रवाई होती, तो मेरी बहन आज ज़िंदा होती। इलाके में शोक के साथ-साथ आक्रोश भी है। लोग कह रहे हैं यह सिर्फ़ आत्महत्या नहीं, यह सिस्टम की हत्या है। राजद नेता व समाजसेवी उमेश सहनी ने इस घटना को पूरी व्यवस्था की विफलता करार दिया है। उन्होंने कहा कि मनीषा कुमारी महीनों तक न्याय की गुहार लगाती रहीं, लेकिन सिस्टम ने उनकी आवाज़ नहीं सुनी।

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मिथिला जन जन की आवाज का सवाल: मिथिला जन जन की आवाज आज यह सवाल दोहराती है क्या एक बच्चे की संदिग्ध मौत इतनी सस्ती थी? क्या एक माँ का संघर्ष इतना बेकार था? क्या न्याय सिर्फ़ ताक़तवरों के लिए बचा है? कश्यप की मौत की फ़ाइल अब भी अधूरी है, और उसकी माँ की ज़िंदगी भी। आज भटियारी सराय के उस घर में सन्नाटा है, जहाँ कभी कश्यप की किताबें थीं, और मनीषा कुमारी के सपने। एक बच्चा पहले मरा, अब उसकी माँ चली गई। अब यह सिर्फ़ एक खबर नहीं रही। यह न्याय व्यवस्था पर लिखा गया सबसे करुण आरोप-पत्र है। मिथिला जन जन की आवाज इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नज़र बनाए रखे हुए है। क्योंकि अब सवाल सिर्फ़ कश्यप या मनीषा का नहीं यह सवाल है कि क्या न्याय में देरी, अब सीधे मौत की वजह बन चुकी है?
