दिल्ली मोड़ की उस संध्या में, जहाँ रोशनी केवल मंच की सजावट तक सीमित नहीं रही बल्कि नन्हे कदमों की ताल, अनुशासन की दृढ़ता और सपनों की चमक में भविष्य की स्पष्ट आहट सुनाई दी.....जहाँ एक सादे शब्द ने तालियों के शोर के बीच सफलता का असली सूत्र फुसफुसाया… और जिसे समझने के लिए इस पूरी सम्पूर्ण वृत्तांत को अंत तक पढ़ना अनिवार्य हो जाता है।
दिल्ली मोड़ के समीप स्थित दरभंगा पब्लिक स्कूल का प्रांगण 14 फरवरी की संध्या केवल रोशनी और रंगों से ही आलोकित नहीं था, बल्कि वह आत्मविश्वास, संस्कार और अनुशासन की उस अदृश्य ऊर्जा से भरा हुआ था, जिसे शब्दों में बाँधना सरल नहीं। दो दिवसीय वार्षिकोत्सव के दूसरे दिन नर्सरी से कक्षा पाँच तक के नन्हे विद्यार्थियों ने मंच पर केवल प्रस्तुतियाँ नहीं दीं.....उन्होंने अपने भीतर पल रहे भविष्य का सार्वजनिक उद्घोष किया. पढ़े पूरी खबर......
दरभंगा। दिल्ली मोड़ के समीप स्थित दरभंगा पब्लिक स्कूल का प्रांगण 14 फरवरी की संध्या केवल रोशनी और रंगों से ही आलोकित नहीं था, बल्कि वह आत्मविश्वास, संस्कार और अनुशासन की उस अदृश्य ऊर्जा से भरा हुआ था, जिसे शब्दों में बाँधना सरल नहीं। दो दिवसीय वार्षिकोत्सव के दूसरे दिन नर्सरी से कक्षा पाँच तक के नन्हे विद्यार्थियों ने मंच पर केवल प्रस्तुतियाँ नहीं दीं.....उन्होंने अपने भीतर पल रहे भविष्य का सार्वजनिक उद्घोष किया।

मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित दरभंगा के एसएसपी जगुनाथ रेड्डी ने अपने संबोधन में जिस बात पर सबसे अधिक बल दिया, वह थी.....अनुशासन। उनका स्वर दृढ़ था, किंतु संवेदनशील भी। उन्होंने कहा कि प्रेरणा क्षणिक है, वह हवा के झोंके की तरह आती-जाती रहती है, पर अनुशासन वह नींव है, जिस पर सफलता की इमारत स्थायी रूप से खड़ी होती है। उन्होंने बच्चों को समझाया कि जीवन की ऊँचाइयाँ केवल सपनों से नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास और आत्मनियंत्रण से प्राप्त होती हैं। अभिभावकों से भी उन्होंने आग्रह किया कि वे बच्चों के जीवन में मार्गदर्शक बनें, केवल दर्शक नहीं।

विद्यालय के प्राचार्य डॉ. एम. के. मिश्रा ने अपने वक्तव्य में कहा कि वार्षिकोत्सव मनोरंजन का आयोजन मात्र नहीं, बल्कि वह मंच है जहाँ बच्चों की छिपी प्रतिभाएँ पहली बार खुले आकाश में साँस लेती हैं। विद्यालय प्रबंधन की ओर से डॉ. विशाल गौरव ने विस्तृत वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए विद्यालय की शैक्षणिक उपलब्धियों, नवाचारों और सांस्कृतिक सक्रियताओं का उल्लेख किया। उनका प्रस्तुतीकरण संतुलित और तथ्यपरक था....जिसमें उपलब्धियों के साथ भविष्य की योजनाओं का भी स्पष्ट खाका दिखाई दिया। कार्यक्रम का प्रारंभ स्वागत गीत से हुआ, जिसने वातावरण को मंगलमय बना दिया। ओडिशी नृत्य की मनोहारी प्रस्तुति ने भारतीय शास्त्रीय परंपरा की गरिमा को मंच पर साकार किया। कक्षा चार-बी के विद्यार्थियों ने ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को समर्पित श्रद्धांजलि देकर दर्शकों को भावविभोर कर दिया।

यूकेजी के बच्चों का.....हम तो ऐसे हैं भैया.....नृत्य हो या नर्सरी का “बूम बूम”.....हर प्रस्तुति में बालसुलभ निष्कपटता के साथ अभ्यास की स्पष्ट झलक थी। एलकेजी के विद्यार्थियों द्वारा “पापा कहते हैं” और “ऑल इज़ वेल” पर आधारित नृत्य ने सभागार में मुस्कान बिखेर दी। कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि प्रस्तुतियाँ केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं थीं। सामाजिक सरोकारों पर आधारित नाट्य और नृत्य-नाटिकाओं ने बच्चों की सजग सोच को दर्शाया। प्रदूषण, वृक्ष संरक्षण, सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव, स्वच्छ भारत, बाल श्रम, स्वस्थ भोजन....इन विषयों पर आधारित प्रस्तुतियों ने यह स्पष्ट किया कि विद्यालय शिक्षा को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रखता।

आजादी कब मिलेगी जैसी प्रस्तुति ने दर्शकों को आत्ममंथन के लिए विवश किया, तो “मैं भी खास हूँ” नृत्य-नाटक ने समावेशिता का संदेश दिया। “पिलर्स ऑफ ए हैप्पी चाइल्ड” स्किट ने एक आदर्श बाल जीवन के मूल स्तंभों को रेखांकित किया, जबकि “ए डे इन 2050” नाटक ने भविष्य की कल्पना को मंच पर जीवंत कर दिया। छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य, “भारतीय किसान” और “कठपुतली” जैसी प्रस्तुतियों में भारत की सांस्कृतिक विविधता का सुंदर चित्र उपस्थित हुआ। कक्षा तीन-ए की कव्वाली ने कार्यक्रम में सूफियाना रंग भरा, और “शिक्षा जागरण गीत” ने शिक्षा के महत्व को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

दरभंगा सिविल सोसाइटी के अध्यक्ष अनिल सिंह, सचिव अमरनाथ सिंह सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और बढ़ाया।कार्यक्रम की मुख्य संयोजिका डॉ. डिंपल सरस्वत ने कहा कि सफलता कभी अकेले नहीं लिखी जाती.....उसके पीछे एक मजबूत सोच और समर्पित नेतृत्व होता है। अंत में प्राथमिक कक्षा संयोजक जे. शजी ने सभी अभिभावकों और शिक्षकगण के सहयोग के प्रति आभार व्यक्त किया। इस पूरे आयोजन में एक बात स्पष्ट दिखाई दी.....यह केवल सांस्कृतिक उत्सव नहीं था, बल्कि अनुशासन, संस्कार और सृजनात्मकता का सामूहिक उत्सव था। मंच पर नन्हे कदम थे, पर उनमें भविष्य की दृढ़ चाल दिखाई दे रही थी। दरभंगा की शैक्षणिक धरती पर यह आयोजन एक संदेश छोड़ गया.....सफलता का शॉर्टकट नहीं होता; वह निरंतर अभ्यास, अनुशासन और सामूहिक प्रयास का परिणाम होती है। और शायद इसी कारण 14 फरवरी की यह शाम केवल एक तारीख बनकर नहीं रह गई.....वह एक विचार बनकर उभरी, जिसे याद रखा जाएगा।
