दरभंगा में खौफनाक हकीकत: रामबाग अपराधियों का गढ़, पुलिस नदारद—क्या SSP साहब की साख पर लगेगा दाग?
रामबाग मोहल्ला आज अपराध की काली स्याही से लिखे एक भयावह महाकाव्य का मंच बन चुका है। विश्वविद्यालय थाना क्षेत्र की यह पावन धरती अब अपराधियों का स्वर्ग बन गई है, जहाँ दिन के उजाले में भी भय की परछाइयाँ मँडराती हैं और रात का आलम ऐसा कि हर साँस के साथ खौफ का एक नया अध्याय शुरू होता है। प्रश्न यह नहीं कि अपराधी बेखौफ क्यों हैं, बल्कि यह है कि SSP जगुनाथ रेड्डी जैसे निष्ठावान योद्धा के नेतृत्व में भी पुलिस की कार्यशैली इतनी लचर और आत्ममुग्ध क्यों है. पढ़े पुरी खबर.........

दरभंगा:- रामबाग मोहल्ला आज अपराध की काली स्याही से लिखे एक भयावह महाकाव्य का मंच बन चुका है। विश्वविद्यालय थाना क्षेत्र की यह पावन धरती अब अपराधियों का स्वर्ग बन गई है, जहाँ दिन के उजाले में भी भय की परछाइयाँ मँडराती हैं और रात का आलम ऐसा कि हर साँस के साथ खौफ का एक नया अध्याय शुरू होता है। प्रश्न यह नहीं कि अपराधी बेखौफ क्यों हैं, बल्कि यह है कि SSP जगुनाथ रेड्डी जैसे निष्ठावान योद्धा के नेतृत्व में भी पुलिस की कार्यशैली इतनी लचर और आत्ममुग्ध क्यों है? रामबाग की संकरी गलियों में पुलिस की पदचाप गूँजने के बजाय, थानों के प्रहरी और लेखापाल सुस्ती की नींद सोते दिखते हैं। क्या उन्हें रात्रि गश्ती का काव्य तक नहीं सिखाया गया, या फिर ऊँचे आसनों से फरमान जारी करने में ही सारा जोर खर्च हो जाता है?
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यह कोई साधारण शिकायत नहीं, बल्कि एक करुण क्रंदन है जो रामबाग के हर आँगन से फूट रहा है। 13 अक्टूबर 2021 को कांकली मंदिर के पुजारी राजीव कुमार झा उर्फ अंटू की गोली से छलनी देह ने इस मिट्टी को रक्त से तर किया था। रामबाग स्थित कामेश्वर सिंह धार्मिक न्यास ट्रस्ट के कार्यालय में 14 नवंबर को एक शख्स ने अंधाधुंध फायरिंग कर दहशत मचा दी। स्थानीय लोगों ने जान जोखिम में डालकर हथियार से लैस अधेड़ हमलावर को पकड़ लिया, फिर उसकी जमकर पिटाई की गई। इस कथा को और भयग्रस्त बना दिया। कई लोग घायल हुए, पर पुलिस की छाया तो दूर, उसकी हनक तक नजर नहीं आई। सूत्र बताते हैं कि घटना के बाद घंटों तक पुलिस मौके पर पहुँचने की जहमत नहीं उठाती, और जब पहुँचती है तो औपचारिकताओं का ढोंग रचकर चुपचाप लौट आती है। दिन हो या रात का सन्नाटा, अपराधी यहाँ बेखौफ अपने क्रूर नृत्य को अंजाम देते हैं और आसानी से अदृश्य हो जाते हैं। इसका रहस्य पुलिस की नाकामी में छिपा है—रामबाग में न दिन का पहरा है, न रात की चौकसी। थानों में कागजी शेर बैठे हैं, जो गश्ती की बात तो दूर, अपराधियों के नाम तक सुनने को तैयार नहीं।
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शाम ढलते ही नारियाँ घर की चारदीवारी में कैद हो जाती हैं, बालक भय से थर-थर काँपते हैं, और हर प्राणी की जबान पर एक ही पुकार गूँजती है—कानून के रखवाले कहाँ मर गए? पुलिस की यह लापरवाही अब हास्यास्पद नहीं, बल्कि खतरनाक हो चली है। गश्ती के नाम पर कभी-कभार जीप की सैर होती है, वो भी तब जब कोई बड़ी घटना सुर्खियाँ बटोर ले। स्थानीय लोग बताते हैं कि थाना प्रभारी से शिकायत करने पर उल्टा उन्हें ही धमकियाँ मिलती हैं, और अपराध के आँकड़े दबाने की जुगत में पुलिस अपनी ही पीठ थपथपाती है।
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SSP जगुनाथ रेड्डी का नाम अपराधियों के हृदय में भय का संनाद पैदा करता है, मगर उनके अधीनस्थों की यह शिथिलता और कायराना रवैया अब उनकी कीर्ति पर कालिख पोत रहा है। यदि रामबाग जैसे संवेदनशील क्षेत्र में रात्रि की चौकसी भी एक स्वप्न बनी रहेगी, तो जनमानस किसके भरोसे जीएगा? लोगों का क्रोध उफान पर है—वे चीत्कार करते हैं, "यदि पुलिस अब भी कुंभकर्णी नींद में रही, तो यह मोहल्ला अपराध का अखाड़ा बन जाएगा।"
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अब समय है कि SSP साहब इस रक्तरंजित कथा पर पैनी नजर डालें और तत्काल कठोर कदम उठाएँ। रामबाग में रात्रि गश्ती का शंखनाद हो, थाना प्रभारी अपनी जवाबदेही के बंधन में बँधें, और पुलिस की सुस्त कार्यशैली पर लगाम कसी जाए—वरना दरभंगा की शांतिपूर्ण गाथा पर अमिट कलंक लग जाएगा। पुलिस जागे, नहीं तो जनाक्रोश की ज्वाला सड़कों पर भड़केगी।