13 साल की नौकरी या फिर कथित भ्रष्टाचार का भयावह साम्राज्य? आखिर कैसे बन बैठे बीडीओ साहब ‘धनकुबेर अधिकारी’? EOU की नौ घंटे की छापेमारी में खुलते गए बैंक खातों, बेनामी जमीनों, मार्केटिंग कॉम्प्लेक्स, स्वर्णाभूषणों और वैभव के चौंकाने वाले राज! कभी सरकारी लकड़ी दुरुपयोग का आरोप, तो कभी अकूत संपत्ति का फैलता जाल! पढ़िए ‘मिथिला जन जन की आवाज’ की सबसे विस्फोटक और रोंगटे खड़े कर देने वाली विशेष रिपोर्ट। जानिए भ्रष्ट बीडीओ साहब का कथित कारनामा, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र में मचा दिया सन्नाटा…
दरभंगा जिले के केवटी प्रखंड में बुधवार की सुबह केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं थी। वह सुबह बिहार की नौकरशाही के उस भयावह चेहरे पर पड़ा जोरदार तमाचा थी, जिसकी चर्चा अक्सर सरकारी गलियारों में फुसफुसाहट बनकर रह जाती है, लेकिन दस्तावेजों तक पहुँचते-पहुँचते अचानक सन्नाटा ओढ़ लेती है। आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की टीम जब केवटी प्रखंड के बीडीओ चंद्रमोहन पासवान के छह से अधिक ठिकानों पर एक साथ धावा बोल रही थी, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि नौ घंटे तक चली इस छापेमारी में कथित वैभव, अकूत संपत्ति, बैंक खातों, एलआईसी पॉलिसियों, जमीनों, गाड़ियों और बेनामी रिश्तों का ऐसा जाल सामने आएगा, जो पूरे प्रशासनिक ढांचे को सवालों के कठघरे में खड़ा कर देगा. पढ़े पूरी रिपोर्ट.....
दरभंगा जिले के केवटी प्रखंड में बुधवार की सुबह केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं थी। वह सुबह बिहार की नौकरशाही के उस भयावह चेहरे पर पड़ा जोरदार तमाचा थी, जिसकी चर्चा अक्सर सरकारी गलियारों में फुसफुसाहट बनकर रह जाती है, लेकिन दस्तावेजों तक पहुँचते-पहुँचते अचानक सन्नाटा ओढ़ लेती है। आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की टीम जब केवटी प्रखंड के बीडीओ चंद्रमोहन पासवान के छह से अधिक ठिकानों पर एक साथ धावा बोल रही थी, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि नौ घंटे तक चली इस छापेमारी में कथित वैभव, अकूत संपत्ति, बैंक खातों, एलआईसी पॉलिसियों, जमीनों, गाड़ियों और बेनामी रिश्तों का ऐसा जाल सामने आएगा, जो पूरे प्रशासनिक ढांचे को सवालों के कठघरे में खड़ा कर देगा।

दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी और समस्तीपुर तक फैली इस कार्रवाई ने केवल एक अधिकारी की संपत्ति पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर भी गहरा कटाक्ष बनकर उभरी है, जहाँ विकास योजनाओं के नाम पर जनता उम्मीदें बोती है और दूसरी ओर कथित तौर पर कुछ लोग वैभव का साम्राज्य खड़ा करते चले जाते हैं। सवाल केवल इतना नहीं है कि बीडीओ साहब के पास कितना धन मिला। सवाल यह है कि आखिर 2013 में नौकरी जॉइन करने वाला एक अधिकारी केवल 13 वर्षों में कथित तौर पर इतना बड़ा आर्थिक साम्राज्य कैसे खड़ा कर लेता है कि आर्थिक अपराध इकाई को एक साथ कई जिलों में छापेमारी करनी पड़ जाए?

नौ घंटे की छापेमारी और खुलते गए रहस्य: बुधवार की सुबह जब आर्थिक अपराध इकाई की टीम केवटी प्रखंड मुख्यालय परिसर के पीछे स्थित सरकारी आवास पहुँची, तब वहाँ सामान्य दिन जैसा माहौल नहीं था। कुछ ही देर में सरकारी आवास के बाहर पुलिस बल की भारी तैनाती कर दी गई। स्थानीय लोग दूर खड़े होकर देखते रहे कि कैसे जांच अधिकारी फाइलों, अलमारियों, दस्तावेजों और डिजिटल अभिलेखों की छानबीन में जुटे हुए हैं। लेकिन कहानी केवल सरकारी आवास तक सीमित नहीं थी। बहादुरपुर थाना क्षेत्र स्थित निजी मकान, मधुबनी जिले के बाबूबरही स्थित पैतृक घर, सीतामढ़ी स्थित ससुराल, खजौली स्टेशन अधीक्षक और बड़े भाई विश्वमोहन पासवान के ठिकाने, बौंसी गांव और पूर्वी बाजार स्थित जीटी मेमोरियल हेल्थ केयर तक जांच का दायरा फैल चुका था। नौ घंटे तक चली इस कार्रवाई में जो तथ्य सामने आए, उसने पूरे प्रशासनिक ढांचे को झकझोर दिया। जांच में बीडीओ, उनकी पत्नी और बच्चों के नाम से संचालित 10 बैंक खातों की जानकारी सामने आई। आर्थिक अपराध इकाई ने इन खातों को फ्रीज कर दिया। खातों में जमा लाखों रुपये की जांच शुरू हुई। सवाल उठने लगा कि आखिर यह आर्थिक प्रवाह किस स्रोत से आया?

13 साल की नौकरी और कथित वैभव का विस्तार: ग्रामीण विकास विभाग में वर्ष 2013 में नौकरी जॉइन करने वाले चंद्रमोहन पासवान पर आरोप है कि उन्होंने अपनी ज्ञात आय से लगभग 82 प्रतिशत अधिक संपत्ति अर्जित की। प्रारंभिक जांच में करीब 89 लाख 13 हजार 500 रुपये की आय से अधिक संपत्ति का मामला सामने आया। अब जनता पूछ रही है कि आखिर सरकारी वेतन और सीमित प्रशासनिक आय के बीच ऐसा कौन-सा चमत्कार हुआ कि बहादुरपुर में दो मंजिला मकान और मार्केटिंग कॉम्प्लेक्स खड़ा हो गया? बाबूबरही में आवासीय मकान और कॉम्प्लेक्स तैयार हो गए? लाखों रुपये के बैंक खाते संचालित होने लगे? एलआईसी की कई पॉलिसियाँ खरीदी जाने लगीं? गाड़ियों के दस्तावेज सामने आने लगे? और स्वर्णाभूषणों की खरीद से जुड़े अभिलेख तक जांच एजेंसियों के हाथ लग गए? आर्थिक अपराध इकाई की जांच ने यही सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा किया है..... क्या यह केवल मेहनत और बचत का परिणाम था, या फिर कथित तौर पर सरकारी कुर्सी के पीछे कोई ऐसा आर्थिक अंधेरा पल रहा था, जिसकी परतें अब खुलनी शुरू हुई हैं?

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आठ एलआईसी पॉलिसियाँ और बढ़ती शंकाएँ: जांच में आठ एलआईसी पॉलिसियों के दस्तावेज मिले हैं, जिनका सालाना प्रीमियम लगभग दो लाख रुपये बताया जा रहा है। यह खुलासा सामने आने के बाद स्थानीय लोगों के बीच चर्चाओं का दौर और तेज हो गया। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर एक सरकारी अधिकारी की वैध आय के बीच इतना बड़ा वित्तीय विस्तार कैसे संभव हुआ? क्या यह सामान्य निवेश था, या फिर किसी बड़े आर्थिक नेटवर्क की झलक? जांच एजेंसियाँ अब बैंकिंग लेन-देन, प्रीमियम भुगतान और संपत्ति निवेश के स्रोतों की पड़ताल कर रही हैं। यही वह बिंदु है, जहाँ यह मामला केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं रह जाता, बल्कि आर्थिक अपराध की गंभीर जांच का रूप ले लेता है।

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पत्नी, भाई, मां और रिश्तों के बीच फैला कथित संपत्ति-जाल: EOU की जांच में सबसे गंभीर आरोपों में से एक यह भी सामने आया कि कथित संपत्तियों का विस्तार परिवार और रिश्तेदारों के नाम पर किया गया। जांच एजेंसी के अनुसार, मां और भाई के नाम पर संपत्ति अर्जित कर उन्हें आश्रित सूची से बाहर रखा गया। पत्नी के नाम पर बहादुरपुर में संपत्ति होने की बात कही जा रही है। बाबूबरही में भाई के नाम पर जमीन का जिक्र सामने आया। पत्नी की जमीन पर साले के नाम से जीटी मार्ट संचालित होने की बात भी जांच के दायरे में है। इतना ही नहीं, बाबूबरही में जीटी हेल्थ मेमोरियल अस्पताल के संचालन और दरभंगा एयरपोर्ट व एम्स क्षेत्र के आसपास जमीन खरीद के आरोपों ने मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।जनता अब पूछ रही है कि आखिर एक बीडीओ साहब के इर्द-गिर्द इतने आर्थिक संबंध और संपत्तियों का जाल कैसे फैलता चला गया?

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बोलेरो, स्विफ्ट डिजायर और कथित वैभव की तस्वीर: जांच एजेंसियों को बोलेरो और स्विफ्ट डिजायर कार के दस्तावेज भी मिले हैं। गाड़ियों का मिलना केवल वाहन स्वामित्व का मामला नहीं है। यह उस जीवनशैली की तस्वीर भी पेश करता है, जिसे अब जांच एजेंसियाँ आय और संपत्ति के अनुपात में परख रही हैं। जब ग्रामीण इलाकों में लोग सरकारी योजनाओं के भुगतान के लिए महीनों कार्यालयों के चक्कर लगाते हैं, तब ऐसी खबरें जनता के भीतर गहरा आक्रोश पैदा करती हैं।चंद्रमोहन पासवान का नाम इससे पहले भी विवादों में आ चुका है। उन पर सरकारी राशि की कथित गलत निकासी और प्रखंड कार्यालय में लगे कीमती पेड़ों की लकड़ी कटवाकर पलंग और घरेलू सामान बनवाने जैसे आरोप लगे थे। अब जब आर्थिक अपराध इकाई की कार्रवाई सामने आई है, तो पुराने आरोप भी फिर चर्चा में आ गए हैं। लोग कह रहे हैं कि यदि शुरुआती शिकायतों पर कठोर कार्रवाई होती, तो शायद आज यह स्थिति नहीं बनती। हालांकि कानून का सिद्धांत स्पष्ट है कि अदालत में दोष सिद्ध होने तक किसी को दोषी नहीं माना जा सकता। लेकिन यह भी सच है कि इतने गंभीर आरोपों ने जनता के मन में गहरा अविश्वास पैदा कर दिया है।

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इस पूरे मामले की शुरुआत चार महीने पहले हुई शिकायत से जुड़ी बताई जा रही है। इकबाल अंसारी नामक व्यक्ति ने आर्थिक अपराध इकाई में कथित अकूत संपत्ति को लेकर दस्तावेजों और सबूतों के साथ शिकायत दर्ज कराई थी।प्रारंभिक जांच के बाद आर्थिक अपराध इकाई ने कांड संख्या 9/26 दर्ज किया और फिर व्यापक जांच शुरू हुई। यहाँ सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर शिकायत में ऐसा क्या था जिसने आर्थिक अपराध इकाई को इतने बड़े स्तर पर कार्रवाई करने के लिए मजबूर कर दिया? जांच में यह भी आरोप सामने आया है कि आवेदन और सेवा पुस्तिका में पहचान संबंधी दस्तावेजों में हेराफेरी की गई। बेनामी संपत्ति खरीदने के लिए पहचान छिपाने के आरोपों ने मामले को और अधिक गंभीर बना दिया है। यदि जांच में ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल आय से अधिक संपत्ति का मामला नहीं रहेगा, बल्कि प्रशासनिक दस्तावेजों और सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा। केवटी, बहादुरपुर और बाबूबरही में इस कार्रवाई के बाद लोगों के बीच गुस्सा साफ दिखाई दे रहा है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर विकास योजनाओं के नाम पर सरकारी धन कहाँ जा रहा था?

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कई ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें आज भी छोटी-छोटी योजनाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है, जबकि दूसरी ओर कथित तौर पर कुछ अधिकारी संपत्ति के साम्राज्य खड़े कर रहे हैं। वहीं प्रशासनिक गलियारों में सन्नाटा पसरा हुआ है। कई अधिकारी इस मामले पर खुलकर बोलने से बच रहे हैं। आर्थिक अपराध इकाई की कार्रवाई को कई लोग केवल शुरुआती चरण मान रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, अभी बैंक खातों, निवेशों, संपत्तियों और रिश्तेदारों के आर्थिक नेटवर्क की गहन जांच जारी है। यदि जांच में और तथ्य सामने आते हैं, तो आने वाले दिनों में यह मामला और अधिक विस्फोटक हो सकता है। फिलहाल इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है..... आखिर एक बीडीओ साहब इतने कम समय में कथित तौर पर धनकुबेर कैसे बन गए? क्या यह केवल वैध निवेशों की कहानी है? या फिर सरकारी कुर्सी के पीछे ऐसा आर्थिक अंधेरा पल रहा था, जिसकी परतें अब आर्थिक अपराध इकाई खोल रही है? नौ घंटे की छापेमारी ने बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था को आईना दिखा दिया है। अब जनता इंतजार कर रही है उस अंतिम सच का, जो यह बताएगा कि आखिर विकास की कुर्सी पर बैठा यह अधिकारी कथित तौर पर संपत्ति के इतने विशाल जाल तक पहुँचा कैसे। और यही सवाल आज पूरे बिहार में गूंज रहा है। क्या बीडीओ साहब, यह केवल नौकरी थी या फिर कथित दौलत का कोई अंधकारमय साम्राज्य?
