फेकला थाने में वर्दी की बेइज्जती और जाति का अपमान: जब कानून के रखवाले ही बन बैठे अत्याचार के प्रतीक
एक वर्दीधारी का स्वाभिमान सिर्फ उसकी वर्दी तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें छिपा होता है उसका आत्मबल, उसकी निष्ठा और उसका मानवीय अस्तित्व। पर जब यही वर्दी किसी के जातीय अभिमान के नीचे कुचल दी जाए, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का अपमान नहीं होता, यह पूरी व्यवस्था के मौन स्वीकृति की चुप्पी बन जाता है. पढ़े पुरी खबर.......

दरभंगा, बिहार: एक वर्दीधारी का स्वाभिमान सिर्फ उसकी वर्दी तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें छिपा होता है उसका आत्मबल, उसकी निष्ठा और उसका मानवीय अस्तित्व। पर जब यही वर्दी किसी के जातीय अभिमान के नीचे कुचल दी जाए, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का अपमान नहीं होता, यह पूरी व्यवस्था के मौन स्वीकृति की चुप्पी बन जाता है।
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ऐसा ही एक घटना दरभंगा जिले के फेकला थाना में घटित हुई, जहाँ पदस्थापित चालक सिपाही संख्या 82 देव कुमार पासवान, जिन्होंने अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुए थाने की सेवा में खुद को समर्पित कर रखा था, उन्हें न सिर्फ अपमानित किया गया, बल्कि जातिसूचक गालियों से उनकी अस्मिता को भी रौंदा गया।
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देव कुमार ने अपनी शिकायत में बताया कि दिनांक 31 मार्च की रात लगभग 9:30 बजे, जब वह थाने के क्षेत्र का भ्रमण कर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए वापस लौटे, तो उनके साथ सब-इंस्पेक्टर भोला प्रसाद और सहकर्मी सहस्त्र बाल भी थे। उसी रात, थाने का चौकीदार गनौर पासवान उन्हें जगाने आया, पहले भोला प्रसाद को, फिर उन्हें। देव कुमार ने चौकीदार से कहा, "तैयार होकर आ रहे हैं।" तभी थानाध्यक्ष मोती कुमार का फोन आया—"कहाँ हो?" जवाब मिला—"ऊपर कमरे में हूँ, तैयार होकर आ रहा हूँ।" दोबारा फोन आया—"कितना देर कर रहा है? जल्दी नीचे आ।"
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देव कुमार जैसे ही अपनी वर्दी पहनकर सीढ़ियाँ उतर रहे थे, शायद उन्हें अंदाजा नहीं था कि नीचे सिर्फ एक अफसर नहीं, एक ऐसा व्यक्ति खड़ा है जो उसकी वर्दी से पहले उसकी जाति को देखेगा। जैसे ही वह नीचे पहुंचे, थानाध्यक्ष ने गालियाँ देनी शुरू कर दीं। जब देव कुमार ने इसका विरोध किया, तो थानाध्यक्ष ने उन्हें थप्पड़ मार दिया और बेहद ही अपमानजनक जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया।
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देव कुमार ने यह साफ तौर पर कहा कि वह दुसाध जाति से आते हैं और यही वजह रही कि थानाध्यक्ष ने उनके साथ ऐसा व्यवहार किया। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम की लिखित शिकायत दरभंगा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP), पुलिस उप महानिरीक्षक (DIG), और बिहार पुलिस मेंस एसोसिएशन को दी है। अब वह न्याय की आस लिए अपनी वर्दी से बंधे कर्तव्यों और अपने आत्मसम्मान के बीच झूल रहे हैं।
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थानाध्यक्ष का पक्ष – सच्चाई या बहाना? थानाध्यक्ष मोती कुमार ने अपने बचाव में कहा कि उसी रात एक ट्रक एक घर में घुस गया था और तत्काल घटनास्थल पर जाना जरूरी था। उन्होंने दावा किया कि कई बार बुलाने के बावजूद चालक नीचे नहीं आया, और जब आया भी तो चाभी फेंक दी और कह दिया – “मैं नहीं जाऊंगा।” उन्होंने यह भी कहा कि उनके साथ अन्य पुलिसकर्मी भी थे और उन्होंने किसी को न मारा, न गाली दी।
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सवाल अब सिर्फ एक है: क्या वर्दी पहनने वाला एक दलित कभी सम्मान की उम्मीद कर सकता है?
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अगर एक वर्दीधारी, जो संविधान और कानून की शपथ लेकर सेवा में लगा है, उसे उसकी जाति के कारण थप्पड़ खाकर, गालियाँ सुनकर, अपमानित होकर जीना पड़े—तो सोचिए उस व्यवस्था की जड़ें कितनी सड़ी हुई होंगी?
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क्या बिहार पुलिस में जातिवाद अब भी चुपके से जहर की तरह बह रहा है? क्या थानाध्यक्ष जैसे अधिकारी अपनी कुर्सी को निजी अहंकार और जातीय श्रेष्ठता का औजार समझने लगे हैं? क्या यह वही पुलिस है, जो संविधान के तहत 'सबके लिए समान न्याय' की बात करती है?
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अब ज़रूरत है, इस घटना को महज़ एक ‘शिकायत’ न समझा जाए, बल्कि इसे विवेक और व्यवस्था के बीच संघर्ष का प्रतीक माना जाए। यह मामला सिर्फ देव कुमार पासवान का नहीं है, यह उस हर उस सिपाही का है, जो जाति की दीवारों से ऊपर उठकर अपने फर्ज को निभाना चाहता है।
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अब समय है – जवाबदेही का, कार्रवाई का और चेतावनी का। वरना एक दिन ये वर्दियाँ खुद अपने अधिकारों के लिए सवाल उठाने लगेंगी, और तब व्यवस्था का मौन टूटेगा – गूंज बनकर।