क्या सच की आखिरी परत खुलने से पहले बदल दी गई कुर्सी? भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में आरोपी डीएसपी की पोस्टिंग पर अपनी ही सरकार को मंत्री मदन सहनी की दो टूक, बोले... जांच पूरी होने तक संबंधित अधिकारी को मुख्यालय में ही रखा जाना चाहिए था, ऐसे फैसले जनता के बीच गलत संदेश देते हैं।

कभी-कभी लोकतंत्र के गलियारों में कोई एक प्रशासनिक आदेश केवल एक सरकारी कागज नहीं होता, बल्कि वह हजारों सवालों, अनगिनत आशंकाओं और न्याय की प्रतीक्षा कर रही आंखों के बीच उठी एक ऐसी हलचल बन जाता है, जिसकी प्रतिध्वनि सत्ता के गलियारों से निकलकर सीधे आम जनता के मन तक पहुंचती है। बिहार के चर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में कुछ ऐसा ही हुआ है. पढ़े पूरी खबर.....

क्या सच की आखिरी परत खुलने से पहले बदल दी गई कुर्सी? भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में आरोपी डीएसपी की पोस्टिंग पर अपनी ही सरकार को मंत्री मदन सहनी की दो टूक, बोले... जांच पूरी होने तक संबंधित अधिकारी को मुख्यालय में ही रखा जाना चाहिए था, ऐसे फैसले जनता के बीच गलत संदेश देते हैं।
क्या सच की आखिरी परत खुलने से पहले बदल दी गई कुर्सी? भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में आरोपी डीएसपी की पोस्टिंग पर अपनी ही सरकार को मंत्री मदन सहनी की दो टूक, बोले... जांच पूरी होने तक संबंधित अधिकारी को मुख्यालय में ही रखा जाना चाहिए था, ऐसे फैसले जनता के बीच गलत संदेश देते हैं।

विशेष रिपोर्ट: मिथिला जन जन की आवाज। दरभंगा- कभी-कभी लोकतंत्र के गलियारों में कोई एक प्रशासनिक आदेश केवल एक सरकारी कागज नहीं होता, बल्कि वह हजारों सवालों, अनगिनत आशंकाओं और न्याय की प्रतीक्षा कर रही आंखों के बीच उठी एक ऐसी हलचल बन जाता है, जिसकी प्रतिध्वनि सत्ता के गलियारों से निकलकर सीधे आम जनता के मन तक पहुंचती है। बिहार के चर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में कुछ ऐसा ही हुआ है।

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जिस मामले ने कभी पूरे बिहार को झकझोर दिया था... जिस घटना के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली, कानून के शासन और मानवाधिकारों को लेकर तीखी बहस छिड़ गई थी... जिस प्रकरण में स्वयं राज्य सरकार ने संबंधित पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध हत्या का मुकदमा दर्ज कराया और न्यायिक जांच के लिए आयोग गठित किया... उसी मामले के आरोपी डीएसपी राजेश कुमार शर्मा की मद्य निषेध एवं उत्पाद विभाग में पोस्टिंग ने अब सत्ता के भीतर भी असहजता पैदा कर दी है।सबसे बड़ी बात यह है कि इस बार सवाल विपक्ष ने नहीं, बल्कि सरकार के अपने मंत्री मदन सहनी ने उठाए हैं।

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एक आदेश... और उठ खड़े हुए अनगिनत प्रश्न: सरकारी तबादले सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया माने जाते हैं। लेकिन जब किसी ऐसे अधिकारी की नई तैनाती की जाए जिसके विरुद्ध स्वयं सरकार ने हत्या जैसे गंभीर आरोपों में प्राथमिकी दर्ज कराई हो और जिसकी भूमिका की जांच अभी जारी हो, तब यह निर्णय केवल "तबादला" नहीं रह जाता। यहीं से प्रश्नों का वह सिलसिला शुरू होता है, जो केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि नैतिक और सामाजिक भी बन जाता है। क्या जांच पूरी होने से पहले ऐसी पोस्टिंग उचित थी? क्या इससे जनता के मन में न्याय प्रक्रिया को लेकर संदेह पैदा हो सकता है। क्या इससे पीड़ित परिवार के जख्म और गहरे नहीं होंगे. इन्हीं सवालों के बीच मंत्री मदन सहनी की प्रतिक्रिया ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया।

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यह जख्मों को कुरेदने जैसा है... मंत्री की पीड़ा: मदन सहनी ने अपनी प्रतिक्रिया में कोई राजनीतिक नारा नहीं दिया। उन्होंने किसी पर व्यक्तिगत आरोप भी नहीं लगाया। लेकिन उनके शब्दों में एक ऐसी पीड़ा दिखाई दी, जिसने पूरे मामले को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया। उन्होंने कहा कि हत्या जैसे गंभीर मामले के आरोपी अधिकारी को जांच पूरी होने से पहले पोस्टिंग देना उन लोगों के जख्मों को कुरेदने जैसा प्रतीत होता है, जो आज भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह केवल एक प्रशासनिक टिप्पणी नहीं थी। यह उस संवेदनशील प्रश्न की ओर संकेत था, जो आम नागरिक के मन में भी उठ रहा है।

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सरकार ने ही दर्ज कराया मुकदमा... फिर यह फैसला क्यों: इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है। भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में सरकार ने स्वयं संबंधित डीएसपी और तत्कालीन थानाध्यक्ष के विरुद्ध हत्या का मुकदमा दर्ज कराया।इतना ही नहीं, पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए आयोग का गठन भी किया गया। यानी सरकार स्वयं इस मामले को गंभीर मान चुकी है। ऐसे में जब जांच अभी पूरी नहीं हुई, तब संबंधित अधिकारी को एक महत्वपूर्ण विभाग में पोस्टिंग दिए जाने पर सवाल उठना स्वाभाविक माना जा रहा है। यही कारण है कि मंत्री मदन सहनी ने भी आश्चर्य व्यक्त किया।

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मुख्यमंत्री का अधिकार... लेकिन जनता की भावना भी महत्वपूर्ण: मदन सहनी ने अपने बयान में संवैधानिक मर्यादा का भी पूरा ध्यान रखा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अधिकारियों का तबादला मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। सरकार जहां उचित समझे, वहां किसी भी अधिकारी की नियुक्ति कर सकती है।लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि जिन अधिकारियों के विरुद्ध इतने गंभीर आरोप हों, उनकी पोस्टिंग से आम लोगों में आश्चर्य और नाराजगी होना स्वाभाविक है।यहीं उनके बयान की गंभीरता छिपी है। उन्होंने अधिकार पर प्रश्न नहीं उठाया। उन्होंने उस निर्णय से उत्पन्न जनभावना की ओर ध्यान आकर्षित किया। क्या न्याय केवल होना पर्याप्त है... या न्याय होता हुआ दिखना भी आवश्यक है? भारतीय न्याय व्यवस्था का एक स्थापित सिद्धांत है.... न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। यही सिद्धांत इस पूरे विवाद के केंद्र में दिखाई देता है। जब किसी मामले की जांच जारी हो, तब उस मामले से जुड़े अधिकारी की नई तैनाती आम नागरिक के मन में अनेक प्रकार की आशंकाएं उत्पन्न कर सकती है। भले ही जांच पूरी तरह निष्पक्ष हो रही हो, लेकिन जनता का विश्वास भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।

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राजनीति नहीं... संवेदनाओं का प्रश्न: मदन सहनी ने इस पूरे मामले को राजनीतिक रंग देने से भी परहेज किया। उन्होंने साफ कहा कि इसे पक्ष और विपक्ष के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। यह पूरे बिहार की संवेदनाओं से जुड़ा मामला है। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि भरत तिवारी एनकाउंटर की घटना के बाद राज्य के विभिन्न हिस्सों में पुलिस की कार्यशैली को लेकर व्यापक चर्चा हुई थी। लोगों ने सवाल उठाए थे। बहस हुई थी। और आज भी वह घटना पूरी तरह लोगों की स्मृतियों से ओझल नहीं हुई है। मुख्यालय में रखना अधिक उचित होता? मदन सहनी ने अपना व्यक्तिगत मत भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक संबंधित अधिकारी को मुख्यालय में रखा जाना अधिक उचित होता। यह टिप्पणी प्रशासनिक निर्णय पर सीधी टिप्पणी नहीं, बल्कि एक नैतिक सुझाव के रूप में सामने आई।

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सबसे बड़ा प्रश्न अब भी शेष है: भरत तिवारी एनकाउंटर फर्जी था या नहीं? क्या पुलिस की कार्रवाई वैध थी? क्या हत्या का मामला सिद्ध होगा? या संबंधित अधिकारी जांच में निर्दोष पाए जाएंगे.... इन सभी प्रश्नों के उत्तर अभी आयोग की रिपोर्ट में छिपे हैं। जब तक जांच पूरी नहीं होती, किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि इस पोस्टिंग ने न्याय, प्रशासनिक विवेक और जनविश्वास के संबंध में एक नई बहस अवश्य खड़ी कर दी है। लोकतंत्र में कई बार विवाद किसी आदेश से नहीं, बल्कि उस आदेश के समय और उसके संदेश से जन्म लेते हैं। भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में आरोपी डीएसपी की पोस्टिंग पर मंत्री मदन सहनी की प्रतिक्रिया ने यही संकेत दिया है कि प्रशासनिक निर्णयों के साथ-साथ जनता की भावनाएं और न्याय प्रक्रिया पर भरोसा भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अब पूरे बिहार की निगाहें न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट पर टिकी हैं। वही रिपोर्ट तय करेगी कि उस दिन क्या हुआ था, कौन जिम्मेदार था, और क्या उठे हुए ये सवाल समय के साथ शांत होंगे या आने वाले दिनों में और भी गहरे होते चले जाएंगे।