"हॉर्न की वह दहाड़ जिसने डीएमसीएच को हिलाया: डॉ. हरी शंकर मिश्रा, एक तूफानी नायक की अनसुनी दास्तान"
कभी दरभंगा मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (डीएमसीएच) की फिजाओं में एक हॉर्न की गूंज नहीं, बल्कि एक तूफान की दहाड़ गूंजती थी। यह था डॉ. हरी शंकर मिश्रा का आगमन—एक ऐसा अधीक्षक, जिसके नाम से डॉक्टरों के पसीने छूटते थे, नर्सों की धड़कनें तेज होती थीं और मरीजों की आंखों में चमक लौट आती थी। उनका हॉर्न कोई साधारण ध्वनि नहीं, बल्कि अनुशासन का वह शंखनाद था, जो डीएमसीएच को जंगल से जन्नत बना देता था। आज वह गूंज खामोश है, और अस्पताल की दीवारें अपने इस शेर को याद कर सिसक रही हैं. पढ़े पुरी खबर........

दरभंगा: कभी दरभंगा मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (डीएमसीएच) की फिजाओं में एक हॉर्न की गूंज नहीं, बल्कि एक तूफान की दहाड़ गूंजती थी। यह था डॉ. हरी शंकर मिश्रा का आगमन—एक ऐसा अधीक्षक, जिसके नाम से डॉक्टरों के पसीने छूटते थे, नर्सों की धड़कनें तेज होती थीं और मरीजों की आंखों में चमक लौट आती थी। उनका हॉर्न कोई साधारण ध्वनि नहीं, बल्कि अनुशासन का वह शंखनाद था, जो डीएमसीएच को जंगल से जन्नत बना देता था। आज वह गूंज खामोश है, और अस्पताल की दीवारें अपने इस शेर को याद कर सिसक रही हैं।
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कहते हैं, जब डॉ. मिश्रा का वाहन गेट पर रुकता, तो मानो भूचाल आ जाता। लापरवाह कर्मचारी छिपने की जगह ढूंढते, और मरीजों के लिए दवा-इलाज का रास्ता अपने आप खुल जाता। उनकी सख्ती किसी फिल्मी विलेन से कम नहीं थी, लेकिन दिल में मरीजों के लिए ममता ऐसी कि मां भी शरमा जाए। एक पुराना स्टाफ बताता है, "साहब का हॉर्न सुनते ही हमारी नींद उड़ जाती थी। एक बार तो एक डॉक्टर ने डर से ओपीडी में छुपकर कॉफी पीना शुरू कर दिया था, पर मिश्रा साहब ने उसे वहां भी ढूंढ निकाला!" उनकी नजर हर गलती पर थी, और हर मरीज की पुकार पर उनका ध्यान।
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आज डॉ. मिश्रा पूर्णिया जीएमसीएच में अपने जलवे बिखेर रहे हैं, लेकिन डीएमसीएच में उनकी कमी किसी ट्रेजडी फिल्म से कम नहीं। स्टाफ की आंखें नम हैं, और मरीजों की जुबान पर बस एक सवाल, "वह शेर कहां चला गया?" एक मरीज ने रोते हुए कहा, "उनके समय में हमें लगता था कि भगवान जमीन पर उतर आए हैं। एक बार मेरी सर्जरी के लिए रातभर साहब खुद रुके थे।" उनकी अनुपस्थिति में अस्पताल सूना पड़ा है, मानो कोई सुपरहीरो अपनी लबादा समेटकर चला गया हो।
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डॉ. हरी शंकर मिश्रा की यह कहानी किसी बॉलीवुड स्क्रिप्ट से कम नहीं—सख्ती का तड़का, समर्पण का मसाला और मानवता की मिठास। उनका हॉर्न अब नहीं बजता, लेकिन उनकी दहाड़ आज भी डीएमसीएच की हवाओं में गूंजती है। वह एक तूफान थे, एक नायक थे, जिसे हर दिल सलाम करता है। डीएमसीएच की दीवारें चीख-चीखकर कहती हैं, "लौट आओ साहब, यह जंगल फिर से जंगल बन गया है!"
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पूर्णिया का नया अध्याय: अब पूर्णिया जीएमसीएच में डॉ. मिश्रा की वह दहाड़ फिर से गूंज रही है। वहां भी उनकी सख्ती और ममता का जादू चल रहा है। कहते हैं, जब उनका वाहन पूर्णिया के अस्पताल में दाखिल होता है, तो वही पुराना मंजर लौट आता है—कर्मचारी दौड़ पड़ते हैं, मरीजों को राहत मिलती है, और व्यवस्था अपने आप पटरी पर आ जाती है। एक स्थानीय ने कहा, "डॉ. साहब यहां आए तो लगा जैसे पूर्णिया को भी अपना मसीहा मिल गया।" उनकी नजर से कोई गंदगी छुप नहीं सकती, और उनके दिल से कोई दर्द अनसुना नहीं रहता। पूर्णिया के लोग उन्हें "अस्पताल का शेर" कहकर पुकारते हैं, और उनकी हर डांट में छुपी ममता को सलाम करते हैं।
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लेकिन पूर्णिया में भी एक सवाल गूंजता है—क्या वह डीएमसीएच की तरह यहां भी अपनी अमिट छाप छोड़ पाएंगे, या यह सिर्फ एक नई जंग का आगाज है? उनकी कहानी अभी अधूरी है, पर इतना तय है कि जहां डॉ. मिश्रा हैं, वहां उम्मीद जिंदा है।
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अंत में उनके लिए कुछ शब्द: "डॉ. साहब, आप चले गए तो जैसे सूरज छिप गया, आपकी गूंज के बिना यह अस्पताल एक अनाथ की तरह रोता है। आपके कदमों की आहट, आपके हॉर्न की वह पुकार, हर मरीज की सिसकी पर आपकी वह नजर—सब कुछ अब ख्वाब सा लगता है। आप नहीं हैं, तो कौन सुनेगा इन दीवारों की चीख? कौन भरेगा उस ममता को, जो आपके हर डांट में छिपी थी? लौट आइए, साहब, वरना ये आंसू कभी न थमेंगे।"