ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. संजय कुमार चौधरी पर गंभीर आरोप: बिना अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता नियुक्ति, जाँच लंबित होने के बावजूद शीर्ष पद तक पहुँच....

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (LNMU), दरभंगा के वर्तमान कुलपति डॉ. संजय कुमार चौधरी की शैक्षणिक योग्यता और पूर्व नियुक्तियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि डॉ. चौधरी को वर्ष 2009 में बिना अनिवार्य योग्यता के प्राचार्य नियुक्त किया गया और बाद में तमाम लंबित जाँचों के बावजूद उन्हें कुलपति पद तक पहुँचा दिया गया।मामला हाईकोर्ट और राजभवन तक पहुँचने के बाद भी अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है, जिससे शिक्षा व्यवस्था और नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं. पढ़े पूरी खबर.....

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. संजय कुमार चौधरी पर गंभीर आरोप: बिना अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता नियुक्ति, जाँच लंबित होने के बावजूद शीर्ष पद तक पहुँच....
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. संजय कुमार चौधरी पर गंभीर आरोप: बिना अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता नियुक्ति, जाँच लंबित होने के बावजूद शीर्ष पद तक पहुँच....

दरभंगा। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (LNMU), दरभंगा के वर्तमान कुलपति डॉ. संजय कुमार चौधरी की शैक्षणिक योग्यता और पूर्व नियुक्तियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि डॉ. चौधरी को वर्ष 2009 में बिना अनिवार्य योग्यता के प्राचार्य नियुक्त किया गया और बाद में तमाम लंबित जाँचों के बावजूद उन्हें कुलपति पद तक पहुँचा दिया गया।मामला हाईकोर्ट और राजभवन तक पहुँचने के बाद भी अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है, जिससे शिक्षा व्यवस्था और नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं।

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प्राचार्य नियुक्ति पर शुरू से विवाद: जानकारी के अनुसार वर्ष 2009 में डॉ. संजय कुमार चौधरी को जेपी विश्वविद्यालय, छपरा अंतर्गत एक महिला कॉलेज का प्राचार्य नियुक्त किया गया था। जबकि उस समय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों के अनुसार प्राचार्य पद के लिए पीएचडी और न्यूनतम 10 वर्ष का शिक्षण अनुभव अनिवार्य था। आरोप है कि डॉ. चौधरी इन दोनों मानकों को उस समय पूरा नहीं करते थे।इस नियुक्ति को लेकर विश्वविद्यालय स्तर पर विरोध हुआ और मामला अंततः पटना हाईकोर्ट पहुँचा।

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हाईकोर्ट के निर्देश के बाद भी राजभवन में लंबित फाइल: हाईकोर्ट ने प्राचार्य नियुक्ति को लेकर की गई आपत्तियों पर राजभवन को निर्णय लेने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद डॉ. चौधरी की नियुक्ति से संबंधित फाइल पिछले लगभग दस वर्षों से राजभवन में लंबित बताई जा रही है।इस दौरान कई बार पत्राचार हुआ, लेकिन अब तक न तो नियुक्ति को वैध घोषित किया गया और न ही निरस्त।

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भागलपुर विश्वविद्यालय में भी उठे सवाल: प्राचार्य पद पर बने रहने के दौरान डॉ. चौधरी का स्थानांतरण तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) किया गया। वहाँ भी उनके कार्यकाल को लेकर विभिन्न प्रकार की अनियमितताओं के आरोप लगे। सूत्रों के अनुसार कई जाँच समितियाँ गठित की गईं, जिनमें प्रशासनिक और वित्तीय गड़बड़ियों के बिंदु सामने आए, लेकिन किसी भी जाँच का निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं किया गया।

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कुलपति नियुक्ति के समय भी दर्ज थीं आपत्तियाँ: सूत्र बताते हैं कि जब कुलपति पद के लिए स्क्रीनिंग प्रक्रिया शुरू हुई, तब तत्कालीन कुलपति द्वारा लिखित रूप में यह उल्लेख किया गया था कि डॉ. चौधरी के खिलाफ पूर्व प्राचार्य कार्यकाल से जुड़ी जाँचें लंबित हैं। इसके बावजूद उनकी नियुक्ति कर दी गई।

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विश्वविद्यालय में प्रशासनिक असंतोष: डॉ. चौधरी के कुलपति बनने के बाद विश्वविद्यालय में बीएड सहित कई शैक्षणिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर असंतोष की स्थिति बताई जा रही है। कर्मचारी और शिक्षक संगठनों के बीच अंदरखाने नाराज़गी है, हालांकि कोई भी खुलकर सामने आने से बच रहा है।

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राजभवन और शिक्षा विभाग की भूमिका पर सवाल: सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्राचार्य नियुक्ति से जुड़ा मामला न्यायालय और राजभवन के संज्ञान में है, तब ऐसे व्यक्ति को कुलपति पद पर नियुक्त करना किन परिस्थितियों में संभव हुआ। शिक्षा विभाग और राजभवन की भूमिका को लेकर भी गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। करीब एक दशक से लंबित फाइल और अधूरी जाँचें यह संकेत देती हैं कि मामला अब सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरी नियुक्ति प्रक्रिया और निगरानी तंत्र पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। अब देखना यह होगा कि क्या राजभवन और संबंधित विभाग इस मामले में कोई ठोस निर्णय लेते हैं या फिर यह मामला भी लंबित फाइलों की सूची में ही दबा रह जाएगा।