31 साल बाद मौत की अदालत में पेशी: खून, गोलियां, चीखें और अब सलाखें, दरभंगा से बिहार तक कांप उठा अपराध का इतिहास जब कानून ने कहा: बच नहीं पाओगे.....
दरभंगा व्यवहार न्यायालय के इतिहास में यह फैसला सिर्फ एक सजा नहीं, बल्कि अपराधियों के लिए खुली चेतावनी है कानून से बचने की उम्र चाहे 31 साल हो जाए, लेकिन इंसाफ की घड़ी तय होती है। तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश सुमन कुमार दिवाकर की अदालत ने 31 वर्ष पुराने उस हत्याकांड में फैसला सुनाया, जिसने कभी गांवों की नींद, खेतों की हरियाली और पोखरों की शांति छीन ली थी। अदालत ने क्राइम के चर्चित अधिवक्ता एवं पूर्व लोक अभियोजक अंबर इमाम हासमी और उनके भाई कौशर इमाम हासमी समेत अन्य अभियुक्तों को मानव हत्या का दोषी करार देते हुए कस्टडी में लेकर सीधे जेल भेज दिया. पढ़े पूरी रिपोर्ट.....
दरभंगा व्यवहार न्यायालय के इतिहास में यह फैसला सिर्फ एक सजा नहीं, बल्कि अपराधियों के लिए खुली चेतावनी है कानून से बचने की उम्र चाहे 31 साल हो जाए, लेकिन इंसाफ की घड़ी तय होती है। तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश सुमन कुमार दिवाकर की अदालत ने 31 वर्ष पुराने उस हत्याकांड में फैसला सुनाया, जिसने कभी गांवों की नींद, खेतों की हरियाली और पोखरों की शांति छीन ली थी। अदालत ने क्राइम के चर्चित अधिवक्ता एवं पूर्व लोक अभियोजक अंबर इमाम हासमी और उनके भाई कौशर इमाम हासमी समेत अन्य अभियुक्तों को मानव हत्या का दोषी करार देते हुए कस्टडी में लेकर सीधे जेल भेज दिया। यह वही मामला है, जिसे लोग वर्षों से यह कहकर भूल चुके थे अब कुछ नहीं होगा… आरोपी ताकतवर हैं… समय बहुत बीत गया है। लेकिन अदालत ने साबित कर दिया समय बीत सकता है, कानून नहीं।

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8 अगस्त 1994: जब पोखर के किनारे कानून मर गया था: शाम के करीब 7 बजे, विशनपुर थाना क्षेत्र के बसंत गांव से सटे गुणसार पोखर के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में अचानक ऐसा मंजर पैदा हुआ, जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। पटोरी गांव के राम कृपाल चौधरी, रामपुकार चौधरी सहित एक दर्जन से अधिक किसान भैंस चराकर लौट रहे थे। पोखर में मवेशियों को पानी पिलाया जा रहा था ना कोई झगड़ा, ना कोई हथियार, ना कोई अपराध। लेकिन तभी बसंत गांव की ओर से 25 से अधिक लोग फरसा, भाला और बंदूकें लहराते हुए मौत बनकर टूट पड़े। आरोप है कि मवेशियों को जबरन ले जाने का विरोध हुआ। विरोध का जवाब बना अंधाधुंध फायरिंग।

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गोलियों की तड़तड़ाहट, चीखें और लहूलुहान जमीन: गुणसार पोखर का किनारा गोलियों से गूंज उठा। चीख-पुकार से पूरा इलाका कांप गया। राम कृपाल चौधरी को गोली लगी वह जमीन पर गिरे और वहीं मौत ने उन्हें जकड़ लिया बाकी किसान गोलियों से छलनी हो गए मोहन चौधरी, रविन्दर चौधरी, अशोक चौधरी, कैलाश बिहारी चौधरी, संगीत चौधरी, रामपुकार चौधरी.... कुछ जिंदगी और मौत के बीच झूलते रहे, एक घायल युवक ने बाद में दम तोड़ दिया। उस शाम सिर्फ इंसान नहीं मरे,भय गांव-गांव में बस गया।

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31 साल तक चला इंसाफ का संघर्ष: इस हत्याकांड की प्राथमिकी दर्ज हुई विशनपुर थाना कांड संख्या 58/94 फाइलें बदलीं, तारीखें बदलीं, गवाह बूढ़े हुए, कुछ गवाह कब्र में चले गए, कुछ आरोपी दुनिया छोड़ गए। लेकिन अदालत ने हार नहीं मानी। लोक अभियोजक अमरेंद्र नारायण झा ने अदालत को बताया इस केस में अंबर इमाम हासमी, कौशर इमाम हासमी, राजा हासमी, मोबिन हासमी, अंजार हासमी को सत्रवाद संख्या 326/99 और 320/10 में दोषी पाया गया।

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हत्या, हत्या का प्रयास और गैरकानूनी हथियार: अदालत ने सभी अभियुक्तों को IPC 302 (हत्या) IPC 307 (हत्या का प्रयास) IPC 149 (अवैध जमावड़ा) आर्म्स एक्ट 27 के तहत दोषी करार दिया। फैसला सुनते ही बंधपत्र खंडित कोर्ट से सीधे जेल कोई रसूख काम नहीं आया। कोई वकालत ढाल नहीं बन सकी।

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31 साल बाद लौटा डर लेकिन इस बार अपराधियों के लिए: यह केस उन लोगों के लिए सबक है जो सोचते हैं हम ताकतवर हैं, कुछ नहीं होगा। गवाह मर जाएंगे। समय सब भुला देगा। दरभंगा की अदालत ने साफ कहा न्याय देर से आता है, मगर जब आता है तो सलाखें साथ लाता है। 31 जनवरी 2026 उस दिन अदालत तय करेगी हत्या का दाम कितनी साल की कैद है। और तब बिहार देखेगा कानून का सबसे डरावना चेहरा। जो आज भी हथियार उठाने का सपना देखते हैं जो सोचते हैं अदालतें थक जाएंगी जो मानते हैं रसूख अमर है इस खबर को ध्यान से पढ़ लें। कानून देखता है। कानून याद रखता है। और एक दिन पकड़ ही लेता है।
