“फुटपाथ पर ज़िंदगी, उम्मीदों पर डंडा: दरभंगा के दुकानदार कब तक सहें अन्याय?”
दरभंगा शहर की रफ्तार इन फुटपाथों पर ही चलती है। यहीं पर सुबह की चाय मिलती है, दोपहर का फल और शाम के खाने के लिए ताज़ा सब्ज़ी-मछली। लेकिन इन जरूरी चीज़ों के पीछे खड़ा है एक ऐसा वर्ग, जो खुद बेघर है – फुटपाथी दुकानदार। ये वो लोग हैं, जिनकी जिंदगी सड़क के किनारे सजी दुकान से शुरू होती है और पुलिस की सीटी, लाठी या नगर निगम की कार्रवाई पर ठहर जाती है. पढ़े पुरी खबर........

दरभंगा शहर की रफ्तार इन फुटपाथों पर ही चलती है। यहीं पर सुबह की चाय मिलती है, दोपहर का फल और शाम के खाने के लिए ताज़ा सब्ज़ी-मछली। लेकिन इन जरूरी चीज़ों के पीछे खड़ा है एक ऐसा वर्ग, जो खुद बेघर है – फुटपाथी दुकानदार। ये वो लोग हैं, जिनकी जिंदगी सड़क के किनारे सजी दुकान से शुरू होती है और पुलिस की सीटी, लाठी या नगर निगम की कार्रवाई पर ठहर जाती है।
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बेंता चौक से लेकर शास्त्री चौक तक, लहेरियासराय से दरभंगा गुदरी तक, शहर के हर कोने में फैले हैं ये छोटे-छोटे ठिकाने। लेकिन ये दुकानें नहीं, जीने का एक जरिया हैं – जिसमें हर दिन उम्मीद के साथ बिछती है दुकान और डर के साथ समेटी जाती है।
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बरसात से भी ज्यादा दर्दनाक होती है ‘उजाड़ने’ की बारिश: "पानी में भीगना मंजूर है, धूप में जलना मंजूर है… पर जब प्रशासन आता है और सब कुछ पल में छीन लेता है, तो अंदर तक टूट जाते हैं," कहते हैं रामेश्वर दास, जो पिछले 18 वर्षों से लहेरियासराय में सब्ज़ी बेच रहे हैं।
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हर बार जब नगर निगम ‘अतिक्रमण हटाओ अभियान’ चलाता है, तब टूटते हैं सिर्फ ठेले नहीं – टूटती हैं हिम्मतें, सपने और बच्चों की उम्मीदें। प्रशासन को शायद यह दिखता नहीं कि एक ठेला सिर्फ दुकान नहीं, किसी का जीवन है।
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वादा बहुत, भरोसा नहीं: 2004 में जब पहली बार फुटपाथी दुकानदारों को हटाने की कवायद शुरू हुई, तब ज़बरदस्त विरोध हुआ। इसी के बाद टाउन वेंडिंग कमेटी का गठन हुआ और कहा गया कि जब तक वेंडिंग ज़ोन नहीं बनता, तब तक दुकानदार सड़क से तीन फीट दूर दुकान लगा सकते हैं।
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समझौता तो हुआ, पर दो दशक बीत गए – ना वेंडिंग ज़ोन बना, ना वादे पूरे हुए। उल्टा अब वही प्रशासन उस समझौते को भी दरकिनार कर रहा है। पुलिसिया डंडे और नगर निगम की नोटिसें आज भी जारी हैं, पर सुरक्षा, सम्मान और स्थायित्व नदारद है।
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‘अतिक्रमणकारी’ कहे जाने का कलंक: कारी गामी, जो विक्रेता संघ के महानगर अध्यक्ष हैं, बताते हैं – “हमें लोग अतिक्रमणकारी कहते हैं, लेकिन क्या कोई अपनी मर्ज़ी से धूप में खड़ा होता है? हम तो मजबूरी में सड़क पर आए हैं। रोज़ कमा कर पेट पालते हैं।”
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शहर के 17 प्रमुख स्थलों पर वेंडिंग ज़ोन बनाने की योजना बनी थी। शास्त्री चौक पर 66 दुकानों में से सिर्फ 16 बनी हैं। बाकी सब बातें कागज़ों में दबी रह गईं। हर बजट मीटिंग में घोषणाएं होती हैं, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं दिखता।
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उम्मीद बाकी है: हाल ही में नगर निगम की बैठक में छह नए वेंडिंग ज़ोन बनाने का प्रस्ताव पास हुआ है। अब कहा जा रहा है कि जल्द काम शुरू होगा और दुकानों का नियमानुसार आवंटन होगा। यह सुनकर दुकानदारों की आंखों में फिर एक बार उम्मीद की लौ जली है – शायद अबकी बार कुछ बदले।
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लेकिन यह ‘शायद’ ही अब तक सबसे बड़ा सवाल बन गया है। दरभंगा जैसे सांस्कृतिक और शैक्षणिक शहर में अगर फुटपाथी दुकानदारों को दो गज छांव भी न मिले, तो यह सिर्फ शासन की नहीं, समाज की भी हार है।
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जब तक वेंडिंग ज़ोन नहीं बनते: जब तक वेंडिंग ज़ोन नहीं बनते, तब तक हर सुबह दरभंगा के फुटपाथ पर फिर कोई अपना ठेला लगाएगा। फिर कोई पुलिस की सीटी से सहमेगा। फिर कोई बच्चा माँ से पूछेगा – “आज दुकान फिर टूट गई क्या?” इस शहर की रफ्तार चलती रहे, इसके लिए ज़रूरी है कि उसे चलाने वालों को भी जीने का हक मिले – सिर्फ कागज़ों में नहीं, ज़मीन पर।