बड़ी खबर। 27 लाख के भुगतान में तकनीकी सत्यापन की अनदेखी पड़ी भारी दरभंगा इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संदीप तिवारी का तबादला, चंदन कुमार को सौंपी गई नई प्राचार्यीय जिम्मेदारी....

दरभंगा इंजीनियरिंग कॉलेज से जो तस्वीर सामने आई है, वह केवल एक प्राचार्य के तबादले की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था का आईना है, जहाँ लोकधन, नियम और जवाबदेही तीनों को एक साथ ताक पर रख दिया गया। विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी शिक्षा विभाग ने गंभीर अनियमितताओं को संज्ञान में लेते हुए कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संदीप तिवारी को तत्काल प्रभाव से शेखपुरा स्थानांतरित कर दिया, और इसके साथ ही कॉलेज प्रशासन में भूचाल आ गया. पढ़े पूरी खबर........

बड़ी खबर। 27 लाख के भुगतान में तकनीकी सत्यापन की अनदेखी पड़ी भारी दरभंगा इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संदीप तिवारी का तबादला, चंदन कुमार को सौंपी गई नई प्राचार्यीय जिम्मेदारी....
बड़ी खबर। 27 लाख के भुगतान में तकनीकी सत्यापन की अनदेखी पड़ी भारी दरभंगा इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संदीप तिवारी का तबादला, चंदन कुमार को सौंपी गई नई प्राचार्यीय जिम्मेदारी....

दरभंगा इंजीनियरिंग कॉलेज से जो तस्वीर सामने आई है, वह केवल एक प्राचार्य के तबादले की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था का आईना है, जहाँ लोकधन, नियम और जवाबदेही तीनों को एक साथ ताक पर रख दिया गया। विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी शिक्षा विभाग ने गंभीर अनियमितताओं को संज्ञान में लेते हुए कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संदीप तिवारी को तत्काल प्रभाव से शेखपुरा स्थानांतरित कर दिया, और इसके साथ ही कॉलेज प्रशासन में भूचाल आ गया। यह कोई साधारण प्रशासनिक फेरबदल नहीं था, बल्कि 27 लाख 31 हजार 606 रुपये के भुगतान में तकनीकी सत्यापन को दरकिनार करने, फर्जी प्रक्रिया अपनाने, विभाग को अंधेरे में रखने और सरकारी आदेशों की खुली अवहेलना जैसे संगीन आरोपों के बाद की सीधी कार्रवाई थी।

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तीन सदस्यीय जांच, और परत-दर-परत खुलते गए सच: मामले की गंभीरता को देखते हुए तकनीकी शिक्षा विभाग ने तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की थी, जिसमें सहायक निदेशक अतिकुर रहमान, अतिरिक्त वित्तीय सलाहकार मनीष कांत झा, और अवर सचिव सह निदेशक अहमद महमूद को शामिल किया गया। जांच के दौरान जो तथ्य सामने आए, वे न सिर्फ चौंकाने वाले थे, बल्कि तकनीकी शिक्षा व्यवस्था को शर्मसार करने वाले भी साबित हुए।

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बिना जांच, बिना सत्यापन… सीधे भुगतान!

जांच रिपोर्ट के अनुसार, कॉलेज के इलेक्ट्रिकल विभाग में मशीनों, लैब उपकरणों और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स लैब के नाम पर 27 लाख से अधिक की राशि का भुगतान बिना किसी तकनीकी सत्यापन के कर दिया गया। ना तो उपकरणों की गुणवत्ता की पुष्टि हुई, ना ही तकनीकी समिति की अनुशंसा ली गई, और ना ही विभागीय प्रक्रिया का पालन किया गया। इतना ही नहीं, लैंग्वेज लैब के लिए खरीदी गई मशीन का डाइमेंशन और स्पेसिफिकेशन भी निर्धारित मानकों से मेल नहीं खाता पाया गया। यानी मशीन खरीदी गई, पैसा दिया गया, लेकिन उपयोगिता और आवश्यकता दोनों संदिग्ध!

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ज़रूरी क्या, अनावश्यक क्या इसकी भी अनदेखी: जांच समिति ने साफ शब्दों में कहा कि कुछ उपकरण आवश्यक थे, लेकिन कई उपकरण पूरी तरह अनावश्यक पाए गए। यानी कॉलेज के नाम पर ऐसी खरीददारी हुई, जिसकी जरूरत ही नहीं थी, लेकिन भुगतान बेहिचक कर दिया गया। सवाल यह नहीं कि पैसा गया सवाल यह है कि किसकी अनुमति से और किस मंशा से गया?

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अधिवक्ता मामलों में भी ‘अंधेरा’: सबसे गंभीर और चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि कॉलेज की ओर से नियुक्त अधिवक्ताओं से जुड़े मामलों में विभाग को पूरी तरह अंधेरे में रखा गया। न तो समय पर जानकारी दी गई, न कोई अनुमति ली गई, और न ही पारदर्शिता दिखाई गई। यह सीधा-सीधा प्रशासनिक विश्वासघात माना गया।

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सरकारी निर्देशों की खुली अवहेलना: जांच में यह भी सामने आया कि नीट परीक्षा संचालन को लेकर सरकार ने 20 अंकों के अनुसार प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया था, लेकिन प्राचार्य ने इसे 40 अंकों के लिए संचालित किया वह भी बिना अनुमति और बिना स्पष्टीकरण। यानी आदेश सरकार का, मर्जी प्राचार्य की!

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जांच में स्वीकारोक्ति, और फिर गिरी गाज: जांच समिति के सामने डॉ. संदीप तिवारी ने इन आरोपों को स्वीकार भी किया, जिसके बाद विभाग के पास कार्रवाई के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। इसी के आधार पर तत्काल प्रभाव से तबादला, वित्तीय शक्तियाँ छीनना, और कॉलेज में नई व्यवस्था लागू करना जैसे कड़े कदम उठाए गए।

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कॉलेज में हड़कंप, नया प्राचार्य नियुक्त: कार्रवाई के बाद दरभंगा इंजीनियरिंग कॉलेज में हड़कंप की स्थिति है।विभाग ने चंदन कुमार को वित्तीय शक्तियाँ देते हुए नया प्राचार्य नियुक्त कर दिया है, ताकि आगे किसी भी तरह की अनियमितता पर तुरंत रोक लगाई जा सके। यह मामला सिर्फ एक कॉलेज या एक प्राचार्य तक सीमित नहीं है। यह सवाल खड़ा करता है क्या तकनीकी शिक्षा संस्थानों में यही सिस्टम चल रहा है? क्या बिना सत्यापन के भुगतान कोई अपवाद है, या नियम? और क्या यह कार्रवाई सिर्फ तबादले तक ही सीमित रहेगी?